समाज में बढ़ता वैचारिक व्यभिचार और बढ़ रहा नफ़रत का संसार!
राहुल कुमार गुप्ता
इंसान आज भी सबसे वहशी जानवरों में से सबसे अव्वल है! ये ईश्वर की सबसे बेहतरीन कृति तब है जब इसे कुछ नियंत्रण के तहत रखा जाए, वो चाहे धर्म, मजहब, कानून या संविधान का नियंत्रण ही क्यों न हो। अगर ये नियंत्रण हट जाए तो जंगल भी शर्म के मारे आत्महत्या कर लें। सभ्यता और संस्कृति के विकास ने नियंत्रण के साथ जहां इंसान को सभ्य रखा वहीं कुछ कुतर्कों और अराजकतत्वों ने शांति और प्रगतिशील संस्कृतियों और सभ्यता रूपी विशाल वृक्ष पर लगे दीमक की तरह उसे चट करने को आतुर हैं। आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तमाम इंसानों/मनुष्यों को जो अनियंत्रित स्वतंत्रता मिली हुई है वो ही पर्याप्त है इन्हें विश्व का सबसे ईर्ष्यालु, अराजक, घृणास्पद और जानवरों से बढ़कर जानवर साबित करने के लिए। ये तब है जब हमें शब्द चलाने की ही स्वतंत्रता मिली हुई है, भारतीय संविधान में नियंत्रित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अनियंत्रित स्वतंत्रता को लेकर।
लोकतंत्र के हृदय की धड़कन कही जाने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जब मर्यादा की दहलीज लांघकर अराजकता के मैदान में कदम रखती है, तो वह समाज के ताने-बाने को तार-तार करने लगती है। आज हम एक ऐसे डिजिटल युग में जी रहे हैं जहाँ शब्द अब केवल संवाद का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे अदृश्य अस्त्र बन चुके हैं। सोशल मीडिया के इस विस्तार ने हर हाथ में एक ऐसी शक्ति थमा दी है, जिसका उपयोग सृजन से अधिक ध्वंस के लिए किया जा रहा है। विडंबना देखिए कि जिस मंच को लोगों को जोड़ने और विचारों के आदान-प्रदान के लिए बनाया गया था, वही आज घृणा, विद्वेष और अपमान की सबसे उर्वर जमीन बन चुका है। हमारे महान पूर्वज, महापुरुष, आस्था के केंद्र देवी-देवता, पैगम्बर और अवतार, जिन्होंने मानवता को सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाया। आज डिजिटल गलियारों में अनर्गल और अमर्यादित टिप्पणियों के शिकार हो रहे हैं। यह स्थिति न केवल पीड़ादायक है, बल्कि उस सामाजिक अनुबंध पर भी प्रहार करती है जिसके बल पर एक सभ्य समाज खड़ा होता है।
जब हम अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करते हैं, तो अक्सर हम इसके साथ जुड़े उत्तरदायित्वों को भूल जाते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मिली यह स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर उचित प्रतिबंधों की व्यवस्था की थी ताकि किसी की स्वतंत्रता दूसरे की गरिमा और समाज की शांति में बाधक न बने। लेकिन आज डिजिटल दुनिया के नामी-बेनामी योद्धा संविधान की इस मूल भावना को ठेंगा दिखा रहे हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी का अर्थ यह कतई नहीं है कि कोई भी व्यक्ति किसी की गहरी आस्था को चोट पहुँचाए या पूजनीय प्रतीकों का सार्वजनिक उपहास उड़ाए। जब कोई व्यक्ति किसी महापुरुष या धार्मिक व्यक्तित्व पर कीचड़ उछालता है, तो वह केवल एक नाम का अपमान नहीं करता, बल्कि उन करोड़ों लोगों की भावनाओं को लहूलुहान करता है जिनके जीवन का आधार वे मूल्य और आदर्श हैं। यह वैचारिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि वैचारिक व्यभिचार है, जो समाज में केवल और केवल नफरत का जहर घोल रहा है।
हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर और संवेदनशील मामले पर तंत्र की निष्क्रियता एक मौन सहमति जैसी प्रतीत होने लगती है। संविधान को लागू करने वाले और कानून की रक्षा का जिम्मा सँभालने वाले संस्थान अक्सर उस समय तक गहरी नींद में सोए रहते हैं, जब तक कि कोई विवाद सुलगकर दावानल न बन जाए। क्या हम एक ऐसी न्याय व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जो केवल तभी जागती है जब मामला सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगे या सड़कों पर हंगामे की नौबत आ जाए? कानून का खौफ अपराध होने से पहले होना चाहिए, न कि अपराध के बाद की औपचारिकता के रूप में। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के कमेंट बॉक्स आज नफरत की ऐसी भट्ठियाँ बन चुके हैं जहाँ सभ्यता और शालीनता हर पल स्वाहा हो रही है। यहाँ छिड़ी शब्द-जंग अक्सर दंगों और हिंसक झड़पों की पूर्वपीठिका तैयार करती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हमारी तकनीकी प्रगति ने हमें मानसिक और नैतिक रूप से और अधिक आदिम बना दिया है?
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की अपनी एक दुनिया है, जहाँ एनोनिमिटी यानी गुमनामी का चोला पहनकर लोग अपनी दबी हुई कुंठाओं और नफरत को बाहर निकालते हैं। उन्हें लगता है कि स्क्रीन के पीछे छिपकर वे कुछ भी कह सकते हैं और बच निकलेंगे। इसी सोच ने समाज में एक ऐसी टॉक्सिक संस्कृति को जन्म दिया है, जहाँ तर्कों की जगह गालियाँ और विमर्श की जगह व्यक्तिगत हमले ले चुके हैं। जब शासन और प्रशासन इस पर त्वरित कार्रवाई नहीं करते, तो अराजक तत्वों का मनोबल बढ़ता है। वे इसे अपनी जीत समझते हैं और फिर शुरू होता है अपमान का एक अंतहीन सिलसिला। किसी भी जीवंत समाज के लिए यह स्थिति अलार्म की घंटी के समान है। यदि समय रहते इन की-बोर्ड वॉरियर्स की बेलगाम जुबान पर कानून की लगाम नहीं कसी गई, तो वह दिन दूर नहीं जब सोशल मीडिया की यह नफरत हमारे वास्तविक जीवन के सद्भाव को पूरी तरह लील जाएगी।
संविधान की शपथ लेने वालों को यह समझना होगा कि कानून का क्रियान्वयन केवल कागजों पर या हाई-प्रोफाइल मामलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सोशल मीडिया पर निगरानी और त्वरित न्याय की एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो धर्म, जाति या विचारधारा के चश्मे से परे होकर केवल मर्यादा की रक्षा करे। नफरत फैलाने वाली पोस्ट और टिप्पणियों को हटाना ही काफी नहीं है, बल्कि ऐसी मानसिकता को दंडित करना भी अनिवार्य है जो समाज की शांति को खतरे में डालती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण तभी संभव है जब हम मर्यादाहीनता को अपराध की श्रेणी में रखकर देखें। यह केवल सरकार या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि उन तकनीकी कंपनियों की भी जवाबदेही है जो इन प्लेटफॉर्म्स से अरबों का मुनाफा कमाती हैं, लेकिन नफरत रोकने के नाम पर एल्गोरिदम और फ्री स्पीच के पीछे छिप जाती हैं।
समाज के रूप में हमें भी आत्ममंथन की आवश्यकता है। हम किस ओर जा रहे हैं? क्या हमारी शिक्षा और संस्कार हमें इतने असहिष्णु बना रहे हैं कि हम किसी के आराध्य या किसी महापुरुष के प्रति न्यूनतम सम्मान भी खो चुके हैं? जब हम किसी महापुरुष का अपमान करते हैं, तो हम दरअसल अपनी ही जड़ों को काट रहे होते हैं। महापुरुष और अवतार किसी एक धर्म या जाति के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की विरासत होते हैं। उनकी आलोचना तार्किक और मर्यादित हो सकती है, लेकिन उनकी अवमानना और उपहास केवल मानसिक दिवालियेपन का प्रमाण है। आज के युवा को यह समझने की जरूरत है कि लाइक्स और शेयर की दौड़ में वे अपनी नैतिकता की बलि चढ़ा रहे हैं।
यह समय केवल कानून की दुहाई देने का नहीं, बल्कि उसे सड़कों और सर्वरों पर कड़ाई से लागू करने का है। यदि अभिव्यक्ति की इस अराजक आज़ादी को समय रहते नहीं रोका गया, तो नफरत का यह जाल इतना घना हो जाएगा कि आने वाली पीढ़ियों को इसमें सांस लेना भी दूभर होगा। संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं, पर वे अधिकार कर्तव्यों की बुनियाद पर टिके हैं। जिस दिन अधिकार कर्तव्यों से अलग हो जाते हैं, उस दिन लोकतंत्र भीड़तंत्र में तब्दील होने लगता है। हमें एक ऐसा डिजिटल वातावरण निर्मित करना होगा जहाँ संवाद में मिठास न सही, कम से कम शिष्टाचार और मर्यादा तो सुरक्षित रहे। कानून को हाइलाइट होने का इंतजार छोड़कर सक्रियता दिखानी होगी, ताकि नफरत की इस आग को और फैलने से पहले बुझाया जा सके। समाज की शांति और देश की एकता किसी भी प्रकार की तथाकथित आज़ादी से कहीं अधिक मूल्यवान है।






