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    Shagun News India
    Home»मानो या न मानो

    कभी किसी को चैलेंज मत करना !

    ShagunBy ShagunMay 12, 2025 मानो या न मानो No Comments6 Mins Read
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    धार्मिक आस्था का जीता-जागता प्रतीक: बिजनौर के नगीना में कुत्ता कर रहा हनुमान जी की लगातार परिक्रमा
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    एक बार की बात है एक पंडित जी रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। पंडित जी का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले “आइए हनुमंतजी बिराजिए” कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे।

    फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे। एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई।

    उन्हें लगा कि महाराज रोज “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे!

    अत: वकील साहब ने पंडित जी से पूँछ ही डाला- महाराज जी, आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं।

    हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उस पर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं?

    पंडित जी ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं।

    वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी।

    हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए ।

    आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं।

    महाराज जी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है । आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो।

    लेकिन वकील नहीं माना, वो कहता ही रहा कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे,इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं।

    इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा।

    मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हारकर पंडित जी महाराज ने कहा… हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा।

    कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।

    जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना।

    कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा।

    मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना।

    यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया।

    इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा।

    मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हारकर पंडित जी महाराज ने कहा… हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा।

    कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।

    जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना।

    कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा।

    मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना।

    यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया।

    पंडित जी ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ?…. यह तो सत्य की परीक्षा है।

    वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा।

    आप पराजित हो गए तो क्या करोगे?

    पंडित जी ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।

    अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे,वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए।

    काफी भीड़ हो गई। पंडाल भर गया।

    श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था।

    पंडित जी महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे… गद्दी रखी गई।

    पंडित जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले “आइए हनुमंत जी बिराजिए” ऐसा बोलते ही पंडित जी के नेत्र सजल हो उठे।

    मन ही मन पंडित जी बोले… प्रभु ! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है।

    मैं तो एक साधारण जन हूँ।

    मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना।

    फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया आइए गद्दी ऊँची कीजिए।

    लोगों की आँखे जम गईं । वकील साहब खड़े हुए।

    उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके !

    जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।

    पंडित जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके।

    तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए।

    वकील साहब पंडित जी महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है। अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूँ।

    लेकिन यह देख कर हैरान हुआ कि गाँव का एक भिखारी उससे पहले से ही मन्दिर में मौजूद था। अंधेरा था, वह भी पीछे खड़ा हो गया, कि भिखारी क्या मांग रहा है?

    धनी आदमी सोचता है, कि मेरे पास तो मुसीबतें हैं। भिखारी के पास क्या मुसीबतें हो सकती हैं?

    और भिखारी सोचता है, कि मुसीबतें मेरे पास हैं। धनी आदमी के पास क्या मुसीबतें होंगी?

    एक भिखारी की मुसीबत दूसरे भिखारी के लिए बहुत बड़ी न थी।

    उसने सुना, कि भिखारी कह रहा है-हे परमात्मा! अगर पांच रुपए आज न मिलें तो जीवन नष्ट हो जाएगा। आत्महत्या कर लूँगा। पत्नी बीमार है और दवा के लिए पांच रुपए होना बिलकुल आवश्यक है। मेरा जीवन संकट में है।

    अमीर आदमी ने यह सुना और वह भिखारी बंद ही नहीं हो रहा है, कहे जा रहा है और प्रार्थना जारी है, तो उसने झल्लाकर अपने खीसे से पांच रुपए निकाल कर उस भिखारी को दिए और कहा – जा, यह ले जा पांच रुपए, तू ले और जा जल्दी यहाँ से।

    अब वह परमात्मा से मुखतिब हुआ और बोला – “प्रभु! अब आप ध्यान मेरी तरफ दें, इस भिखारी की तो यही आदत है। दरअसल मुझे पांच करोड़ रुपए की जरूरत है।”

    भगवान मुस्करा उठे बोले – एक छोटे भिखारी से तो तूने मुझे छुटकारा दिला दिया, लेकिन तुझसे छुटकारा पाने के लिए तो मुझको तुमसे भी बढ़ा भिखारी ढूँढ़ना पड़ेगा। तुम सब लोग यहाँ केवल कुछ न कुछ माँगने ही आते हो, कभी मेरी जरूरत का भी ख्याल आया है?

    धनी आश्चर्यचकित हुआ बोला – प्रभु आपको क्या चाहिए?

    भगवान बोले – प्रेम! मैं भाव का भूखा हूँ। मुझे निस्वार्थ प्रेम व समर्पित भक्त प्रिय है। कभी इस भाव से मुझ तक आओ फिर तुम्हे कुछ माँगने की आवश्यकता ही नही पड़ेगी।

    Shagun

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