नो बकवास सीधी बात: अंशुमाली रस्तोगी
मुझे हर व्यंग्य में राजनीतिक एंगल की तलाश रहती है। मगर वो किसी भी व्यंग्य में नहीं मिलता। कारण : आज के दौर के व्यंग्यकारों के पास ‘राजनीतिक समझ’ है ही नहीं। और, उस व्यंग्य का कोई महत्त्व या मतलब नहीं, जिसमें राजनीति का टच न हो। व्यंग्यकारों में राजनीतिक समझ ‘शून्य’ होने का बड़ा कारण उनका परसाई को न पढ़ना है। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि जितने भी लिक्खाड़ व्यंग्यकार, जो हर हफ्ते अखबारों के पन्ने काले करते हैं, इनमें से किसी ने भी परसाई को पढ़ा ही नहीं है। अगर पढ़ा होता तो इनके व्यंग्य इतने ‘कूड़ा’ और फूहड़ न होते।
व्यंग्य को आजकल ‘हास्य’ का जरिया बना दिया गया है। जबकि व्यंग्य विचार का सबसे मजबूत माध्यम है। विचार और वैचारिकता व्यंग्य के साथ-साथ चलती है। अगर व्यंग्यकार की राजनीतिक समझ जीरो है तो उसे व्यंग्य न लिखकर ‘कविता’ लिखनी चाहिए। जोड़-तोड़ से लिखी गई कविताएं फेसबुक पर बिखरी पड़ी हैं।
एक दौर ऐसा भी रहा है, जब नेताओं का नाम लेकर व्यंग्य लिखे जाते थे। स्वयं परसाई ने लिखे हैं। बेहद तीखे। पर इसके लिए हिम्मत चाहिए। दुःखद है कि आजकल के व्यंग्यकारों में राजनीति और नेताओं पर लिखने की न हिम्मत है न राजनीतिक समझ। फिर क्या खाकर व्यंग्य लिख पाएंगे जनाब।







