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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    30 चन्द्रमा समूची पृथ्वी में समा सकते है

    By September 9, 2019 Current Issues 1 Comment5 Mins Read
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    Post Views: 744
    वायरल इशू:
    मीडिया और उससे प्रभावित-प्रेरित आम लोग चंद्रयान-2 को लेकर आमतौर पर विमर्श ऐसा करते  हैं जैसे कि किसी महाबली ने चाँद को धरती पर लाने के लिए कुछ ऐसा किया हो जो न भूतो न भाविश्य्तो .” भक्त उन्मादी हैं और विरोधी छिद्रान्वेषण  कर रहे हैं . सोचा क्यों न थोड़ा सा इस अभियान की जानकारी सरल शब्दों में दे दूँ ‘ विज्ञानं का विद्यार्थी होने और सात साल से ज्यादा एक डिग्री कालेज में गणित पढ़ने के दौरान मैंने कोशिश की कि विज्ञानं को सहज कर सकूँ .
    यह तो पहले भी बताया था कि सन 2009 में चंद्रयान का सफल प्रयोग हुआ था, हालांकि वह अभियान भी कोई एक साल बाद समाप्त घोषित कर दिया गया था.
    इस पोस्ट में मैंने चंद्रयान -2 में उपयुक्त  संयंत्र और उनके बारे में केवल आम लोगों के काम की बातों को शामिल करने का प्रयास किया हैं . यह तो हम सभी जानते हैं कि चंद्रमा पृथ्वी  के सबसे नजदीक ऐसी लौकिक संरचना है जो समूचे सौर मंडल और अन्तरिक्ष के बारे में जानकारी के द्वार खोलती हैं .चन्द्रमा की दूरी धरती से तीन लाख चौरासी हज़ार चार सौ किलोमीटर है . इसका व्यास 1737.1(१७३७.१) वर्ग किलोमीटर है यानी धरती इससे कोई तीस गुना ज्यादा बड़ी है– अर्थात 30 चन्द्रमा समूची पृथ्वी में समा सकते है .
    चन्द्रमा का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिकों के लिए बेहद अछूता है यहाँ बहुत गहरे गड्ढे और पहाड़ हैं एवरेस्ट के आकार के , सं 2009 के चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर जल कि मौजूदगी की संभावना के कुछ प्रमाण तलाशे थे , यहाँ सौर मंडल के प्रारंभ के जीवाश्म यानी फॉसिल भी हैं .
    अभी तक भारत ने चंद्रमा की साथ के स्थान पर उससे मिले चित्र व् एनी प्रयोगों से चंद्रमा को जाना था . चंद्रयान-2 का मकसद चंद्रमा के सतह पर उतर कर सीधे वहां के चित्र आदि भेजना था .
    यह अभियान हमारे लिए इस लिए महत्वपूर्ण और अनूठा था क्योंकि यह पहले पूरी तरह स्वदेशी अभियान था. इसे अलावा दुनिया का ऐसा चौथा देश भारत बना जिसने दक्षिणी ध्रुव पर उतरने  या सॉफ्ट लेंडिंग  का प्रयोग किया.और भारत का ऐसा पहला प्रयोग तो था ही.
    इसरो चंद्रयान-2 को पहले अक्टूबर 2018 में लॉन्च करने वाला था। बाद में इसकी तारीख बढ़ाकर 3 जनवरी और फिर 31 जनवरी कर दी गई। बाद में अन्य कारणों से इसे 15 जुलाई तक टाल दिया गया। इस दौरान बदलावों की वजह से चंद्रयान-2 का भार भी पहले से बढ़ गया। ऐसे में जीएसएलवी मार्क-3 में भी कुछ बदलाव किए गए थे। 15 जुलाई की रात मिशन की शुरुआत से करीब 56 मिनट पहले इसरो ने ट्वीट कर लॉन्चिंग आगे बढ़ाने का ऐलान कर दिया गया था। चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग 22 जुलाई को दोपहर 2.43 बजे हुई .
    इस लांचिंग का माध्यम था जिओसिन्क्रोनस सेटेलाईट लांच व्हीकल -तीन Geosynchronous Satellite Launch Vehicle Mark-III (GSLV Mk-III). इसके तीन हिस्से थे . यह तीन टन तक वजन के उपग्रह या सेटेलाईट को अपनी कक्षा में स्थापित करने कि ताकत रखता था . इसके मुख्य तीन भाग थे – S-200सॉलिड रोकेट बूस्टर , L-110 लिक्विड स्टेज और C-25 उपरी हिस्सा .
    उपरी हिस्से में सबसे महत्वपूर्ण है आर्बिटर – इसका वजन 2379 किलो  और इसकी खुद बिजली या उर्जा उत्पादन कि क्षमता 1000 वाट है . इस यंत्र का मुख्य कम IDSN अर्थात इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क से सम्पर्क रख कर अपने घूमने  के मार्ग के चित्र व् सूचना धरती पर भेजना है, यह अभी बिलकुल ठीक काम कर अहा है और इसी ने  चंद्रमा की सतह पर गिरे विक्रम के चित्र भी भेजे हैं , यह यंत्र चंद्रमा के ध्रुव की कक्षा में  सौ गुना सौ किलोमीटर क्षेत्र में चक्कर लगा रहा हैं .
    अब बात अक्र्ते हैं विक्रम लेंडर की- जिसके कारण हमारा चन्द्र अभियान अनूठा था और इसी के कारण हमें असफलता मिली-  इस यंत्र का नाम भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान के जंक कहे जाने वाले विक्रम साराभाई के नाम पर रखा  गया था  इसका वजन १४७१ किली था और यह ६५० वाट उर्जा का स्वयम उत्पादन की क्षमता रखता था इसे एक चंद्रमा -दिवस अर्थात धरती के १४ दिन के बराबर काम करने के  लिए बनाया गया था . इसका असल मकसद चंद्रमा  की सतह  पर धीरे से उतरना और वहां अपने भीतर रखे चलायमान घुमंतू रोबोट यंत्र को सतह  पर उतार देना था
    अब अगला हिस्सा है – रोवर प्रज्ञान – यानी घुमंतू प्रज्ञान .
     चूँकि विक्रम का  सहज  उतराव या सॉफ्ट लेंडिंग हो नहीं पायी सो यह घुमंतू काम काम कर नहीं रहा हैं . इसका वजन 27 किलो मात्र है और यह छह पहियों वाली रोबोटिक गाडी है यह 50 वात उर्जा उत्पादन खुद करने में सक्षम है और यह महज आधा किलोमीटर ही चल एकता हैं . इससे मिली सूचनाएं लेंडर अर्थात विक्रम को आनी थी और विक्रम के जरिये आर्बिटर के माध्यम से धरती तक
    ऐसा माना जा रहा है कि विक्रम के चंद्रमा की सतह  पर उतरते  समय उसकी  या तो गति नियंत्रित नहीं हो पायी या फिर उतरने के स्थान पर किसी ऊँचे पहाड़ के कारण उसकी दिशा भ्रमित हुई और वह सीधा नहीं उतर पाया .
    सनद रहे विक्रम को 70 डिग्री  अक्षांश अर्थात latitude पर दो क्रेटर अर्थात गहरे खड्ड – मेनेजेनस -सी और सिंथेलीयस -एन के बीच उतरना था . ये क्रेटर एवरेस्ट जैसे गहरे हैं . यदि विक्रम सही तरीके से उतर जाता ओ हमारा घुमंतू प्रज्ञान भी काम करने लगता, अब आपको लांचर, आर्बिटर , विक्रम और घुमन्तु के वास्तविक चित्र भी दे रहा हूँ जो इसरो ने ही  उपलब्ध करवाए हैं
    यह पोस्ट हर उस इन्सान के लिए है जो अपने बच्चों को वैज्ञानिक उपक्रमों को सियासती नहीं वैज्ञानिक के रूप में  बता कर वैज्ञानिक वृति  के विकास की सोच रखता है वर्ना लोग केवल अन्तरिक्ष विज्ञानं के मुखिया को रोता देख महज भावनातम टिप्पणिया करेंगे . कोई तकनीकी गलती हो तो सुझाव भी देना ….!
    – पंकज चतुर्वेदी की वॉल से

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    1 Comment

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