बिहार की राजनीति में तीसरी ताकतों का घमासान तेज
बिहार चुनाव में इस बार महागठबंधन को बड़ी चुनौती मिलने वाली है। क्योकि नीतीश के राज से लोग खुश नज़र नहीं आ रहे हैं। ऐसे में अन्य दल इसे कैश कराने की जुगत में हैं। मालूम हो कि नवंबर में होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर भारी घमासान का माहौल देखा जा रहा है और स्थिति यह है कि सूबे की दो बड़ी सियासी ताकतों सत्तारूढ़ राजग और मुख्य विपक्षी महागठबंधन के लिये अपने-अपने खेमे को बिखरने से बचाना बहुत बड़े चुनौती बन गया है। जहां एक ओर राजग में लोजपा ने बगावत का झंडा बुलंद किया हुआ है वहीं दूसरी ओर महागठबंधन के घटक रालोसपा और वीआईपी ने क्षमता के मुताबिक सम्मानजनक संख्या में सीटें हासिल करने के लिये आर-पार की लड़ाई का बिगुल बजा दिया है। इसके अलावा दोनों खेमों की नजरें एक-दसरे के गट में सेंधमारी करने पर भी टिकी हुई हैं।

और इसी वजह से महागठबंधन से सबसे बड़े घटक राजद की ओर से लोजपा को खुले तौर पर निमंत्रण दिया जा रहा है कि वह राजग से अलग होकर इस तरफ आ जाए जबकि महागठबंधन में फूट डालने के लिये जीतनराम मांझी की हम को पहले ही अपने पाले में खींचने में कामयाब रहनेवाली प्रदेश में राजग की सबसे बड़ी घटक जदयू ने अब रालोसपा और वीआईपी के लिये भी अपने दरवाजे खुले रखने का संकेत देने में कोई संकोच नहीं किया है। हालांकि किस खेमे में किसको कितनी सीटें मिल पाएंगी इस बात को लेकर अभी औपचारिक तौर पर कोई खुलासा नहीं हुआ है लेकिन जिस तरह से दोनों ही खेमों में भारी खींचतान का माहौल दिखाई पड़ रहा है और तीसरी ताकतों का भारी घमासान जारी है उसे देखते हुए कई संभावनाएं और नए समीकरणों के बीजारोपण के लिये भी अनुकूल परिस्थितियां बन रही हैं जिसमें प्रदेश की दोनों बड़ी ताकतों की खेमेबंदी से अलग हटकर तीसरी ताकतें अगर एकजुट होकर नया विकल्प देने पर आपस में सहमति कायम कर लें तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।

दरअसल प्रदेश की दोनों बड़ी ताकतें इस बार विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही हैं जिसमें भाजपा की ओर से कराए गए सर्वे के बारे में बताया जा रहा है कि इस बार जमीनी स्तर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का चेहरा पहले की तरह लोकलुभावन नहीं दिख रहा है और पंद्रह वर्षों के शासन में पैदा हुई एंटीइनकम्बेंसी की जनभावना इस बार काफी प्रबल व मुखर होकर सामने आ सकती है।
लोग पूछते हैं कि बिहार में का बा, खुद ही देख ली बिहार में ई बा।#BiharElections2020 #BiharElections pic.twitter.com/aC9SluqK7L
— Jatinder Kumar ( Tony ) (@tonyJatinder9) October 14, 2020
दूसरी ओर विरोधी पक्ष की बात करें तो जहां एक ओर लालू राज के दौरान प्रदेश की बदहाली व कथित जंगलराज की यादें भी आम मतदाताओं के दिलो-दिमाग उतरी नहीं हैं वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री के चेहरे तौर पर आगे किये गये तेजस्वी यादव को नीतीश के विकल्प के तौर पर कितनी स्वीकार्यता मिल पाएगी इस बात को लेकर महागठबंधन के घटक दलों की ओर से लगातार नकारात्मक बातें ही की जा रही हैं। यानी प्रदेश में परिवर्तन की जमीन तो तैयार है लेकिन संभावना इस बात की भी है कि कहीं समुचित विकल्प का अभाव बदलाव की संभावनाओं को कमजोर ना कर दे। यही वजह है कि नया विकल्प प्रस्तुत करने के लिए छोटे दलों के बीच भी होड़ मची हुई है।

पिता के जाने के बाद लोजपा की ओर से चिराग पासवान को मुख्यमंत्री पद के लिये सबसे बेहतर बताया जा रहा है और रालोसपा की ओर से पूर्व केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा को समर्थ व सक्षम बताने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा पूर्व वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हा भी 16 छोटे-छोटे दलों को जोड़कर यूडीएफ की मोर्चाबंदी करके विकल्प बनने का प्रयास कर रहे हैं और पप्पू यादव ने जाप का और पुष्पम प्रिया ने प्लूरल्स पार्टी का झंडा बुलंद करके नया बिहार बनाने के लिए नए विकल्प के तौर खुद को प्रस्तुत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि छोटी ताकतों की ओर से बड़ा विकल्प प्रस्तुत करने की संभावनाएं साकार होती हैं या अपने-अपने खेमों को दुरूस्त करके दोनों पुरानी बड़ी ताकतें ही आमने-सामने की जंग में एक दूसरे को मात देने की राह पर आगे बढ़ती हैं। या फिर जाली खिचड़ी पककर रह जाएगी।







