सुबहके 3 बजे थे. _Chennai Central railway station._
प्लेटफॉर्म पर चारों तरफ लोग सोए हुए थे. बीच में एक बुजुर्ग बैठे थे. उम्र 78 साल. सफेद धोती और शर्ट. हाथ में बाँस की टोकरी. टोकरी में गरमागरम इडली भरी हुई.
“इडली… गरम इडली… एक रुपया… सिर्फ एक रुपया…”
कोई ले नहीं रहा था. साल 2026. एक रुपये में टॉफी भी नहीं मिलती और इडली? लोग उन्हें पागल समझकर हँस रहे थे.
मेरा नाम अरविंद है. मैं Infosys जैसी एक IT कंपनी में काम करता हूँ. रात की शिफ्ट खत्म करके घर जा रहा था. AC गाड़ी, अच्छी नौकरी… पर भूख लगी थी. स्टेशन के स्टॉल पर इडली ₹50 की मिल रही थी.
उन दादाजी पर नज़र गई. टोकरी में करीब 100 इडलियाँ. एक भी ग्राहक नहीं. उनकी आँखों में पानी था.
मैं नीचे उतरा.
“दादाजी, एक रुपये में इडली? घाटा नहीं होता क्या?”
वे हँसे.
“बेटा, ये घाटा नहीं. ये मुनाफा है.”
“कैसे दादाजी? चावल, गैस, सबके दाम बढ़े हैं. एक इडली कम से कम ₹5 की पड़ती है. आप ₹1 में बेचते हो?”
वे टोकरी बंद करके बोले,
“एक कहानी सुनाता हूँ.”
“साल 1975. मैं 25 साल का था. रेलवे में हमाल था. महीने का ₹100 वेतन. एक दिन तेज बारिश. काम नहीं. पैसे नहीं. लगातार 3 दिन भूखा. स्टेशन की बेंच पर बेहोश गिर पड़ा.”
“तब एक औरत आई – वो प्लेटफॉर्म पर इडली बेचती थी. एक रुपये में. उसने मुझे उठाया, पानी छिड़का, 4 इडलियाँ खाने को दीं. पैसे नहीं माँगे.”
“मैं रोया… बोला, मेरे पास पैसे नहीं हैं. वो बोली – ‘बेटा, मैं भी एक बार ऐसे ही भूखी थी. किसी ने मुझे खिलाया था. इसलिए मैंने व्रत लिया – मरते दम तक एक रुपये में इडली बेचूँगी, ताकि भूखे को खाना मिले. तू भी बड़ा हो जाए तो किसी भूखे को खिला देना.'”
दादाजी ने आँसू पोंछे.
“वो 1995 में चली गईं. आखिरी पल में मेरा हाथ पकड़कर पूछा – ‘वचन निभाएगा ना?’ मैंने हाँ कहा.”
“उसके बाद मैंने रेलवे के कॉन्ट्रैक्ट लिए. अच्छे पैसे कमाए. तीन घर. दो बच्चे. दोनों United States में. पर 1995 से आजतक -हर रोज सुबह 3 बजे -100 इडलियाँ. एक रुपया. इसी स्टेशन पर. 30 साल.”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए.
“दादाजी… रोज ₹400 का घाटा. महीने का ₹12,000. साल का ₹1.5 लाख. 30 साल में ₹45 लाख!”
वे शांति से बोले,
“पैसे से देखो तो घाटा. मन से देखो तो मुनाफा. 30 साल में कितनों को खिलाया होगा? 10 लाख इडलियाँ. 10 लाख पेट. 10 लाख आशीर्वाद. उसकी कीमत कितने करोड़?”
इतने में एक 12 साल का लड़का दौड़ता हुआ आया. फटा हुआ शर्ट.
“दादाजी… इडली… 3 दिन से कुछ नहीं खाया. माँ हॉस्पिटल में. पैसे नहीं हैं.”
दादाजी ने 4 इडलियाँ पत्ते पर रखीं, चटनी डाली.
“धीरे-धीरे खा बेटा.”
वो लड़का खा रहा था… और रो रहा था.
“कल पैसे दे दूँगा…”
“नहीं चाहिए. तू बड़ा होकर किसी भूखे को खिला देना. बस वही काफी है. वही कीमत है.”
वो लड़का उनके पैरों में गिर पड़ा.
“वचन देता हूँ दादाजी. मैं भी एक रुपये में इडली बेचूँगा.”
मैंने ₹1000 का नोट निकाला.
“दादाजी, कृपया… सारी इडलियाँ मैं लेता हूँ.”
वे हँसे.
“ये एक आदमी के लिए नहीं हैं. भूखों के लिए हैं. तुम्हें भूख हो तो एक इडली लो. एक रुपया रख दो. बस वही काफी है.”
मैंने ₹1 रखा. एक इडली ली. जिंदगी में खाई सबसे स्वादिष्ट इडली थी. आँखों में पानी आ गया.
मैंने पूछा,
“आपके बच्चों को बुरा नहीं लगता? पैसा बर्बाद होता है ऐसा?”
उन्होंने फोन निकाला. वीडियो कॉल. बेटा अमेरिका में.
“अप्पा, इडलियाँ बिकीं? तबियत कैसी है? डॉक्टर ने क्या कहा?”
“ठीक हूँ. आज एक नौजवान मिला. कहानी सुनी.”
उनका बेटा मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया.
“सर, शुक्रिया. प्लीज मेरे पिता का ध्यान रखना. हम हर महीने ₹50,000 भेजते हैं – इडलियों के लिए. उनकी इच्छा मतलब हमारा सौभाग्य. उनका व्रत मतलब हमारा व्रत.”
दादाजी बोले,
“देखा? मेरे बच्चे भी वचन निभा रहे हैं. मेरे जाने के बाद भी ये टोकरी नहीं रुकेगी. एक रुपये की इडली नहीं रुकेगी.”
आज 2026 है. वो दादाजी अब इस दुनिया में नहीं हैं. पिछले साल उनका निधन हो गया. जाने से पहले उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा –
“बेटा, टोकरी संभालना. वचन निभाना.”
अब हर रोज सुबह 3 बजे, उसी बेंच पर, Chennai Central railway station में मैं बैठता हूँ. टोकरी भर इडलियाँ. एक रुपया.
मैंने नौकरी नहीं छोड़ी. पर रोज 2 घंटे… इडलियों के लिए देता हूँ.
मेरी कंपनी में 200 कर्मचारी हैं. हर कोई महीने का ₹100 देता है.
“वन रुपी इडली ट्रस्ट.”
वो 12 साल का लड़का – गणेश -अब बारहवीं में पढ़ता है. शाम को आता है और मदद करता है.
“अण्णा, मैंने भी वचन लिया है. बड़ा होकर मैं भी यही करूँगा.”
दोस्तों, पैसा कमाना बड़प्पन नहीं है. पैसे का उपयोग करके पुण्य कमाना ही सच्चा बड़प्पन है.
घर में बच्चे हों तो एक छोटा डिब्बा रखो.
“₹1 की पेटी.”
हर रोज ₹1 डालने को कहो. महीने के ₹30 हो जाएँगे. उस पैसे से किसी भूखे को खाना खिलाओ.
क्योंकि आपके लिए ₹30 शायद छोटा खर्च हो…
पर किसी के लिए वो 30 दिन के खाने जैसा हो सकता है.
तो एक संकल्प लो – कम से कम एक भूखे इंसान को खाना खिलाओ.
पैसा जाएगा… पर पुण्य रह जाएगा.
टोकरी खाली होगी… पर मन भर जाएगा.
- प्रस्तुति : नीतू सिंह






