Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 541 मैं तो तुम्हें किसी ना किसी पन्ने में मिल जाऊंगा ज़रूर खता मोहब्बत की मेरी है तुम तो ठहरे बेकसूर रहने दो मेरी बातें वक्त बीतेगा बेफिजूल गर इश्क़ हो जाए किसी और से तो निभाना ज़रूर…. ज़रूर महोदधि बा अदब
‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन