पश्चिम एशिया का संघर्ष कितनी भारी कीमत वसूल रहा है, यह देखते हुए भी शांतिपूर्ण समाधान की राहें दो महीने बीत जाने के बाद भी नहीं खुल रही हैं। बातचीत का दौर चलते ही अमेरिका और ईरान एक-दूसरे के ठिकानों पर हमले कर अपनी जिद दोहरा देते हैं। समझौते की उम्मीद जगाई जाती है, फिर जल्दी ही उसकी हवा निकाल दी जाती है। वार्ताओं में संवाद की बजाय दबदबा बनाए रखने की होड़ छिड़ी रहती है।
इसी सिलसिले में ईरान ने अमेरिका के साथ शांति वार्ता रोक दी है। करीब पंद्रह दिन पहले अमेरिका भी इन्हें अनुपयोगी बताते हुए पीछे हट चुका था। ईरान का यह कदम लेबनान पर इजरायल के लगातार भीषण हमलों से उपजा है। वह इन हमलों को रोकना चाहता है और इसे युद्धविराम की प्रमुख शर्त मानता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्वयं इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर खासा नाराजगी जता चुके हैं, लेकिन सवाल यह है कि इजरायल की सुरक्षा और क्षमता का बड़ा आधार होने के बावजूद ट्रंप उन्हें रोक क्यों नहीं पा रहे? ऐसी घटनाओं में मुख्य मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं।
यदि ईरान और अमेरिका वास्तव में गंभीर कूटनीतिक पहल करें तो कोई रास्ता अवश्य निकल सकता है। परंतु हर दौर में नई शर्तें जोड़कर वार्ता को पटरी से उतार दिया जाता है। एक तरफ समझौते की बात होती है, दूसरी ओर सैन्य कार्रवाई की धमकियां दी जाती हैं। इस उठापटक में शांति स्थापना के सारे दावे खोखले साबित हो रहे हैं।
इस खींचतान का असर दोनों देशों की आंतरिक राजनीति पर भी पड़ रहा है। ईरान में सत्ता के अंदरूनी संघर्ष की खबरें आ रही हैं, वहीं अमेरिका में ट्रंप की विदेश नीति पर लंबे समय से सवाल उठ रहे हैं। पांच महीने बाद होने वाले संसदीय चुनावों में उनकी पार्टी को नुकसान का खतरा है, जो उनके लिए बड़ा राजनीतिक संकट बन सकता है। शायद यही कारण है कि ईरान का रुख और अधिक सख्त हो गया है।
दोनों देश अब युद्ध की भारी कीमत चुका चुके हैं। आगे और खून-खराबा न हो, इसके लिए शांति की दिशा में ठोस कदम उठाना ही सबसे बुद्धिमानी भरा रास्ता है। सैन्य विकल्पों और राजनीतिक दबाव की बजाय गंभीर कूटनीति, विश्वसनीय मध्यस्थता और मुख्य मुद्दों पर सहमति बनाना ही इस चक्र से बाहर निकलने का एकमात्र उपाय दिखाई देता है।
अगर इस क्षेत्र में स्थायी शांति नहीं आई तो न केवल क्षेत्रीय स्थिरता बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था भी लगातार खतरे में रहेगी। समय अब फैसले का है- या तो बातचीत को सार्थक बनाया जाए, या फिर अनावश्यक संघर्ष का बोझ और बढ़ाया जाए। विकल्प स्पष्ट है, लेकिन इच्छाशक्ति की कमी सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।







