मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज मे रहते हुए नियमो को धार्मिक और सामाजिक धरातल पर अत्यंत उपयोगी समझा गया है। मनुष्य जिस समाज मे रहता है। उसका अच्छा बुरा प्रभाव उस पर पड़ता है। जीवन मे अति आने पर अहंकार या मद बढ़ जाता है और ऐसा होना स्वाभाविक है।राजा भर्तहरि ने लिखा कि जब में थोड़ा जनता था तो हाथी की तरह झुमकर चलता था। जब ज्यादा जानने लगा तो चींटी की तरह छोटा होकर चलने लगा। मुझे आभास हो गया कि ज्ञान अनंत है। उसका क्या गर्व करना।
आज धर्म, विज्ञान, साहित्य के क्षेत्र में ज्ञान की नित नई बाते हो रही है। थोड़े से ज्ञान की प्राप्ति के बाद मद आ जाना मूर्खता है। ज्ञान प्राप्ति से मद आये तो वह एक प्रकार से अज्ञान ही कहलायेगा।वह ज्ञान सही नही,मिथ्या ज्ञान है।ज्ञानमद से रहित प्राणी ही आत्म हित की और प्रवृत्त हो सकता है। ज्ञानमद में डूबा मानव न निज का कल्याण कर सकता है और न दुसरो का ही सच्चा ज्ञान तो वही है जो स्व हित पर हित को साधे।जो अपना भला बुरा नही सोच सकता, वह भला दुसरो का हित कैसे कर सकता है। जो स्वयं अंधा है, वह दूसरों को क्या पथ दिखायेगा।ज्ञान से अहं की नही, बल्कि विन्रमता की प्राप्ति होती है।
विन्रमता से साधक का जीवन महान बन जाता है। संसार मे दुसरो का हित चाहने वालो की हमेशा पूजा होती है।समाज मे उनको सम्मान दिया है। उसकी जय जयकार की है। अत्यधिक सम्मान से सामान्य व्यक्ति में व्यक्ति पूजा का भाव बढ़ जाता है। सम्मान प्राप्त व्यक्ति जब यह विचार करने लगे कि मुझ जैसा योग्य व्यक्ति तो इस संसार मे दूसरा कोई नही है तो यह भाव पूजामद की श्रेणी में आते है। महापुरुष इस मद से बचकर चले है।राम कृष्ण महावीर ने कभी किसी को यह नही कहा मैं सर्व शक्ति संपन्न हू।आप मेरी पूजा करो।
रावण,कंस, गोशालक में अहं भाव जागा तो तो आज उन्हें कोई पूछने वाला भी नही है।अच्छे कार्य करने वालो की जयकार तो हर युग मे हुई है। जिसे धर्म का मार्ग मिल गया ,वह पूजा मद से परे हो जाता है।अपने आप को भटकने से रोकना होगा।







