लम्बे अरसे से चला आ रहा भारत और चीन के बीच विवाद का आखिर एक सुखद अंत दिखा। इसके साथ ही भारतवासियों के लिए भी यह एक अच्छा समाचार हो सकता है कि भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारों से सेनाओं को पीछे हटाने को लेकर समझौता हो गया है। सेनाएं भी पीछे हटने लगी हैं और जल्दी ही टकराव से पहले की स्थिति बहाल होने की उम्मीद है।

रक्षा मंत्री ने संसद में भरोसा दिलाया है कि हमने कुछ भी खोया नहीं है। यह निश्चित रूप से भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है। इस बात का लंबे समय से इंतजार था कि कब चीनी सेना इस इलाके से हटे और तनाव कम हो। निस्संदेह पूर्वी लद्दाख में चीनी अतिक्रमण पर भारत ने जिस तरह का कड़ा रुख अख्तियार किया, उससे चीन झुकने को मजबूर हुआ है। गलवान घाटी में सैन्य टकराव के बाद तनाव कम करने और सैनिकों की वापसी के लिए सैन्य व कूटनीतिक स्तर पर वार्ताओं के लंबे दौर चले। मॉस्को में भी भारत और चीन के विदेश व रक्षा मंत्रियों की वार्ताएं हुईं। इन सबके बावजूद चीन के अड़ियल रुख से ये सारी कवायदें निष्फल ही रहीं।

रक्षा मंत्री ने गुरुवार को राज्यसभा में बयान देकर पैंगोंग झील इलाके से भारत और चीन के सैनिकों के पीछे हटने की पुष्टि की और यह साफ किया कि चीन अपनी सेनाओं की टुकड़ियों को उत्तरी किनारे में फिंगर-आठ के पूरब की दिशा के करीब रखेगा और भारत अपनी सेना की टुकड़ियों को फिंगर तीन के पास अपने स्थायी ठिकाने धन सिंह थापा पोस्ट पर रखेगा। सैनिको को हटाने की यही प्रक्रिया दोनों देश झील के दक्षिणी हिस्से में भी करेंगे। यहां चीन के इरादों पर भी ध्यान देना जरूरी है। पड़ोसी देशों के साथ विवादों को लेकर इस वक्त चीन की दुनिया भर में आलोचना हो रही है। चीन को चाहिए कि वह अप्रैल 2020 से पहले वाली स्थिति बहाल करे।
देखने की बात यह होगी कि सैनिकों की वापसी के कदम पर वह कितनी ईमानदारी दिखाता है। अभी तक का उसका रिकार्ड तो यही बताता है कि उस पर पूरी तरह भरोसा करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि अपनी विस्तारवादी नीति के तहत वह कभी भी पलटी मार देता है।







