लखनऊ। नवाबी शहर लखनऊ में चल रहे पुस्तक मेले में इस बार एक खास ट्रेंड देखने को मिल रहा है हिन्दी और अंग्रेज़ी किताबों के साथ उर्दू साहित्य भी पाठकों के दिलों में जगह बना रहा है। रवीन्द्रालय चारबाग में सजे इस मेले में उर्दू किताबों के स्टॉल पर लगातार भीड़ उमड़ रही है।
मेले में विलायत पब्लिकेशन की किताबें खासा आकर्षण बनी हुई हैं। ‘दि स्टेटस ऑफ वुमेन’ जैसी किताब, जिसमें इस्लामी नजरिये से महिलाओं की भूमिका पर चर्चा है, पाठकों को खूब लुभा रही है। वहीं सैयद मोहम्मद तबा तबाई की ‘इस्लाम और आज का इंसान’ और सैयद अली खामेनेई की ‘दो सौ पचास साला इंसान’ भी तेजी से बिक रही हैं। इसके अलावा अवध के नवाबों, खासकर अमजद अली शाह पर आधारित किताबों में भी लोगों की दिलचस्पी साफ दिख रही है।
नेशनल बुक ट्रस्ट के स्टॉल पर उर्दू में इतिहास, साहित्य और राजनीति से जुड़ी किताबों का बड़ा संग्रह मौजूद है। यहां मिर्ज़ा ग़ालिब, फिराक गोरखपुरी, साहिर लुधियानवी, बलराज साहनी के साथ-साथ जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस पर आधारित किताबें पाठकों को आकर्षित कर रही हैं। वहीं ग्रीन पाम स्टॉल पर ‘उपनिवेशवाद का इतिहास’ पर आधारित 12 पुस्तकों का सेट चर्चा में है।
मेले का सांस्कृतिक रंग भी उतना ही गहरा रहा। डॉ. राखी बख्शी और मनीष शुक्ल द्वारा संपादित पुस्तक ‘अफसाना लिख रहा हूं’ का विमोचन पूर्व मंत्री व विधायक अनुपमा जायसवाल ने किया। इस अवसर पर कला और साहित्य जगत की कई हस्तियां मौजूद रहीं और पुस्तक की खूबियों पर चर्चा हुई।
दिन में आयोजित काव्य गोष्ठी में शहर के कवियों ने अपनी रचनाओं से माहौल को साहित्यिक रंग दिया। शाम होते-होते यह रंग और गहरा हो गया, जब मीर तकी मीर फाउंडेशन के मुशायरे में शायरी की महफिल सजी और श्रोताओं ने देर रात तक अदब का लुत्फ उठाया।
कुल मिलाकर, लखनऊ पुस्तक मेला इस बार सिर्फ किताबों का बाजार नहीं, बल्कि भाषाओं और संस्कृतियों के संगम का उत्सव बन गया है जहां उर्दू की मिठास ने हर किसी को अपना दीवाना बना लिया है।







