नया खद्दर सिलवाकर,
घर-घर में जाकर,
आज वोट मांग रहे हैं नेता जी।
कल तक नहीं मिलते थे,
अपने घर में,
आज गरीब के दरवाजे पर,
दांत चियार रहे हैं नेता जी।
दारू आरू की नहीं कमी है,
उनके दरवाजे पर,
खूब नाच रहे हैं चमचे,
गाजे-बाजे पर,
दारू की नदी बहा रहे हैं नेता जी।
आज घर-घर जाकर
वोट मांग रहे हैं नेता जी।
कर लो सौदा तूं भी,
भावना में तूं ना बहना।
मांग लो अपनी औकात भर,
फिर आगे ना कुछ उनसे कहना।।
कल अपने दरवाजे भी
नहीं मिलेंगे नेता जी।
आज घर-घर जाकर
वोट मांग रहे हैं नेता जी।
आखिर तूं भी तो बिक जाते हो,
दारू व जाति पर,
फिर क्यों करते हो विकास बातें।
जब अभी निचोड़ रहे नेता को,
तो फिर क्यों कहते नेता नहीं आते।।
सबकी अपनी-अपनी मजबूरी है,
आज जनता व नेता के बीच एक दूरी है।
आज उड़ा लो खूब गुलछर्रे,
फिर न कहना नहीं आते नेता जी।
कल अपने दरवाजे भी
नहीं मिलेंगे नेता जी।
आज घर-घर जाकर
वोट मांग रहे हैं नेता जी।
- उपेंद्र राय







