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    बीपी को न करें नजरअंदाज, गर्भस्थ शिशु की सेहत रहेगी दुरुस्त

    ShagunBy ShagunJanuary 17, 2024Updated:January 17, 2024 इंडिया No Comments5 Mins Read
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    लखनऊ, 17 जनवरी: भारत में गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप की घटना 5% से 15% तक होती है, जबकि इक्लैम्प्सिया की घटना लगभग 1.5% है। वहीं उत्तर प्रदेश में, गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप का प्रसार विभिन्न अध्ययनों से 4.01% से 10% तक होता है। यह कहना है डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की डॉ मालविका मिश्रा का। एक मुलाकात में उन्होंने बताया कि गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप का प्रबंधन बहुत आवश्यक है। बीपी असंतुलित रहने पर मां को फिट्स (दौरा) आने की आशंका रहती है। यह बहुत ही गंभीर स्थिति होती है। इसमें मां अचानक बिना किसी सूचना के अपने शरीर का नियंत्रण खो देती है और कुछ भी दर्दनाक होने की आशंका बढ़ जाती है। हालांकि सही देखभाल से हम समस्याओं का सामना कर सकते हैं।

    डॉ मालविका मिश्रा

    डॉ मालविका मिश्रा ने बताया कि ठंड में हार्ट अटैक की घटनाएं ज्यादा होती हैं और इस मौसम में ब्लड प्रेशर सही रख पाना एक चुनौती है। खासकर गर्भवती महिलाओं को। हर गर्भवती को अपना ब्लड प्रेशर नियमित चेक करते रहना चाहिए। यह गर्भस्थ शिशु के विकास में सहायक होता है। ब्लड प्रेशर दुरुस्त रहने से गर्भस्थ शिशु को आवश्यक विटामिन और प्रोटीन मिलता रहता है। साथ ही इससे उसका वजन भी संतुलित रहता है।

    उन्होंने बताया कि हाई ब्लड प्रेशर से समय से पूर्व डिलीवरी की आशंका रहती है। वहीं अगर महिला को गर्भावस्‍था के दौरान हाई ब्‍लड प्रेशर की समस्‍या है तो प्रसव के 20 सप्‍ताह बाद हृदय संबंधी बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है। मैं अपील करती हूं कि गर्भवती महिलाएं नियमित चेकअप्स कराएं। अपने डॉक्टर के साथ समय-समय पर बातचीत करें। इससे वह भी स्वस्थ रहेंगी और उनका बच्चा भी स्वस्थ पैदा होगा।

    क्यों दें ध्यान

    1. गर्भावस्था उच्च रक्तचाप मां व शिशु दोनों के लिए अहम है। यह स्थिति शिशु के स्वास्थ्य पर कई नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। जैसे–
    2. प्लासेंटल प्रॉब्लम्स: उच्च रक्तचाप के कारण गर्भनाल (प्लासेंटा), जो शिशु को पोषण पहुंचाती है, में समस्याएं हो सकती हैं। यह शिशु को पर्याप्त पोषण पहुंचाने में कठिनाई पैदा कर सकता है।
      शिशु का विकास में कमी: यह स्थिति शिशु के विकास को प्रभावित कर सकती है और शिशु का वजन कम हो सकता है।
    3. प्रीमेच्योर का जोखिम: उच्च रक्तचाप के कारण प्रीमेच्योर डिलीवरी का जोखिम बढ़ सकता है, जिससे शिशु को जन्म से पहले होने वाले समस्याएं हो सकती हैं।
      लो बर्थ वेट: उच्च रक्तचाप से जुड़ी समस्याएं शिशु का वजन कम होने का कारण बन सकती है, जिससे शिशु को जन्म के बाद स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

    हर गर्भवती क्या करें :

    • नियमित जांचें: सबसे खास है कि गर्भवती महिलाएं नियमित एंटीनेटल चेकअप के लिए डॉक्टर से मिलें। इससे समस्याएं सही समय पर पहचानी जा सकेंगी और सही दिशा में उपचार हो सकेगा।
    • स्वस्थ आहार: आहार का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है। उच्च रक्तचाप वाली महिलाओं को कम नमक, पूरे अनाज, ताजगी से भरपूर फल और सब्जियां खानी चाहिए।
    • नियमित व्यायाम: संतुलित और नियमित व्यायाम से हम रक्तचाप को नियंत्रित रख सकते हैं। योग और प्राणायाम भी फायदेमंद हो सकते हैं।
    • स्थिति की समझदारी: महिलाओं को अपनी स्थिति को समझने और उसके साथ सहयोग करने के लिए अपने डॉक्टर से खुलकर बातचीत करनी चाहिए। यह मार्गदर्शन और समर्थन प्रदान कर सकता है।

    बीपी के लक्षण:

    सिर में दर्द, सांसों का तेज चलना और कई बार सांस लेने में तकलीफ होना, तनाव होना, सीने में दर्द की समस्या, आंखों से दिखने में परिवर्तन होना जैसे धुंधला दिखना, पेशाब के साथ खून निकलना, सिर चकराना, थकान और सुस्ती लगना, नाक से खून आना, नींद न आना, दिल की धड़कन बढ़ जाना आदि बीपी असंतुलित होने के लक्षण हैं।

    एनएफएचएस में भी शामिल हुआ बीपी:

    डॉक्टर लक्ष्मण सिंह, महाप्रबंधक, राष्ट्रीय कार्यक्रम, गैर संचारी रोग ने बताया कि नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या आरोग्य मंदिर में अपना बीपी चेक कराएं। गर्भवती महिलाओं के लिए गर्भवस्था में निःशुल्क चार जरूरी जांच कराने की व्यवस्था है। साथ बीपी के मरीज गर्भवती माताओं के लिए हेयर सेन्टर पर रेफर किया जाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) सर्वे में भी गैरसंचारी रोग जैसे दिल की बीमारी को शामिल करते हुए हाईपरटेंशन को भी शामिल किया गया है। वर्ष 2019-21 में हुए एनएफएचएस -5 सर्वे में महिलाओं और पुरुषों दोनों में बीपी का आंकड़ा दर्ज किया गया।

    क्या बला है बीपी: 

    हमारी नसों में खून लगातार दौड़ता रहता है और इसी रक्त के जरिए शरीर के सभी अंगों तक ऊर्जा और पोषण के लिए जरूरी ऑक्सीजन, ग्लूकोज, विटामिन्स, मिनरल्स आदि पहुंचते हैं। ब्लड प्रेशर उस दबाव को कहते हैं, जो रक्त प्रवाह की वजह से नसों की दीवारों पर पड़ता है। आमतौर पर ये ब्लड प्रेशर इस बात पर निर्भर करता है कि हृदय कितनी गति से रक्त को पंप कर रहा है और रक्त को नसों में प्रवाहित होने में कितने अवरोधों का सामना करना पड़ रहा है। 130/80 एमएमएचजी से ज्यादा रक्त का दबाव हाइपरटेंशन या हाई ब्लड प्रेशर की श्रेणी में आता है लेकिन अगर किसी महिला का रक्‍तचाप कई दिन तक 140/90 बना रहता है तब उसे हाई ब्‍लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) का मरीज माना जाता है। ब्‍लड प्रेशर दो तरह से नापा जाता है। पहला है सिस्टोलिक और दूसरा है डायस्टोलिक। सोते समय या आराम करते समय सामान्य रक्‍तचाप में उच्‍चतम रीडिंग यानी सिस्टोलिक 100 से 140 तक और डायस्‍टोलिक यानी निचली रीडिंग 60 से 90 के बीच होती है।

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