बारिश की कुछ बूंदों को आने तो दें।
मिजाज यहां पारे का कुछ घटने तो दें।।
ये कथित अभियान संरक्षण के, सभी स्वार्थ में बह जायेंगे।
तपिश के ये उबलते दिन फिर बहुर आयेंगे।।
लाल सोने का वो जो आकर्षण है यहां।
देखिए, इसके लिए फिर सब बहक जायेंगे।।
पहाड़ों को चूर करने का जो स्वार्थी अहंकार है यहां,
जंगल हटा कंक्रीट के जंगल बनाने का जो अभिमान है यहां।
वही यहां खास है, वही यहां का मिजाज, वही शान है यहां।।
माफिया कहलाना यहां रुतबा है, इन्हीं की यहां जय जयकार है।
लोग बड़े भोले हैं यहां, ताकतवरों का कभी न करते प्रतिकार हैं।।
मचा है हो हल्ला उबलते बांदा को लेकर सोशल मीडिया में अभी।
मगर ये बांदा है! स्वार्थ की गर्मी में यहां सब पिघल जायेंगे।।
- राहुल कुमार







