मुंबई के मीरा-भायंदर में जोधपुर स्वीट्स के मालिक बाबूलाल खिमजी चौधरी के साथ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ताओं द्वारा मारपीट की घटना ने एक बार फिर भाषा के नाम पर हिंसा का पुराना ज़ख्म हरा कर दिया है। यह घटना, जिसमें एक दुकानदार को केवल इसलिए पीटा गया क्योंकि वह मराठी नहीं बोल रहा था, न केवल निंदनीय है, बल्कि यह महाराष्ट्र की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता पर भी गंभीर सवाल उठाती है। इस घटना के बाद मीरा-भायंदर के व्यापारियों ने बाजार बंद कर अपना आक्रोश जताया, जो इस बात का संकेत है कि समाज का धैर्य अब जवाब दे रहा है।
भाषा के नाम पर हिंसा और महाराष्ट्र की सियासी आग :
महाराष्ट्र में भाषा को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। MNS और कुछ अन्य क्षेत्रीय संगठनों ने समय-समय पर मराठी भाषा और संस्कृति के नाम पर हिंदी भाषी या उत्तर भारतीय प्रवासियों को निशाना बनाया है। इस बार की घटना ने न केवल हिंदी भाषी व्यापारियों में डर और गुस्सा पैदा किया है, बल्कि इसे एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे के रूप में उजागर किया है। पहले भी MNS कार्यकर्ताओं द्वारा बैंक कर्मचारियों, सिक्योरिटी गार्ड्स और अन्य गैर-मराठी भाषियों के साथ मारपीट की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। लेकिन इस बार, जब पीड़ित एक गैर-बिहारी, गुजराती मूल का व्यापारी निकला, तो मामला और तूल पकड़ गया। यह दर्शाता है कि समाज में पहले से सुलग रही चिंगारी अब आग का रूप ले चुकी है।
इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि MNS कार्यकर्ताओं ने न केवल हिंसा की, बल्कि इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित भी किया, जो उनकी बेशर्मी और कानून के प्रति अवहेलना को दर्शाता है। इससे भी अधिक निराशाजनक है पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता। सात आरोपियों को हिरासत में लिया गया, लेकिन कुछ ही घंटों में उन्हें मामूली धाराओं के तहत रिहा कर दिया गया। यह कानून-व्यवस्था की कमजोरी और राजनीतिक दबाव का स्पष्ट प्रमाण है। MNS नेताओं ने इस घटना का बचाव करते हुए दावा किया कि दुकानदार ने मराठी भाषा का “अपमान” किया, जो उनके कृत्य को जायज ठहराने का एक कमजोर बहाना है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भाषा के नाम पर गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लेकिन उनके जूनियर गृह मंत्री योगेश कदम का बयान कि “महाराष्ट्र में मराठी बोलनी ही होगी” इस मसले पर सरकार की दोहरी नीति को उजागर करता है। यह बयान न केवल हिंसा को अप्रत्यक्ष समर्थन देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कुछ राजनेता इस मुद्दे को सियासी रोटियां सेंकने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
इस बीच, बीजेपी नेता नितेश राणे ने MNS को चुनौती देते हुए पूछा कि क्या वे मुस्लिम व्यापारियों से मराठी बोलने की मांग करने की हिम्मत रखते हैं, या केवल हिंदू व्यापारियों को ही निशाना बनाया जाता है? यह सवाल न केवल MNS की नीति की पोल खोलता है, बल्कि यह भी बताता है कि भाषा का मुद्दा अक्सर सांप्रदायिक और क्षेत्रीय राजनीति से जोड़ा जाता है। शिवसेना (UBT) के नेता आदित्य ठाकरे ने भी इस मामले में तटस्थ रुख अपनाने की कोशिश की, लेकिन उनकी टिप्पणी कि “मराठी का अपमान नहीं होना चाहिए” अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा को उचित ठहराने जैसी प्रतीत होती है।
यह विवाद केवल भाषा का नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का भी है। मुंबई, जो भारत की आर्थिक राजधानी है, अपनी बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक पहचान के लिए जानी जाती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, मुंबई और इसके आसपास के क्षेत्रों में हिंदी भाषियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि मराठी भाषियों की संख्या स्थिर या थोड़ी कम हुई है। यह बदलाव आर्थिक प्रवास का परिणाम है, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से आए श्रमिकों और व्यापारियों के कारण। ऐसे में, भाषा के नाम पर हिंसा न केवल सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि मुंबई की आर्थिक प्रगति को भी खतरे में डालती है।
संसद में बीजेपी सांसद बृजभूषण सिंह का राज ठाकरे को ललकारना इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर ले गया है। हिंदी भाषी राज्यों के नेताओं और संगठनों का इस मामले में खुलकर सामने आना दर्शाता है कि यह अब केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा। यह एक ऐसे भारत के लिए खतरे की घंटी है, जहां संवैधानिक रूप से सभी भाषाओं को समान सम्मान प्राप्त है। इस घटना से हमें यह सीख लेने की जरूरत है कि भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने का मतलब दूसरों की भाषा या पहचान का अपमान नहीं हो सकता। महाराष्ट्र सरकार को चाहिए कि वह इस तरह की हिंसा पर सख्त कार्रवाई करे और यह सुनिश्चित करे कि कानून का शासन बना रहे। साथ ही, MNS जैसे संगठनों को यह समझना होगा कि हिंसा और डर से भाषा का सम्मान नहीं बढ़ाया जा सकता। मुंबई की आत्मा उसकी विविधता में बसती है, और इसे बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।
अंत में, यह पूछा जाना चाहिए: क्या हम एक ऐसे भारत की ओर बढ़ रहे हैं, जहां भाषा के नाम पर हिंसा को उचित ठहराया जाएगा? अगर हां, तो यह न केवल महाराष्ट्र, बल्कि पूरे देश के लिए एक खतरनाक संकेत है। समय है कि हम संवाद और सहिष्णुता को बढ़ावा दें, न कि घृणा और हिंसा को।







