रत्नेश कुमार
डिजिटल क्रांति के इस दौर में राजनीति की भाषा और तेवर दोनों बदल चुके हैं। आज जब हम अपने आस-पास देखते हैं, तो समाज में एक अजीब सी छटपटाहट और हताशा साफ महसूस होती है। यह हताशा उस आम नागरिक, उस बेरोजगार युवा की है जो रोज सुबह एक नई उम्मीद के साथ उठता है, लेकिन शाम को कमरतोड़ महंगाई और नौकरी की अंतहीन तलाश के बोझ तले दबकर घर लौट आता है। ऐसे माहौल में जब देश के किसी बड़े संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा देश के भविष्य यानी युवाओं की तुलना कथित तौर पर ‘कॉकरोच’ जैसे कीड़े से कर दी जाए, तो वह घाव सीधे आत्मसम्मान पर लगता है।
कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म इसी गहरे अपमान, सुलगते जन-आक्रोश और व्यवस्था के खिलाफ उपजे तीखे व्यंग्य की कोख से हुआ है। पहली नजर में यह नाम अजीब या घिनौना लग सकता है, लेकिन सच तो यह है कि यह नाम इस देश के आम आदमी की उस बेबसी का प्रतीक बन गया है, जहां वह खुद को सत्ता की नजरों में उतना ही तुच्छ और उपेक्षित महसूस कर रहा है। इंटरनेट के आभासी संसार में इस नवोदित पार्टी ने महज पांच दिनों के भीतर नब्बे लाख से अधिक फॉलोअर्स जुटाकर जो तूफान खड़ा किया, उसने देश के स्थापित और दशकों पुराने राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है। यह कोई सामान्य घटना नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में पनपी एक ऐसी मूक क्रांति है जिसने परंपरागत राजनीति के अहंकार को झकझोर कर रख दिया है।
रिकॉर्ड तोड़ बेरोजगारी, महंगाई, तीव्रता से बढ़ती आर्थिक और असमानता की खाई, सार्वजनिक संसाधनों का चुनिंदा औद्योगिक घरानों के हाथों में सिमटना और नफरत का बढ़ता दायरा, जातीय हिंसा, सांप्रदायिक हिंसा आदि तमाम अव्यवस्थाओं से जब सिस्टम पूरी तरह आंखें मूंद लेती है, तब जनता का गुस्सा किसी न किसी रूप में फूटता ही है। इस बार वह गुस्सा किसी सड़क पर लाठियां खाने नहीं उतरा, बल्कि उसने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाया। महज पांच दिनों में इस आभासी संगठन का सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी जैसे विशाल नेटवर्क वाले दल से भी बड़ा हो जाना इस बात का साक्ष्य है कि देश का युवा अपने असल मुद्दों पर बात करने के लिए कितना तड़प रहा था।
जब इस पार्टी ने आम आदमी की अस्मिता की लड़ाई को मुख्यधारा में ला दिया और जनहित के सवालों को इतनी तेजी से उठाया कि वे ट्रेंड करने लगे, तो स्थापित सत्ता के भीतर एक गहरा डर बैठ गया। यह डर इस बात का था कि जिस युवा वोटर को वे अब तक धर्म, जाति और राष्ट्रवाद के कॉकटेल से प्रभावित करते आ रहे थे, वह अचानक अपने हकों और अपने अपमान के खिलाफ एक अदृश्य झंडे के नीचे एकजुट होने लगा है। सत्ता की इस घबराहट ने ही उस दमनकारी तंत्र को सक्रिय किया जो हर उठती हुई आवाज को कुचलने के लिए जाना जाता है।
जैसे ही इस आभासी आंदोलन की गूंज सत्ता के गलियारों तक पहुंची, वैसे ही इसे नेस्तनाबूद करने के लिए एक सुनियोजित और भारी-भरकम अभियान शुरू कर दिया गया। जब सत्ता सीधे तर्कों से नहीं लड़ पाती, तो वह बदनामी और भ्रम का सहारा लेती है। इस नवोदित पार्टी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए सत्ताधारी दल के आईटी सेल और मुख्यधारा के गोदी मीडिया ने जी-जान लगा दी। रातों-रात इस आंदोलन को एक साजिश और डिजिटल पीआर स्टंट साबित करने की कहानियां बुनी जाने लगीं।
महाराष्ट्र के रहने वाले और वर्तमान में अमेरिका में रह रहे अभिजीत दिपके नामक व्यक्ति के पुराने राजनीतिक इतिहास को खंगालकर यह प्रचारित किया गया कि यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी द्वारा प्रायोजित एक टूल है। लोकतंत्र की यह कड़वी हकीकत है कि जब भी कोई नागरिक आंदोलन खड़ा होता है, तो सत्ता उसके पीछे किसी न किसी राजनीतिक चेहरे को ढूंढकर उसकी साख पर हमला करती है। आलोचकों और डेटा विश्लेषकों के हवाले से यह नैरेटिव चलाया गया कि चूंकि पोस्ट्स पर लाइक्स की संख्या फॉलोअर्स के अनुपात में कम है, इसलिए ये नब्बे लाख फॉलोअर्स असली नहीं बल्कि पैसे देकर खरीदे गए बॉट्स या फर्जी अकाउंट्स हैं। गोदी मीडिया के कैमरों और बहसों ने इस विसंगति को देश की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती की तरह पेश करना शुरू कर दिया, ताकि आम जनता के मन में इस आंदोलन के प्रति संदेह पैदा किया जा सके।
सत्ता के इस तीखे पलटवार और आईटी सेल के इस आक्रमण की असल वजह यह है कि वे इस बात को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं कि कोई आभासी शक्ति उनके स्थापित सूचना तंत्र को इतनी आसानी से पछाड़ दे। जो मीडिया महीनों तक युवाओं की बेरोजगारी और महंगाई पर मौन रहता है, वह अचानक पांच दिन की इस पार्टी को बदनाम करने के लिए घंटों के स्लॉट अलॉट करने लगा। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि यह नवोदित आभासी पार्टी सीधे निशाने पर लग चुकी थी। हालांकि, सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि डिजिटल युग में नागरिकों को भी अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता होती है। जब हम व्यवस्था की मनमानियों पर सवाल उठाते हैं, तो हमें यह भी देखना होगा कि हमारी वास्तविक पीड़ा, हमारी बेरोजगारी और हमारी लाचारी का इस्तेमाल पर्दे के पीछे बैठा कोई पीआर तंत्र अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए न कर ले।
सोशल मीडिया पर जो कुछ भी रातों-रात वायरल होता है, उसकी प्रामाणिकता की जांच करना एक जागरूक नागरिक का कर्तव्य है। लेकिन सत्ता द्वारा इस आंदोलन को पूरी तरह खारिज करने और इसके पीछे केवल फर्जी बॉट्स का खेल बताने की थ्योरी भी गले नहीं उतरती। अगर यह सिर्फ बॉट्स का खेल होता, तो सत्ता का पूरा तंत्र, उसके बड़े नेता और पूरा मीडिया नेटवर्क इस तरह अपनी पूरी ताकत झोंककर इसे कुचलने में न लगा होता। वे डरे हुए हैं क्योंकि वे जानते हैं कि कॉकरोच भले ही एक तुच्छ जीव हो, लेकिन जब वह घरों की दीवारों से निकलकर सत्ता के सिंहासनों की तरफ बढ़ने लगता है, तो वह व्यवस्था की सड़न को उजागर कर देता है। आज के इस दौर में जनता के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने आत्मसम्मान के लिए लड़े, अपनी आवाज बुलंद करे, लेकिन साथ ही हर उस आभासी चेहरे के प्रति भी सचेत रहे जो उनके आक्रोश को अपना मोहरा बनाना चाहता है। चेतना, तीखे सवाल और सतर्कता का यही संतुलन ही असल में इस देश के लोकतंत्र को जिंदा रख सकता है।







