जी के चक्रवर्ती
सत्ता में वापसी के लिए बीएसपी ने सोशल इंजीनियरिंग के बाद नया फार्मूला लागू किया है पूरे समाज को एक जुट व एक मंच पर साथ लाने के लिए अब बसपा राम कि राह पर चलेगी। अयोध्या में ब्राह्मण सम्मलेन की शुरुआत इस बात का प्रमाण है कि बसपा सबको साथ मिलाकर अब कुछ नया प्रयोग करेगी।
भारतीय राजनीति में मायावती एक रहस्यमई ताकत रखती है। वर्तमान समय मे ब्राह्मण समाज और बनियों लोगों का बहुजन समाज पार्टी में मिलाने और उन्हें पार्टी में शामिल करने के प्रयासों में आगामी 7 – 8 महीनों में होने वाले चुनाव से पहले अभी से पार्टी में हलचल शुरू हो गई है।
बसपा प्रमुख मायावती उत्तर प्रदेश में होने वाले 2022 के चुनाव में क्या गुल खिलाएगी यह तो अभी से बता पाना बहुत मुश्किल है लेकिन बसपा प्रमुख राजनीति की चौपड़ की क्या विसात बिछाती है यह तो उनकी रहस्यमयी ताकत ही जानती है लेकिन यह तो मानना पड़ेगा किबसपा के बगावती नेताओं के बाहर जाने के बाद भी बसपा पहले से कहीं और अधिक मजबूत हुई है। यह बात उनके विरोधी स्वमं अनुसूचित जाति के नेताओं ने उनके इस पैतडेबाजी को दलितों के साथ विश्वासघात करने जैसी ही बात करार जरूर दिया है लेकिन यह भी सत्य है कि उत्तर प्रदेश में ऐसे जातिगत समझौते से बसपा को हमेशा फायदा ही हुआ है और उनके समर्थक शायद इस विषय में एकमत है कि मायावती उत्तर प्रदेश में एक उम्मीद की किरण है।
बता दें कि वर्ष1994 में मायावती पहली बार राज्यसभा सांसद बनीं थी। इसके ठीक एक वर्ष बाद1995 में गठबंधन की सरकार में वह मुख्यमंत्री बनीं उस समय तक मायावती उत्तर प्रदेश राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री थीं।

मायावती ने उत्तर प्रदेश की सत्ता को हथियाने के लिये अपने सिंबल हाथी को सत्ता की कठिन चढ़ाईयों को पार करना पड़ा तो मायावती ने उसे भी सहर्ष स्वीकार किया। मायावती को सत्ता हासिल करने के लिए कईं तरह के शर्तो को स्वीकार करना पड़ा लेकिन ऐसे सौदों की उपयोगिता या प्रसंगिगता समाप्त होते देख कर मायावती ने बड़ी मुस्तैदी के साथ उनसे अपने आपको दरकिनार कर लिया।
बीएपी संस्थापक काशीराम के जीवित रहने के दौरान मायावती ने इस तरह के विशेष परिस्थियों को साधने में महारथ हासिल की करने और उसके अनुरूप सुश्री मायावती हमेशा सटीक निशाना लगाने में कामयाब रही। उन्होंने हमेशा अपने दम-खम ऊर्जा का संचय कर उसे एक दिशा में प्रत्यारोपित किया जिससे वे अपने मूल लक्ष्य से कभी भटकी नहीं। बहुजन समाजपार्टी ने अभी हाल ही उत्तर प्रदेश में हुये जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव से अपने आपको दूर रख कर यह यह साबित कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर मायावती कठोर से कठोर निर्णय पार्टी हित में लेने के लिये हमेशा तैयार रहती है और इस तरह के कदमो को उठाना केवल एक ही बात साबित करती है कि ऐसी हिम्मत केवल एक चतुर व दूरदृष्टि रखने वाला नेता ही उठा सकता है।

बसपा प्रमुख जब उत्तर प्रदेश की शासन सत्ता की बागडोर संभालते हुए एक परिपक्व राजनेता के रूप में उत्तर प्रदेश में प्रत्येक समुदाय के लोगों के बीच लोकप्रियता हासिल की। बीएसपी पुनः उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आते ही ज्यादातर ब्राह्मण, वैश्य जनप्रतिनिधि स्वतः ही बासपा में शामिल होते दिखना स्वभाविक सी बात है और जैसा कि मौजूदा समय मे होते हुए दिखाई देने भी लगा है। आज निश्चित रूप से मायावती महत्वपूर्ण संभावनाओं वाली एक राजनेता के रूप में भारतीय राजनीति क्षेत्र में हमारे सामने हैं जिन्होंने पिछड़े समुदाय के लोगों के मध्य एक सफल राजनेता के रूप में अपने आप को एक पहचान दिलवा कर स्थापित किया है।







