दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित प्रदर्शन 23 दिन से अधिक समय से चल रहा है। इस आंदोलन की मुख्य मांग NEET-UG 2026 पेपर लीक की घटना के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है, साथ ही परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के सुधार हैं। इस मुद्दे पर छात्रों के बीच व्यापक आक्रोश है और कम से कम 11 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं।
शिक्षा व्यवस्था में गहरी सड़न को देखते हुए प्रसिद्ध लद्दाखी शिक्षाविद् और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक 28 जून से इस आंदोलन में शामिल हो गए और आमरण अनशन पर बैठ गए। अब यह अनशन 17 दिन से अधिक का हो चुका है। वांगचुक ने स्पष्ट कहा है कि वे तब तक नहीं रुकेंगे जब तक सरकार जवाबदेही तय नहीं करती।
दुर्भाग्य से सरकार का रवैया अब तक पूरी तरह असंवेदनशील रहा है। याद रहे, 2011 में अन्ना हजारे का अनशन मात्र 11वें दिन सरकार ने तुड़वा दिया था, लेकिन यहां 17 दिन बीत गए हैं, फिर भी कोई संवाद या ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जबकि कॉकरोच जनता पार्टी शिक्षा में बड़े सुधार -परीक्षा लीक रोकने की ठोस व्यवस्था, छात्रों को मुआवजा और सिस्टम में जवाबदेही- चाहती है।
भूख हड़ताल अब बंद कीजिए :
जंतर मंतर पर कई दिनों से CJP का प्रदर्शन चल रहा है। सोनम वांगचुक जी कई दिनों से वहाँ भूख हड़ताल पर बैठे हैं। हम उनकी मांगों का समर्थन करते हैं। धर्मेंद्र प्रधान को तुरंत इस्तीफ़ा देना चाहिए। मेरी सोनम वांगचुक जी से अपील है कि अपनी भूख हड़ताल अब बंद कीजिए। आप देश की धरोहर हैं। मैं परसों, 16 जुलाई को शाम 5 बजे जंतर मंतर जाकर उन्हें अपना समर्थन दूंगा। – अरविन्द केजरीवाल ( ट्वीट) https://x.com/ArvindKejriwal/status/2076939467668209898/video/1
मालूम हो कि IIT कानपुर के पूर्व प्रोफेसर और पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ. जी.डी. अग्रवाल ने गंगा नदी को प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए सरकार की लापरवाही के विरोध में 111 दिनों तक आमरण अनशन किया था। 2018 में 111वें दिन उनकी मृत्यु हो गई। न सरकार ने उनकी मांग मानी, न मीडिया ने उनके संघर्ष को पर्याप्त कवरेज दिया।
आज सोनम वांगचुक उसी राह पर चल रहे हैं। इतिहास दोहराया जा रहा है। सरकार इनकी मांगों को मानने वाली नहीं दिख रही। ऐसे में सोनम वांगचुक को आमरण अनशन छोड़ देना चाहिए- उनकी जान किसी एक इस्तीफे से कहीं बढ़कर है।
धर्मेंद्र प्रधान जी का इस्तीफा लेकर भी क्या हासिल होगा? उनकी जगह कोई और मंत्री आ जाएगा, लेकिन सिस्टम वैसा का वैसा ही चलेगा। परीक्षा लीक, अनियमितताएं और जवाबदेही की कमी बनी रहेगी। समस्या का हल सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे में नहीं है – यह पूरे शिक्षा तंत्र में सुधार, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही में है।
जिद अच्छी नहीं है। खा-पीकर, ताकत बनाकर लम्बा संघर्ष करना चाहिए। एक कार्यकर्ता की मृत्यु आंदोलन को मजबूत नहीं करती, बल्कि सिस्टम की उदासीनता को और उजागर करती है।
सरकार को चाहिए कि वह संवाद का रास्ता अपनाए और छात्रों के भविष्य को लेकर ठोस कदम उठाए। सोनम वांगचुक जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं को जिंदा रहकर लड़ने दें – क्योंकि बदलाव के लिए उनकी आवाज और उनका संघर्ष दोनों जरूरी हैं।
समस्या का समाधान प्रतीकात्मक विरोध या एक इस्तीफे में नहीं, बल्कि निरंतर जन-दबाव, नीतिगत सुधार और सच्ची जवाबदेही में है।

भूख हड़ताल अब बंद कीजिए :




