दो पक्षियों की बात:
वे सिर्फ चूँ चाँ चीं, चूँ चां चीं नहीं करते
तो फिर रोज सवेरे अलग- अलग डाल पर बैठे
दो पक्षी आखिर क्या बात करते हैं
वे बात कर सकते हैं खाना-पानी के बारे में
बहेलिये की निर्ममता के बारे में
जंगल पर उसकी निगरानी के बारे में
इस बारे में कि रोज कुछ पक्षी
आखिर कहां गायब हो जाते हैं
और जो कोई भी मुंह खोलता है
वह अगले दिन पिंजरे में क्यों मिलता है
वे बात कर सकते हैं कि कैसे
बहेलिया कैद पक्षियों से उनके
घोंसलों, अंडों और बच्चों के बारे में पूछता है
पूछता है कि उनमें क्या-क्या बातें होती हैं
जाल लेकर उड़ जाने की साजिश में
आखिर कौन-कौन शामिल है
सही जवाब देने पर भी संतुष्ट नहीं होता है
कई बार गुस्सा होकर पंख नोंच लेता है
गर्दन दबाने की कोशिश करता है
कई बार प्यार से कहता है कि आजादी
चाहते हो तो मुखबिर बन जाओ
एक पक्षी बोलता है, ज्यादा चूं- चां ठीक नहीं
बच्चों को समझाना होगा कि वे
ऊंची उड़ान के चक्कर में न पड़ें
हो सके तो बहेलिये के पक्ष में रहें
उसे शिकार करने में मदद करें
दूसरा कहता है, मेरे पुरखे हमेशा
बोलते आये हैं, मैं भी चुप नहीं रहूंगा
बहेलिये को चकमा दे सकते हैं मेरे पंख
ऐसे बहुतेरे आये और चले गये
एक दिन इसे भी जाना ही होगा
इस सवाल पर रोज दोनों में खूब बकझक
होती है पर सहमति कभी नहीं होती
हो सकता है, दोनों कोरोना पर बातें करते हों
आदमियों से दूरी बनाये रखो
वे कोरोना से भी खतरनाक हैं
वे लाश भी हजम कर जाते हैं
संभव है वे प्रेम की बातें करते हों
लेकिन हम क्या करेंगे प्रेम का
प्रेम करना कहां आया हमें
मानुष की नजर तो हमेशा ही
कुछ पाने पर टिकी रही
उसने मानुष को कब कितना प्रेम किया
दो पक्षी कुछ तो बात करते हैं
पता नहीं, हम सही अनुवाद कर पाये या नहीं
हे, पक्षियों ! तुम्हीं बताओ न, तुम रोज सुबह
आपस में क्या बातें करते हो?
तुम्हें हिंदी आती है क्या?
(विष्णु नागर जी की एक टिप्पणी से प्रेरित एवं सुभाष राय की वॉल से साभार)







