जीके चक्रवर्ती
‘देश के कुछ लोगों ने इसी के बलबूते अपना शानदार करियर बनाने और कुछ लोग तो नाम और पैसे दोनों कमाने लगे इसी के चलते समय-समय पर हास्यास्पद याचिकाएं भी दायर होने लगी जिसके उदाहरण में एक याचिका अरब सागर का नाम बदलकर सिंधु सागर करने, राष्ट्रीय गान से सिंध शब्द को हटाने एवं भारत का नाम हिंदुस्तान करने जैसे याचिकाएं इनमे से हैं ‘
यह बड़ी विडंबना है कि हमारे देश में शासन द्वारा जो भी व्यवस्था कमजोर वर्ग के हित में बनाई जाती है उसे बड़ी ही धूर्तता पूर्ण तरीके से सम्पन्न स्तर के लोग हथिया कर उसका इस्तेमाल अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए प्रयोग करने लगते हैं। वास्तव में यदि हम भारतीय कानून में देखें तो हम यह जान पाते है कि सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए मुकदमे का प्रावधान रखा गया है। इसमें सामान्य याचिकाओं से पृथक इसमें यह आवश्यक नहीं है कि पीड़ित पक्ष खुद ही अदालत में जाए। यह काम देश के किसी भी नागरिक या स्वयं न्यायालय द्वारा पीड़ितों के पक्ष में दायर किया जा सकता है।
ऐसी याचिकाओं की अवधारणा सर्वप्रथम अमेरिका में विकसित हुई थी। हमारे देश में इसकी शुरुआत करने का श्रेय जस्टिस श्री पी.एन.भगवती को दिया जाता है। हमारे देश में सन 1980 के दशक में एक जनहित याचिका के माध्यम से समाज के दबे-कुचले तबके के लोगों को न्याय दिलाये जाने के अभियान ने जोर पकड़ा। इस दौर के विचाराधीन कैदियों,लावारिस बच्चों, वेश्याओं, से लेकर बाल मजदूरों और पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर अनेक लोगों द्वारा जनहित याचिकाएं दायर कीं जाती रही। उस वक्त अदालतों ने भी इसे प्रोत्साहित अवश्य किया एवं इसके माध्यम से कुछ मुकद्दमे भी सुलझाए गए, जिसकी वजह से कुछ लोगों पर होने वाले शोषणों से उन्हें मुक्ति भी मिली। लेकिन यह बात अवश्य कहा जायेगा कि इस्के माध्यम से समाज के व्यापक सामाजिक एवं आर्थिक बदलावों जैसे कामों को अंजाम तक नही पहुंचाया जा सका क्योंकि इस समय तक यह एक तबके के लिए यह फैशन बन गया और हमारे देश के लोगों ने स्वयंसेवी संगठनों, कार्यकर्ताओं और वकीलों के माध्यम से अपना हित साधना शुरू कर दिया।
देश के कुछ लोगों ने इसी के बलबूते अपना शानदार करियर बनाने और कुछ लोग तो नाम और पैसे दोनों कमाने लगे इसी के चलते समय-समय पर हास्यास्पद याचिकाएं भी दायर होने लगी जिसके उदाहरण में एक याचिका अरब सागर का नाम बदलकर सिंधु सागर करने, राष्ट्रीय गान से सिंध शब्द को हटाने एवं भारत का नाम हिंदुस्तान करने जैसे याचिकाएं इनमे से हैं। इन सब से एक एक अच्छी-खासी व्यवस्था को इस तरह से मजाक बनने को हमें रोकना होगा। देश के लोग अपने इस अधिकार के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की लड़ाईयां लड़ना चाहे तो उन्हें बहुत सावधान रहना होगा और दूसरों को भी इस बात के लिए भी प्रेरित एवं जागरूक करना होगा कि वे अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए इसे हथियार के रूप में प्रयोग न करें जिससे आने वाले भविष्य में देश के नागरिकों का इसके समुचित उपयोग करने का अधिकार बना रहे एवं सही साथ
ऐसी याचिकाओं को भी नियंत्रित करने का समुचित नियम बनाया जाना चाहिए यदि यह नहीं किया गया तो ये प्रचार, प्रतिशोध और राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का मात्र हथियार बन कर रह जाएंगी।







