वर्तमान बिहार के गुफा शैल-चित्र और वाकणकर!

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वरिष्ठ कला समीक्षक: सुमन सिंह

पटना कला महविद्यालय के पूर्ववर्ती छात्र और कलाकार होने के नाते होना तो यह चाहिए था कि बिहार के शैल चित्रों के बारे में हमें सामान्य जानकारी रहती। लेकिन हालिया वर्षों तक हम इससे बिलकुल अनजान से थे कि अपने बिहार में भी शैलचित्रों की कोई श्रृंखला है, अलबत्ता झारखण्ड में इसके होने की चर्चा थोड़ी बहुत सुन रखी थी। कुछ वर्षों पहले यह जानकारी मिली कि कैमूर व जमुई के पहाड़ों में शैलचित्रों की मौजूदगी है, उसके बाद कुछ इससे सम्बंधित आलेख भी देखने को मिले।

इसी क्रम में संस्कृति विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा कुछ चित्र भी देखने को मिले, उन्हीं से यह जानकारी भी मिली कि इन चित्रों की फोटोग्राफी करवाई जा रही है। उसके बाद इसके बारे में विस्तृत जानकारी दी जाएगी, बहरहाल बात आयी गयी हो गयी। क्योंकि उसके बाद पिछले कुछ महीनों से पटना जाना नहीं हो पाया, इसलिए इस बारे में प्रगति की कोई जानकारी मिल नहीं पायी।

इधर प्रागैतिहासिक इतिहास पर लिखी डी एच लॉरेंस की पुस्तक पढ़ते हुए कुछ बातें इस रूप में सामने आयीं- प्रस्तर चित्रकला का प्राचीनतम लेखनपत्र कार्लियेल का था जो अलेक्ज़ेंडर कनिंघम का परिश्रमी सहायक था। उसने कैमूर -श्रृंखलाओं की उत्तरी चट्टानों के प्रस्तर आश्रयों में कहीं प्रस्तर चित्रकला की खोज की थी । उसने अपनी देखी हुयी चित्रकारी का वर्णन इस प्रकार किया है – ‘वहां प्रस्तर -चित्रकला थी जो स्पष्टतः भिन्न -भिन्न युगों की थी।

इनमें से कुछ अपरिष्कृत चित्रकारी बहुत कड़े और प्राचीन ढंग से, प्राचीन प्रस्तर-तराशों के जीवन के दृश्यों का वर्णन करते हुए प्रतीत होते हैं, कुछ जानवरों या मनुष्य द्वारा तीर- धनुष, भाले और कुल्हाड़ियों से जानवरों के शिकार का वर्णन करते हैं।’

विदित हो कि इस सम्बन्ध में सबसे पहले जॉन कॉकबर्न का आलेख Journal of the Asiatic Society of Bengal (1883) में प्रकाशित हुआ था। यहाँ संलग्न है कैमूर के शैल चित्रों का वह रेखाचित्र जो उस आलेख के साथ छपा था।

अब ऐसे में सिर्फ एक यही सवाल बनता है कि हम आजतक इससे जुडी जानकारियों से सिर्फ इसलिए वंचित हैं कि हमारे यहाँ कोई वाकणकर नहीं हुआ, और यही वह अंतर था जिसकी वजह से आज भीमबेटका से पूरी दुनिया तो परिचित है लेकिन कैमूर के गुफा चित्रों से हम जैसे बिहार वासी भी अनजान ही हैं।

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