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    Home»बच्चों की दुनिया

    सयुंक्त परिवारों की कमी से अकेला होता बचपन

    ShagunBy ShagunJuly 3, 2025 बच्चों की दुनिया No Comments2 Mins Read
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    आज की भागदौड़ की तेज रफ्तार जिंदगी में सोशल मीडिया की कुछ मामलों में तो उपयोगिता हो सकती है और एकल परिवार के चलन के फायदे भी गिनाए जा सकते हैं पर घरों में बच्चों को पालने पोसने के पारंपरिक तौर तरीकों पर इनके दुष्प्रभावों से इंकार नहीं किया जा सकता। रात को सोने के वक्त बच्चों को कहानियां सुनाना या उनके लिए लोरियां गाना कभी हमारे पारिवारिक जीवन का खास हिस्सा था जिसमें दादी-नानी या माता-पिता द्वारा सुनाई जाने वाली परीकथाएं बच्चों को तनावमुक्त और सुखद नींद देने में मददगार होती थीं। किंतु पारिवारिक जीवन की यह अहम गर्माहट अब खत्म हो गई है।

    एक अध्ययन बताता है कि जेन जेड यानी 1996 से 2010 के बीच जन्मे युवा माता- पिता अब इस पारिवारिक ऊष्मा से मुंह मोड़ते जा रहे हैं। अब कहानियां सुनना-सुनाना इनके लिए ‘रचनात्मक मनोरंजन’ नहीं बल्कि थकाऊ काम हो गया है। डिजिटल मनोरंजन इन्हें ज्यादा सरल लग रहा है। पश्चिमी देशों से शुरू हुआ यह चलन अब भारत में भी व्यापक रूप से फैल चुका है। इसीलिए पंचतंत्र की कहानियों के बारे में अब बड़ी संख्या में लोग जानते ही नहीं । माना यह जाने लगा है कि पढ़ने से किसी भी रूप में मनोरंजन हो ही नहीं सकता बल्कि ये गंभीर पढ़ाई का ही एक माध्यम है।

    इसके लिए नई पीढ़ी के माता-पिता बच्चों को कहानी सुनाना बेकार की जिम्मेदारी मानते हैं क्योंकि बच्चों को टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर वगैरह देकर वे यह मान लेते हैं कि इन सबसे उसका मन तो बहल ही जाएगा। लेकिन यहीं से बच्चों की मानसिक दिशा- दशा अलग रास्ता पकड़ लेती है। सोच का दायरा बढ़ाने के लिए अनुभव व विरासत की बातें जानने से वे वंचित रह जाते हैं जबकि बड़ों की कहानियों में ये बातें इतनी कुशलता से पिरो दी जाती हैं कि वे बहुत स्वाभाविक तरीके से बच्चे के दिलो दिमाग पर असर कर जाती हैं। इसका एक कारण यह भी है कि दिनभर की नौकरी या कामधंधे के बाद थके-हारे माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय ही नहीं बचता और एकल परिवारों में कोई अन्य सदस्य होता ही नहीं जो यह जिम्मेदारी निभा सके।

    Shagun

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