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    Home»आर्ट एंड कल्चर

    महेश्वरी और बाघ की कला वक्त के साथ ढली नये परिवेश में

    By November 23, 2017 आर्ट एंड कल्चर No Comments4 Mins Read
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    ललित कला केन्द्र अलीगंज में हुआ राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत हस्तशिल्पियों का व्याख्यान

    लखनऊ, गुरुवार 23 नवम्बर 2017: मध्य प्रदेश में विकसित महेश्वरी और बाघ प्रिंट ने वक्त के साथ करवट ली है। अब महेश्वरी डिजाइन कम्यूटर से तैयार किए जा रहे हैं तो बाघ प्रिंट के फाइल और कुशन तक तैयार किये जा रहे हैं। इस कला से जुड़े कई रोचक तथ्य गुरुवार को अहमद हुसैन अंसारी और इदरिस खत्री ने राष्ट्रीय ललित कला अकादमी में आयोजित मध्य प्रदेश हस्तकला प्रदर्शन के दौरान आयोजित व्याख्यान माला में बताए। मृगनयनी प्रदर्शनी के प्रबंधक एम.एल.शर्मा ने बताया कि इसका आयोजन 27 नवम्बर तक किया गया है।

    कम्यूटराइज हुई महेश्वरी डिजाइन

    महेश्वरी बुगड़ी डिजाइन के लिए सन 1984 में राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत हो चुके अहमद हुसैन अंसारी ने बताया कि महेश्वरी साड़ी में अब कम्यूटर से डिजाइन तैयार किए जा रहे हैं। साड़ियों के रंग भी अब पहले से कहीं अधिक विविधता वाले और चटक हो गए हैं। इसे दुनिया भर में लोकप्रिय करने का श्रेय इंदौर की रानी अहिल्या बाई होल्कर को जाता है। उन्होंने बुनकरों को संरक्षण देकर इस कला को प्रोत्साहित किया। रानी ने सूरत के कलाकारों को संरक्षण देकर राजसी वस्त्र साड़ी और पगड़ी तैयार करवायीं। शुरुआती दौर में केवल सूती साड़ियां ही बनाई जाती थीं। बाद में इसमें रेशम और सोने-चांदी के तारों का भी इस्तेमाल किया जाने लगा।

    अहिल्याबाई के मश्वरे पर ही कारीगरों ने महेश्वर क़िले की दीवारों पर बनाई गई खूबसूरत डिज़ाइनें कपड़े पर हूबहू उतारी। यह संयोजन इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि दुनिया भर में यह कला अपने स्थान महेश्वर स्थान के नाम पर महेश्वरी नाम से लोकप्रिय हुई। आज भी महेश्वरी साड़ियों की किनारियों पर महेश्वर क़िले की दीवारों के शिल्प वाली डिज़ाइनें उकेरी जा रही हैं। महेश्वरी साड़ियां अपने मर्सिराइज्ड कपास के कारण प्रारंभिक दौर में पसंद की गई। 19वीं सदी में गर्भ रेश्मी साड़ियां चलन में रहीं तो बाद में रेश्मी और सूती का मेल लोगों को पसंद आया। नब्बे के दशकों में रेश्मी साड़ियां चलन में सर्वाधिक हो गईं। लोकप्रियता का आलम यह रहा कि महाराष्ट्र में तो दुल्हन अनारी और गुलाबी रंग की चेक वाली साड़ी विवाह अवसर पर और हरी महेश्वरी साड़ी विदा होते समय पहनने लगी। वर्तमान में पॉवरलूम आने से इसकी उत्पादकता बहुत बढ़ गई है।

    फाइल से लेकर कुशन कवर तक बाघ प्रिंट

    बाघ प्रिन्ट मूंगफली के लिए सन 1990 और बुर्रा के लिए सन 1996 में राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत इदरिस खत्री ने बताया कि बाघ प्रिंट के हस्तशिल्पी पहले आदिवासियों के लिए 3.5 मीटर की लिबास तैयार करते थे। आज वहीं बाघ प्रिंट फैंशन आइकन बन गया है। अब यह लेडीज सूट मेटीरियल, साड़ी और सदरी तक ही सीमित नहीं रह गया है। इसके तो अब फाइल कवर तक बाजार में हैं। कुशन कवर में तो रानी चित्रों तक का फ्यूजन किया जा रहा है। इदरीस ने बताया कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती परंपरा के गहरे प्रभाव वाले बाघ प्रिंट का सम्बंध पाकिस्तान के सिंध प्रांत से है। वहां से विस्थापित होकर कलाकार मध्य प्रदेश के बाघ क्षेत्र में बसे।

    यह कला एक हजार साल से अधिक पुरानी है। इस खास प्रिंट को तैयार करने में एक महीने का समय लगता है। इसमें सनचोरा समुद्री नमक, अरंडी का तेल, बकरी की मांगी से प्रिंट को खास रूप में तैयार किया जाता है। आखिरी बार बहेड़ा पाउडर के घोल में इसे ढुबोकर फिनिशिंग टच दिया जाता है। इसमें छपाई का लाल रंग इमली के बीज और फिटकरी से बनाया जाता है तो काला रंग गुड़ और लोहे के चूर्ण से। लकड़ी के ब्लॉक्स से साड़ी आदि पर प्रिंट लिए जाते हैँ। मुख्य रूप से इसमें कोर, साज, बोद, कलम और बुर्रा की डिजाइने तैयार की जाती हैं। बहते हुए नदी के पानी में इसे घोकर तांबे के बर्तन में धावली फूलों और अली जरीन के पानी में उबाला जाता है।

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