स्त्रियाँ जानती हैं कितना प्रबल है पौरुष
देश पर की दीवारों पर लिखा हुआ है
पुरुषों की दुर्बलता का महाकाव्य
हकीमों के कानों में फुसफुसाते हैं पुरुष
कि अपनी लाज बचाने को बेच सकते हैं
घर, खेत, ढोर-बांगर सब कुछ
स्त्रियाँ जानती है पुरुषों की कमज़ोरी
उन्हें पता है उनके अंतःवस्त्र देख कर ही स्खलित हो सकता है पौरुष
विक्षिप्त हो सकता है पुरुष
मनोरोगी बन सकता है
इसीलिए वे छिपा कर सुखाती हैं अपने अंतःवस्त्र
मानो क्षमा कर रही हों पुरुषों का अपराध
मानो एक दुर्बल को दे रहीं हों प्राणदान
मानों एक भ्रम को टूटने से बचा लिया हो
मानो दया आ गई हो उन्हें पुरुषों की दुर्बलता पर – अनुराग अनंत







