मो. साहिल रज़ा
शिक्षा का कोई भी केंद्र केवल ईंट, सीमेंट और कंक्रीट से खड़ा हुआ एक भौतिक ढांचा नहीं होता। वह विचारों की एक जीवंत कार्यशाला होता है, जहां राष्ट्र की आगामी पीढ़ियों का भविष्य आकार लेता है। जब हम किसी विश्वविद्यालय की इमारतों को देखते हैं, तो हमें केवल दीवारें नहीं, बल्कि वे अनगिनत मौलिक अधिकार दिखाई देने चाहिए जो वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के जीवन और उनकी आकांक्षाओं से जुड़े हैं। उत्तर प्रदेश के रामपुर में स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी इन दिनों नियमों, तकनीकी दांव-पेंचों और प्रशासनिक आक्रामकता के एक बेहद संवेदनशील कानूनी चौराहे पर आ खड़ी हुई है। रामपुर विकास प्राधिकरण द्वारा विश्वविद्यालय परिसर के भीतर बने चालीस में से अड़तीस भवनों को अवैध घोषित कर उन्हें ढहाने का जो हालिया आदेश जारी किया गया है, उसने न केवल प्रशासनिक मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि न्यायशास्त्र के संवेदनशील अध्येताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या नियमों की आड़ में निर्माण को विनाश से तौला जाना न्यायसंगत है? कानून की सर्वोच्चता सर्वोपरि है, और कोई भी संस्था कानून से ऊपर नहीं हो सकती, लेकिन जब कानून का इस्तेमाल सुधारात्मक के बजाय दंडात्मक और संहारक औजार के रूप में होने लगे, तब न्याय की मूल आत्मा लहूलुहान हो जाती है। शिक्षा के इस मंदिर को किसी भी प्रकार के बाहरी द्वेष से बचाने के लिए हमें भावनाओं के आवेग से ऊपर उठकर उन ठोस, अकाट्य और स्थापित वैधानिक सिद्धांतों का विश्लेषण करना होगा, जो इस मामले को एक नया विधिक आयाम देते हैं।
इस पूरे विवाद की विधिक जड़ में जो सबसे बड़ा तकनीकी पेंच है, वह स्वयं कानून के बुनियादी सिद्धांत ‘अधिकार क्षेत्र’ को चुनौती देता है। रामपुर विकास प्राधिकरण का मुख्य तर्क यह है कि विश्वविद्यालय के पास केवल दो इमारतों का वैध नक्शा है और बाकी अड़तीस इमारतें बिना स्वीकृत मानचित्र के बनाई गईं। लेकिन इस दावे की विधिक वैधता तब कमजोर हो जाती है जब हम समय और भूगोल के दस्तावेजी सच को खंगालते हैं। जौहर यूनिवर्सिटी का निर्माण जिस भूभाग पर हुआ है, वह ऐतिहासिक रूप से सिंघनखेड़ा ग्राम सभा के अंतर्गत आता था। सबसे महत्वपूर्ण विधिक तथ्य यह है कि यह पूरा इलाका 27 सितंबर 2024 से पहले तक रामपुर विकास प्राधिकरण के भौगोलिक और विधिक अधिकार क्षेत्र का हिस्सा था ही नहीं।
न्यायशास्त्र का एक सर्वमान्य और स्थापित सिद्धांत है, जिसे भूत प्रभावी कानून निषेध का सिद्धांत कहा जाता है। इसके अनुसार, कोई भी नया प्रशासनिक क्षेत्राधिकार या कानून अतीत में जाकर उन पुराने कार्यों को अवैध घोषित नहीं कर सकता जो उनके गठन से पहले किए जा चुके थे। जब ये इमारतें बनीं, तब वहां विकास प्राधिकरण का कोई वजूद ही नहीं था। उस दौर में वह इलाका जिला पंचायत के अधीन आता था, और ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण के नियम शहरी नियोजन की तरह जटिल नहीं थे। यदि तत्कालीन सक्षम प्राधिकारी ने उस समय निर्माण पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की, और संस्थान को पानी, बिजली व अन्य सरकारी सुविधाएं निर्बाध रूप से मिलती रहीं, तो कानून की नजर में इसे राज्य की ‘मौन स्वीकृति’ माना जाता है। आज अचानक सालों पुराने निर्माण को इस आधार पर मलबे में तब्दील करने का आदेश देना कि वह आज के नए मानकों में फिट नहीं बैठता, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) है। कानून का मूल चरित्र निष्पक्षता और समरूपता है। यदि हम उत्तर प्रदेश या देश के किसी भी हिस्से के शहरी नियोजन का तटस्थता से अध्ययन करें, तो ऐसी हजारों इमारतें, अस्पताल और सरकारी दफ्तर मिल जाएंगे, जिनके नक्शों में तकनीकी विसंगतियां हैं। लेकिन क्या राज्य उन सभी इमारतों पर इसी तत्परता और आक्रामकता के साथ ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करता है? जब राज्य की मशीनरी किसी एक विशिष्ट संस्थान को लक्षित कर, उसे चौतरफा विधिक घेराबंदी में लेकर सीधे ध्वस्तीकरण का संक्षिप्त नोटिस थमा देती है, तो न्यायालयों के पास ऐसी कार्रवाई को मनमाना और दुर्भावनापूर्ण मानने के पर्याप्त आधार होते हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय ने ‘ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य’ जैसे ऐतिहासिक मामलों में स्पष्ट किया है कि राज्य का कोई भी कार्य मनमाना नहीं होना चाहिए, क्योंकि मनमानापन स्वतः ही समानता के अधिकार का हनन करता है। इस भेदभावपूर्ण प्रशासनिक रवैये को अदालत में साक्ष्यों के साथ रखकर यह साबित किया जा सकता है कि यह कार्रवाई कानून का पालन कराने के लिए नहीं, बल्कि चुनिंदा रुख अपनाने की नीयत से की जा रही है।
इसके अलावा, ‘उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973’ के तहत ही अवैध या बिना नक्शे के निर्माणों को नियमित करने के लिए शमन का स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद है। कानून निर्माताओं को भली-भांति ज्ञात था कि निर्माण कार्यों में कभी-कभी अनजाने में या बदलती परिस्थितियों के कारण तकनीकी त्रुटियां हो सकती हैं। इसीलिए नियम बने कि यदि कोई ढांचा सार्वजनिक सुरक्षा, फायर सेफ्टी या मास्टर प्लान की मुख्य सड़कों में बाधा नहीं बन रहा है, तो उस पर उचित शमन शुल्क लगाकर उसे वैध कर दिया जाना चाहिए। विश्वविद्यालय प्रबंधन का यह रुख रहा है कि यदि नियमों की कोई अनदेखी हुई भी है, तो वे उसका नियमानुसार जुर्माना भरने को तैयार हैं। जब कानून के पास एक ऐसा रचनात्मक विकल्प मौजूद है जिससे सरकार के खजाने में राजस्व भी आ सकता है और एक बहुमूल्य शैक्षणिक बुनियादी ढांचा भी बच सकता है, तो उस विकल्प को दरकिनार कर केवल विनाश का मार्ग चुनना प्रशासनिक हठधर्मिता को दर्शाता है। देश के विभिन्न न्यायालयों ने समय-समय पर यह व्यवस्था दी है कि जनोपयोगी और शैक्षणिक महत्व के ढांचों का ध्वस्तीकरण हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि पहला कदम।
इस पूरे विधिक महासंग्राम का सबसे संवेदनशील और मानवीय पहलू वे निर्दोष छात्र हैं, जिनका इस प्रशासनिक विवाद से कोई सीधा संबंध नहीं है। भारत का संविधान हर नागरिक को अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है। एक तरफ राज्य नए विश्वविद्यालयों को खोलने के लिए सार्वजनिक धन का निवेश करता है, और दूसरी तरफ एक चालू और जीवंत विश्वविद्यालय परिसर की बहुसंख्य इमारतों को मलबे के ढेर में बदलने की तैयारी करता है। इन अड़तीस इमारतों में क्लासरूम, प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय हैं, जहां छात्र देश के विकास का हुनर सीख रहे हैं। यदि इन इमारतों को जमींदोज कर दिया जाता है, तो वहां पढ़ रहे छात्रों के भविष्य का क्या होगा? उनकी डिग्री और उनके शैक्षणिक सत्र का नुकसान अपूरणीय होगा। न्यायशास्त्र का यह भी एक स्थापित सिद्धांत है कि राज्य की किसी भी कार्रवाई में आनुपातिकता का सिद्धांत लागू होना चाहिए। यानी, यदि कोई गलती छोटी या तकनीकी है, तो उसकी सजा इतनी बड़ी नहीं होनी चाहिए कि वह सैकड़ों छात्रों के मौलिक अधिकारों को ही लील जाए।
संक्षेप में कहें तो, यह मामला केवल एक भूखंड या कुछ इमारतों को बचाने का नहीं है, बल्कि यह इस न्यायिक चेतना को बचाने का है कि राज्य की नीतियां और कार्रवाइयां हमेशा न्यायसंगत, निष्पक्ष और लोक-कल्याणकारी होनी चाहिए। यदि कोई विसंगति है, तो उसका वैधानिक हल शमन शुल्क के जरिए निकाला जाना चाहिए।
जब यह मामला माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष तथ्यों, क्षेत्राधिकार के दस्तावेजों और छात्रों के भविष्य की ठोस दलीलों के साथ प्रस्तुत किया जाएगा, तो कानून की चौखट पर किसी भी एकपक्षीय प्रशासनिक आदेश का टिक पाना अत्यंत कठिन होगा। न्याय के तराजू पर हमेशा वही निर्णय अडिग रहता है जो विनाश के बजाय निर्माण और प्रगति के पक्ष में खड़ा होता है। हो सकता है प्रदेश के
एक मुख्य मुद्दे से जनता का ध्यान हटाने के लिए एक नया मुद्दा तैयार कर उठाया गया है जिससे जनता असल मुद्दे से भटक सके और असल में यही हो रहा है। अगर न्याय की बात हो तो शायद ही भारत में ऐसी कोई यूनिवर्सिटी ऐसी नहीं होगी जो अपने सभी मानक पूरे कर रही होगी और यदि गहनता से जांच कराई जाए तो ऐसे कई सरकारी कार्यालय और संस्थान भी हैं जिनका इंफ्रास्ट्रक्चर कई मानकों पर खरा नहीं उतरेगा।






