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    Home»ब्लॉग

    किताबें लोगों को जोड़ती हैं नफरत नहीं सिखातीं

    ShagunBy ShagunApril 11, 2025 ब्लॉग No Comments8 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    देश की आजादी को दस साल ही हुए थे और उस समय देश के नीति निर्माताओं को समझ आ गया था कि पठनशील और वैज्ञानिक सोच के सामज के बगैर देश के विकास की गति संभव नहीं । शायद उस दौर में दुनिया में ऐसी संस्थाएं विकसित देशों में भी दुर्लभ थीं ,भारत में किताबों के प्रोन्नयन और प्रकाशन के लिए 01 अगस्त 1957 को नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया की स्थापना कर दी गई । पंडित नेहरू के लिए इसका मकसद, किफायती दाम में अच्छे साहित्य को प्रकाशित करना और उसे लोगों के घरों तक पहुंचना व लोगों को किताबों के प्रति प्रोत्साहित करना था। नेहरू जी ने कल्पना की थी कि एनबीटी एक नौकरशाही मुक्त संस्था होगी और इसी लिए इसे गांधी जी के न्यासी सिद्धांत के अनुरूप एक स्वतंत्र निकाय के रूप में स्थापित किया । उनका सपना था कि एनबीटी ‘पुस्तक अस्पताल’ के रूप में काम करे। ट्रस्ट की पहली किताब ही बच्चों के लिए छपी और और आज भी गुणवत्तापूर्ण, वैज्ञानिक सोच और काम दाम की किताबों के लिए ट्रस्ट पहचाना जाता है ।

    नेशनल बुक ट्रस्ट को दुनिया में नेहरू के सपनों की संस्था के रूप में पहचान मिली । बात 2007 की है । कराची पुस्तक मेले का उदघाटन सिंध विधानसभा के स्पीकर ने किए और जर्मनी के कौनसुलेट उसके मुख्य अतिथि थे। स्पीकर ने अपने भाषण में कम से काम तीन बार भारत की प्रगति, “वाय टू के “ में भारत के कंप्यूटर इंजीनियर्स के कामल का जिक्र किया। उदघाटन के बाद जब मेरी उनसे बात हो रही थी और मेरा सवाल था कि जब हम दोनों देश एक साथ आजाद हुए तो आप क्यों पिछड़ गए ? उन्होंने कहा कि आपके यहाँ नेहरू था जिन्होंने ढेर सारे महकमे बनाए और उन्हें काम करने की आजादी दी । उन्होंने खान कि पाकिस्तान में किताबों के लिएब केवल एक विभाग है – पाकिस्तान बुक फाउंडेशन जबकि भारत में नेशनल बुक ट्रस्ट, एन सी ई आर टी , साहित्य अकादमी जैसे दर्जन भर विभाग हैं जो सरकार के बंधन से मुक्त हैं। बहुत फकर महसूस हुआ कि हमारे घोर दुश्मन देश के नेता इस तरह से सोचते हैं । नेशनल बुक ट्रस्ट की लंबी यात्रा में कई बड़े लेखक , विचारक इसके अध्यक्ष और न्यासी मण्डल के सदस्य हुए । सरकारें आती -जाती रही लेकिन किसी किताब को रोकने की जरूरत पड़ी नहीं । कोई 55 भारतीय भाषाओं में 18 हजार से अधिक किताबें । अलग-अलग पाठकवर्ग के लिए अलग अलग पुस्तकमालाएं और उन पुस्तकमालाओं के अलग से लोगो—इतना बड़ा किताबों का ब्रांड दुनिया में नहीं हैं । खासकर बच्चों की किताबें तो नेशनल बुक ट्रस्ट की विशिष्ठ पहचान रही । इस पुस्तकमाला का नाम पंडित नेहरू के देहावसान के बाद “नेहरू बाल पुस्तकालय “ रखा गया और इस श्रंखला की किताबों पर गुलाब का फूल होता था जो इसकी पहचान था ।

    एक बात और जान लें भले ही संस्थान की स्थापना पंडित नेहरू ने की लेकिन सन 90 तक नेहरू पर एक ही किताब संस्था ने छापी – तारा अली बेग की बच्चों के लिए नेहरू पर पतली सी किताब। उसके बाद अर्जुनद एव के सम्पादन में “जवाहरलाल नेहरू संघर्ष के दिन “ किताब आई जिसमें नेहरू के चुनिंदा लेखन को संकलित किया गया था। सन 1996 में नवसाक्षर पुस्तकमाला ( जो साक्षरता अभियान से साक्षर बने प्रौढ़ लोगों के लिए बनाई गई थी ।) में देशराज गोयल कि दो पतली-पतली किताबें आई- ‘बात जवाहरलाल की’ और ‘याद जवाहरलाल की’। उसके बाद संन 2005 मे पी डी टंडन ने “अविस्मरणीय नेहरू” शीर्षक से एक किताब युवाओं के लिए लिखी। इंदिरा गांधी पर इन्द्र मल्होत्रा की किताब 2009 मे आई और उसमें इंदिरजी की कई जगह तगड़ी आलोचना है । राजीव गांधी पर कोई किताब नहीं हैं । आखिर संस्थान का इरादा अच्छी किताबे पाठकों की अभिरुचि परिष्कृत करने का था न कि सरकार के प्रचार का । न्यासी मंडल के सामने नेहरू के सपनों का ‘बुक अस्पताल ‘ रहा ।

    नेशनल बुक ट्रस्ट के प्रकाशन का उद्देश्य बाजार को यह बताना था कि एक बेहतर पुस्तक कैसी हो ? कई दशक तक नेशनल बुक ट्रस्ट और उसके बाद चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट की किताबें बच्चों के लिए मानक बन कर बाजार में रही। मुक्त व्यापार व्यवस्था और तकनीकी में गुणवत्ता आने के बाद एक तरफ विदेशी किताबों का प्रभाव आया तो हमारी पारंपरिक सोच की बाल पुस्तकों – पंचतंत्र, पौराणिक कथाओं , प्रेरक कथाओं आदि में भी बदलाव आया । हिंसा, अभद्र भाषा, बदला, आदि से दूर, लैंगिक समानता, जाती-धर्म में सौहार्द , वैज्ञानिक सोच आदि विषय बाल साहित्य के लिए अनिवार्य बनते गए। सरकार बदलते ही बच्चों की किताबों का हाल भी बहाल होता गया। खासकर मोदी सरकार-2 के बाद किताबों में अवैज्ञानिक तथ्य , नफरत से जुड़ी बाटने बढ़ती गई । इसे लापरवाही कहें या फिर सुनियोजित कि वर्ष 2024 में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा सबसे पहले बच्चों की जो किताब छापी गई वह थी खाटू श्याम पर और उसके चतुर्थ कवर पर एक व्यक्ति की कटी गरदन ले कर खड़े व्यक्ति का चित्र है। दुनिया में कहीं भी आज बाल साहित्य में इस तरह के अमानवीय चित्र की अनुमति नहीं देता। पौराणिक और लोक कथाओं को बच्चों के लिए चुनते समय यह ध्यान दिया जाता है कि उसमें हिंसा या ताकत पाने के लिए कुटिलता का इस्तेमाल न हो। नेशनल बुक ट्रस्ट इससे पहले मनोज दास जैसे महान लेखक की कृष्ण कथा बच्चों के लिए छाप चुका है लेकिन उस किताब में नृशंस हिंसा देखने को नहीं मिलती। ऐसी ही एक हास्यास्पद किताब अंग्रेजी में चन्द्र यान अभियान पर है और इसके कवर पर किसी वैज्ञानिक नहीं, नरेंद्र मोदी का फोटो लगाया गया है . जाहिर है कि किताब का उद्देश्य चन्द्र यान अभियान की जानकारी देने से ज्यादा प्रधान मंत्री का प्रचार करना है .किताब के चौथे कवर पर भी वैज्ञानिकों की जगह मोदी जी को इसका श्रेय दिया जा रहा हैं । सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि ऐसी किताबों के लेखक या तो स्वयं ट्रस्ट के निदेशक हैं या उनकी पत्नी । उल्लेख करना होगा कि निदेशक की पत्नी उत्तराखंड न्यायिक सेवा में थीं और और कुछ साल पहले इनके घर से एक नाबालिग लड़की को बुरी तरह घायल और उत्पीड़ित अवस्था में कलेक्टर और हाई कोर्ट के जज ने जब्त किया था । उसके बाद उनकी सेवाएं बर्खास्त कर दी गई थीं। जो बाल उत्पीड़न के कारण हाई कोर्ट से दोषी पाया गया हो वह अब बच्चों का लेखक हैं ।

    सन 2014 के बाद नेशनल बुक ट्रस्ट में बहुत से बदलाव हुए और उसमेंसबसे अधिक बदलाव का उद्देश्य यह रहा कि संस्थान में जहां-तहाँ नेहरू का नाम हो, मिटा दिया जाए । शुरुआत में ‘ नेहरू बाल पुस्तकालय’ पुस्तकमाला के कवर पेज के लोगों _ गुलाब के फूल को हटाया गया । लगा कि गुलाब का फूल नेहरू की निशानी है । फिर हर साल 14 से 20 नवंबर तक देश के दूरस्थ अंचलों तक “राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह” मनाया जाता था । इसके तहत छोटे छोटे स्कूलों तक तरसुत किताबों से जुड़ी गतिविधियों का फ़ोल्डर भेजता, पोस्टर भेजता , सैंकड़ों जगह किताबों की प्रदर्शनी लगीं। गोष्ठी, सेमीनार, बच्चों की प्रतियोगिताएं होती। एक हफ्ते में औसतन सारे देश में 20 हजार आयोजन किताबों से जुड़े होते । सन 2015 के बाद यह आयोजन बंद कर दिए गए । क्योंकि इनकी शुरुआत 14 नवंबर पंडित नेहरू के जन्मदिन से होती थी , हालांकि आयोजन में कभी नेहरू के नाम का इस्तेमाल होता नहीं था ।

    नेशनल बुक ट्रस्ट दशकों तक दिल्ली के ग्रीन पार्क में किराये के भवन से संचालित होता रहा। सन 2008 में यह अपने भवन में वसंत कुंज आया और केंद्र सरकार के मानव संसाधन विभाग के अनुमोदन के बाद इस भवन का नाम नेहरू भवन रखा गए । पिछले तीन सालों में पहले नेशनल बुक ट्रस्ट की स्टेशनरी अर्थात लेटेर हेड, विजिटिंग कार्ड, वेब साइटे से “नेहरू भवन” शब्द को हटाया गया फिर किताबों में छपने वाले पते से भी “नेहरू भवन “ शब्द हटा दिया । पिछले दिनों प्रगति मैदान में सम्पन्न ‘ नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला ” का केन्द्रीय विषय था – भारत का संविधान। इस विषय पर लगी चित्रों और किताबों की प्रदर्शनी से नेहरू का बायकाट किया गया । हाल ही में ट्रस्ट की सबसे लोकप्रिय पुस्तकमाला – नेहरू बाल पुस्तकालय’ का भी नाम बदल कर “नेशनल बाल पुस्तकालय” कर दिया । कहने की जरूरत नहीं कि बीते 11 सालों में नेशनल बुक ट्रस्ट ने नरेंद्र मोदी की परीक्षा पर चर्चा से ले कर दर्जनों किताबें छाप दीं । हालांकि सूचना और प्रसारण मंत्रालय का ‘प्रकाशन विभाग’ सरकार के प्रचार-प्रसार की किताबें छपने के लिए नियत है लेकिन इस तरह से न केवल नेहरू के नाम बल्कि इस संस्थान को ले कर उनके सपनों को कुचला जा रहा है । किताबों में पारंपरिक ज्ञान के नाम अपर अंध विश्वास , हिंसा और नफरत भारी जा रही है।

    राजनेता एक इंसान होता है और उनकी गलत नीतियों की आलोचना लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है लेकिन हमारे देश के पहले और लंबे समय तक प्रधान मंत्री रहे, आजादी की लड़ाई में तीन दशक तक संघर्ष करने वाले और दरजनों भविषयोन्मुखी संसतहों की स्थापना करने वाले पंडित नेहरू के प्रति नफरत के भाव से इस तरह की हरकतें नेशनल बुक ट्रस्ट जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करती हैं। ट्रस्ट की स्थापना आका उद्देश्य केवल सरकारी आपूर्ति के लिए किताबें छापना कभी रहा नहीं । कभी कहते थे कि एनबीटी एक “असरकारी “ संस्था है, अब यह एक “सरकारी” महकमा बन कर रहा गया – केवल नेहरू से नफरत के उन्माद में । याद रखें , किताबें लोगों को जोड़ती हैं – नफरत नहीं सिखातीं।

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