राहुल कुमार गुप्ता
रंगों की विभिन्नताओं को एकसूत्र में पिरोती है होली।
विविधताओं की शान रहे बरकरार सिखाती है होली।।
मोहब्बत के गुलाल से फ़िज़ाओं में पैग़ाम हो जाए,
रंगों के इस त्यौहार में हर शिकवा तमाम हो जाए।
नज़ाकत से छुए गालों को जब ये सुर्ख अबीर,
हर लब पे खिलती हँसी का एहतमाम हो जाए।
मिट जाएँ तल्खियाँ और दिल हो जाएँ पाकीज़ा,
कि अब होली फिर से रफ़ाकत के नाम हो जाए।







