राहुल कुमार गुप्ता
बाज़ार के इन रंगों में अब वो रूहानियत कहाँ है?
मशीनी चमक तो है, पर वो कुदरती नज़ाकत कहाँ है?
वो टेसू के फूलों का महकना, वो केसर की ख़ुशबू
वो मिट्टी की सोंधी सी रंगत, वो अपनों की मोहब्बत
अब तो रसायनों के ढेर में, फक़त नुमाइश है
दिलों में नफ़रत,चेहरे पे बनावटी पैमाइश है

मिट्टी से रिश्ता क्या छूटा, ज़मीर भी बेजान हो गया
अब तो ये त्यौहार भी, बाज़ार का सामान हो गया
दारू और नशे के दौर हैं अब, और शोर है तल्ख़ियों का
पाकीज़ा होली का दिन, मंज़र बना गुस्ताखियों का
वो भाईचारा, वो अपनापन, वो रस्म-ए-वफ़ा क्या हुई?
नशे और झगड़ों की धुंध में, वो हया क्या हुई?
ऐ दोस्त! देख ज़रा ये क्या हुआ, ये क्या हो रहा?
इंसान अपनी विरासत को, अपने ही हाथों खो रहा
“ऐ वक्त” लौटा दे फिर से वही सादगी, वही रंगों का नूर
कि होली फिर से होली लगे, मोहब्बत का बढ़े हुकूक







