राहुल कुमार गुप्ता
बबेरू: समय की रेत जब मुट्ठी से फिसलती है, तो सबसे अधिक दर्द उन पदचिन्हों के मिटने का होता है जिन्होंने हमें चलना सिखाया। आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ बबेरू की पावन माटी की वो पुरानी धरोहरें, वो जीवंत इतिहास और हमारे अग्रजों/पूर्वजों की वो दूसरी पीढ़ी, जो अब तक हमारा मार्गदर्शन कर रही थी, धीरे-धीरे अनंत की यात्रा पर प्रस्थान कर रही है।
यह देखना अत्यंत हृदयविदारक है कि बाबा के जमाने के बाबा के खास मित्रों का भी बाबा के बाद से जाना बहुत दुख भरा पल होता है, जैसे बहुत कुछ खोते जा रहे हैं। जिन कंधों पर बैठकर हमने दुनिया देखी, आज वही कंधे समय के आगोश में विलीन हो रहे हैं। वे चेहरे, जिनकी झुर्रियों में अनुभवों की समृद्ध किताब लिखी थी और जिनकी आवाज़ में अनुशासन के साथ ममत्व की मिठास थी, अब केवल स्मृतियों का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
वह पीढ़ी हमारे लिए केवल परिजन नहीं, बल्कि संस्कारों की जीवित पाठशाला थी। धीरे धीरे उस पीढ़ी को बबेरू की माटी से दूर होता देख, एक मौन दर्द हृदय को गहरा आघात दे जाता है। इन सबके साथ बबेरू की वो पुरानी लोक-परंपराएं और किस्से भी मौन हो रहे हैं।
वक्त बड़ा निर्मम होता है, वह सबकुछ अपनी गोद में समेट लेता है। आज आँखें नम हैं और मन उन यादों के बोझ से भारी है, जिन्हें हम संजोकर रखना चाहते हैं। वह पीढ़ी अब भौतिक रूप से हमसे दूर हो रही है, पीछे छोड़ जा रही है एक ऐसा खालीपन जिसे आधुनिकता की कोई भी चकाचौंध नहीं भर सकती।
पुरखों की वो विरासत, वो बरगद की छांव सा सुकून,अब धुंधला रहा है। हम केवल उनके बताए रास्तों पर चलकर ही उस महान युग को अपने भीतर जीवित रख सकते हैं।
यह केवल एक विदाई नहीं, बल्कि एक युग का मौन अवसान है। हमारी स्मृतियों के गलियारों में वे हमेशा एक ध्रुवतारे की तरह चमकते रहेंगे, जो हमें सही दिशा दिखाते रहेंगे। बबेरू से आज बाबा जी के एक मित्र और शानदार व्यक्तित्व महाराज विष्णु चौबे जी जिनका आशीर्वाद और मार्गदर्शन हम सब को मिलता रहा, बबेरू में एक बड़ा खालीपन देकर आज वो भी अनंत यात्रा के लिए चले गए।
ये दर्द अकेला नहीं है ये बार-बार आता है जब जब बबेरू से एक शानदार पीढ़ी का अवसान होता दिखता है। प्रकृति का ये नियम है, यही सत्य है सबको जाना है पर जो बहुत से लोगों के हृदय में मीठी यादों के रूप में बस जाए वही अपना जीवन भी सार्थक कर जाता है।






