नवरात्रि के चौथे दिन का महत्व संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर ‘सर्वजन हिताय’ की भावना होती है जागृत
अलका शुक्ला
चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन सृष्टि की आदि-शक्ति ‘माँ कुष्मांडा’ को समर्पित है, जिनके मंद हास्य मात्र से ब्रह्मांड का अस्तित्व संभव हुआ। ‘कु’ का अर्थ है छोटा, ‘ष्म’ का अर्थ है ऊर्जा या ऊष्मा और ‘अंडा’ का अर्थ है ब्रह्मांडीय गोला। जब चारों ओर घना अंधकार था और सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था, तब माँ ने अपनी ‘ईषत’ (हल्की) मुस्कान से इस ‘अण्ड’ यानी ब्रह्मांड की रचना की। इसीलिए वे सृष्टि की आदि-स्वरूपा और आदि-शक्ति मानी जाती हैं। आठ भुजाओं वाली इन देवी के हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत-कलश, चक्र और गदा सुशोभित हैं, जबकि आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में माना जाता है, जो यह दर्शाता है कि केवल इन्हीं में सूर्य के समान प्रखर तेज को सहने की शक्ति है।
आध्यात्मिक धरातल पर माँ कुष्मांडा का सीधा संबंध हमारे शरीर के अनाहत चक्र या हृदय चक्र से है, जो हृदय के समीप स्थित है। योग विज्ञान के अनुसार, यह चक्र प्रेम, करुणा और जीवन की जीवनी शक्ति का केंद्र है। जब ऊर्जा मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपुर से ऊपर उठकर अनाहत तक पहुँचती है, तो साधक के भीतर का अहंकार गलने लगता है और वह संपूर्ण ब्रह्मांड के साथ एकरूपता का अनुभव करने लगता है। माँ कुष्मांडा की उपासना इस चक्र को सक्रिय कर व्यक्ति के भीतर ‘प्राण ऊर्जा’ का विस्तार करती है, जिससे उसे मानसिक शांति और स्पष्टता प्राप्त होती है। अनाहत चक्र का संतुलित होना व्यक्ति को भावनात्मक रूप से सुदृढ़ बनाता है और उसके व्यक्तित्व में एक चुंबकीय आकर्षण पैदा करता है।
इस स्वरूप के पीछे छिपा वैज्ञानिक आधार ‘कॉस्मोलॉजी’ और ‘थर्मोडायनामिक्स’ के सिद्धांतों से मिलता-जुलता संकेत देता है। माँ कुष्मांडा को ‘ऊष्मा’ का प्रतीक माना गया है, और विज्ञान कहता है कि ऊर्जा न तो पैदा की जा सकती है और न ही नष्ट, वह केवल रूपांतरित होती है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति के ‘बिग बैंग’ सिद्धांत में भी एक बिंदु से असीमित ऊर्जा के प्रसार की बात कही गई है, जिसे माँ की ‘मंद मुस्कान’ के रूप में प्रतीकात्मक रूप से समझाया गया है। सूर्यमंडल के भीतर उनका वास यह दर्शाता है कि वे सौर ऊर्जा की अधिष्ठात्री हैं, जो पृथ्वी पर जीवन का मुख्य आधार है। फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया, जिससे वनस्पति और जीवन चक्र चलता है, वह माँ कुष्मांडा की ऊर्जा का ही एक भौतिक रूप है।
नवरात्रि में चौथे दिन के लिए ‘नारंगी’ रंग का विशेष महत्व है, जो ऊर्जा, उत्साह और सूर्य के तेज का प्रतीक है। क्रोमोलॉजिस्ट मानते हैं कि नारंगी रंग अवसाद को दूर करने और रचनात्मकता को बढ़ाने में सहायक होता है। मनोविज्ञान के स्तर पर, माँ कुष्मांडा की पूजा हमें यह सिखाती है कि सृजन के लिए भीतर की मुस्कान और सकारात्मकता अनिवार्य है। जब हम तनाव में होते हैं, तो हमारी ऊर्जा संकुचित हो जाती है, लेकिन माँ का यह स्वरूप हमें अपनी ऊर्जा को ‘ब्रह्मांडीय विस्तार’ देने की प्रेरणा देता है। यह साधना का वह बिंदु है जहाँ भक्त संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर ‘सर्वजन हिताय’ की भावना से ओत-प्रोत होता है। माँ की अष्टभुजाएं दिशाओं पर नियंत्रण और सर्वव्यापकता का बोध कराती हैं, जो एक साधक को हर दिशा से आने वाली चुनौतियों का सामना करने का साहस प्रदान करती हैं।







