जी के चक्रवर्ती
प्रतिवर्ष माघ माह में पड़ने वाली पंचमी ‘वसंत पंचमी’ का पर्व जहां विद्या की देवी माँ स्वारस्वती जी की पूजा अर्चना कर हर्षोउल्लास से देशभर में धूमधाम से मनाई जाती रही है, लेकिन इस वर्ष माना देश की राजधानी के सीमाओं में आंदोलन रत अनेको कृषकों के मार्मिक मौत ने इस पर्व को मनाने की खुशियों के स्थान पर मार्मिक बना दिया है। आज जिस स्वर की देवी की पूजा अर्चना किया जाना था लगता है उसने हम इन्सानों को स्वर बोल देकर अनर्थ कर दिया है। जिस तरह के बोल समभाषणों से हम मानवता और देश को शर्मसार कर रहे हैं।
यह दिन वसंत ऋतु के आगमन का सूचक होने के साथ ही शरद ऋतु की विदाई के साथ समस्त प्राणीजगत में नवजीवन का संचार कर वातावरण में मादकता पूर्ण गंध का फैला कर वातावरण को मादकता से भर कर प्रकृति के सौंदर्य में निखार लाकर प्राणी जगत में उल्लास एवं आनंद से परिपूर्ण कर देती है। शरद ऋतु में वृक्षों के पुराने जीर्ण पत्ते सूखकर गिर जाने से नवीन पल्लवों से सुसज्जित पेड़-पौधों धरा की श्रंगार में चार-चांद लगा देती है। वसंत पंचमी के ही दिन से होली की पूर्व आभास होने लगता है।
साहित्य एवं संगीत प्रेमियों के लिए तो वसंत पंचमी के पर्व का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इस दिन ज्ञान और वाणी की देवी सरस्वती की पूजा का पवित्र पर्व पर बच्चों को बोलना या लिखना सिखाना का शुभ आरम्भ किया जाता है।
संगीतकार इस दिन अपने वाद्य यंत्रों की पूजा करते हैं तो दूसरी तरफ लिखने पढ़ने वाले बच्चे अपनी पुस्तक एवं कलम को देवी के चरणों मे अर्पित कर पूजा अर्चना करते हैं, ऐसी मान्यता है कि इसी दिन विद्या और बुद्धि की देवी मां सरस्वती अपने हाथों में वीणा, पुस्तक व माला लिए अवतरित हुईं थी। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में इस दिन लोग विद्या, बुद्धि और वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की पूजा-आराधना करके अपने जीवन से अज्ञानता के अंधकार को दूर करने की कामना करते हैं।







