पंकज चतुर्वेदी
जिस समय वायु गुणवत्ता का आकलन करने वाली स्वीस संस्था आइक्यूएयर अपनी रिपोर्ट “वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट-2020” जारी कर बता रही थी कि दुनिया के 30 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में दिल्ली सर्वाधिक प्रदूषित राजधानी शहर होने के साथ टॉप 10 में भी शुमार रही है। ठीक उसी समय राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली व उसके करीबी जिलों में वायु गुणवत्ता पर निगाह रखने व उसे दूषित करने वालों पर सख्त कार्यवाही के इरादे से राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के जारी अध्यादेश् बगैर कोई काम किए ही निष्प्रभावी हो गया। पर्यावरण के प्रति हमारे जन प्रतिनिधियों की यह उदासीनता ही कहलाएगी कि संविधान के अनुसार किसी अध्यादेष को कानून बनाने के लिए छह महीने के भीतर उस पर संसद में बिल लाने की अनिवार्यता की किसी को परवाह ही नहीं थी।
यह बेहद गंभीर चेतावनी है कि आने वाले दशक में दुनिया में वायु प्रदूषण के शिकार सबसे ज्यादा लोग दिल्ली में होंगे । एक अंतरराश्ट्रीय शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर प्रदूषण स्तर को काबू में नहीं किया गया तो साल 2025 तक दिल्ली में हर साल करीब 32,000 लोग जहरीली हवा के शिकार हो कर असामयिक मौत के मुंह में जाएंगे। सनद रहे कि आंकड़ोंं के मुताबिक वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली में हर घंटे एक मौत होती है। यह भयावह तथ्य हमारी संसद को डराता नहीं है, यह बात आम लोगों के लिए डर का कारण है। बीते कुछ दिनों से दिल्ली एनसीआर में वायु गुणवत्ता लगातार ‘गंभीर’ श्रेणी में बनी हुई है। दिल्ली षहर हो या फिर यहां से 100 किलोमीटर दूर बुलंदशहर या सटा हुआ गाजियाबाद , गत नवंबर महीने से किसी बरसात के दिन को छोड़ दें तो वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 400 से अधिक ही है। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि गाड़ियों से निकलने वाला काला धुआं, निर्माण कार्यों से उड़ने वाले पीएम कण, सड़कों पर फैली धूल, उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन आदि इसके कुछ मुख्य कारक हैं।

यह कड़वा सच है कि यदि सुप्रीम कोर्ट सक्रिय नहीं होती तो दिल्ली के प्रदूषण से सरकारें तो बेपरवाह ही रही हैं। एमसी मेहता बनाम केंद्र सरकार, 1988 के फैसले के बाद दिल्ली में इपीसीए गठित की गई थी जिसका काम दिल्ली राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण के नियंत्रण के लिए काम करना था। चूंकि दिल्ली का प्रदूषण आसपास के जिलों के कारण भी प्रभावित होता है सो आदित्य दुबे की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद केंद्र सरकार ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) का गठन किया। चूंकि इस आयोग के पास प्रदूषण कारियों को पांच साल की जेल की सजा सुनाने का भी अधिकार था सो केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर 28 अक्टूबर 2020 को इसके गठन की औपचारिकता की। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पूर्व सचिव एमएम कुट्टी को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। इसके सदस्य विभिन्न राज्यों के आला अफसर भी थे।
इस आयोग की एक बैठक नौ नवंबर 2020 को हुई जिसमें वर्तमान नियमों, कानूनों और दिशा निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हुए निजी वाहनों के उपयोग को कम करने , घर से काम करने को प्रोत्साहित करने, कूडा जलाने पर कड़ाई, धूलग्रस्त इलाकों में पानी छिड़काव जैसे निर्देश भी जारी किए गए। सुझावों पर कुछ क्रियान्वयन होता तब तक इसकी अकाल मृत्यू हो गई। जान लें अध्यादेश को कानून का रूप देने के लिए इसे संसद का सत्र शुरू होने के छह हफ्ते के भीतर सदन में पेश नहीं किया जा सका, जिसकी वजह से इसकी वैधता समाप्त हो गई और आयोग स्वतः भंग हो गया।
जिस संसद के सदस्य अपने भत्ते-वेतन बढ़ाने के बिल को पास करने की तैयारी सालभर पहले कर लेते हैं वहां आम लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे वायु प्रदूषण के निदान के लिए गठित संस्था के बारे में याद ना रहना वास्तव में आज की राजनीति के जन सरोकार से दूरी की बानगी है। एक शक्ति संपन्न आयोग को ठिकाने से कार्यालय की जगह नहीं मिली, उसके कार्य को व्यापक रूप देने की मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मुहैया करवाई गई। जाहिर है कि इस कमीशन को भी केंद्र सरकार ने गम्भीरता से नहीं लिया।
दिल्ली में ओाजने का स्तर सारे साल 190 रहता है जबकि यह 100 से ज्यादा होना नहीं चाहिए। धुंएं में बड़ी मात्रा में मौजूद हाईड्रो कार्बन तापमान चालीस के पार होते ही यह हवा में मिल कर ओजोन का निर्माण करने लगते हैं। यह ओजोज इंसान के षरीर, दिल और दिमाग के लिए जानलेवा है । वाहनों से उत्सर्जीत २.५ माइक्रो मीटर व्यास वाले पार्टिकल और गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड वायु प्रदूषण से मौतों के आंकड़े में इजाफा करती है। जान लें वायु प्रदूषण करीब 25 फीसदी फेंफड़े के कैंसर की वजह है। इस खतरे पर काबू पा लेने से हर साल करीब 10 लाख लोगों की जिंदगियां बचाई जा सकती हैं और इसके लिए आकलन, नियंत्रण और प्रबंधन ही एकमात्र इलाज है और यह सब एक षक्तिसंपन्न केंद्रीय संस्था के बगैर संभव नहीं।







