जी क़े चक्रवर्ती
कोई भी देश हो चाहे कोई भी समाज के बच्चे हमारे आने वाली अगली पीढ़ी के कर्णधार होने के साथ ही साथ देश व समाज के निर्माता एवं पहचान होते हैं। आज हमारे समाज के वही नौनिहाल तनाव ग्रस्त होने या रहने लगे हैं पहले तनाव केवल हम वयस्क लोगों में ही होता था, लेकिन आज वर्त्तमान समय में हमारे बच्चे भी पूरी तरह से इसकी चपेट में आ गये हैं। आज के समय बच्चों में तनाव सबसे ज्यादा उसके पढ़ाई-लिखाई को लेकर है, माँ-बाप से संवादहीनता की स्थिति को लेकर है। बच्चे अपने परिवार, स्कूल और कोचिंग इन तीनो में उचित तारतम्य स्थापित नहीं कर पाने के कारण तनाव के शिकार हो जाते हैं।
हमारे सामाजिक व्यवस्था एवं संरक्षकों के कार्य प्रणाली की वजह से उनके जीवन में केवल पढ़ाई ही है। आज वर्त्तमान समय में मोबाइल एवं इंटरनेट जैसी प्रौद्योगिकी ने उनसे उनका बचपन ही छीन लिया है। अब हमारे यहाँ के बच्चे जो सीधे एक वयस्क की तरह आचरण करते हैं। शारीरिक रूप से भले ही वे अभी बच्चे हैं लेकिन मानसिक रूप से आज के बच्चे अपने बचपन में ही वयस्क हो जाते हैं।
यदि हम इस पहलु पर गौर करें तो यह सर्वप्रथम हमें यह देखने को मिलेगा कि वर्त्तमान समय में माता-पिता के पास समय का बहुत ज्यादा अभाव होता है, बेशक यह उनकी अपनी समस्याएं हैं। यह बात अवश्य है कि उनके पास अपनी नौकरी और कारोबार की व्यस्तताएं होती हैं जिसकी वजह से उनके दैनिक जीवन में अनेकों प्रकार के तनाव भी होते है। जिन परिवारों में मां नौकरी पेशे में है, वहां संवादहीनता की स्थिति और भी अधिक गंभीर है।
घर में बच्चे अपने माता-पिता से कभी खुलकर बातचीत भी नहीं कर पाते हैं। यदि हम अपने पास-पड़ोस के बच्चों को गौर से देखें तो हम अधिकतर बच्चों को गुमसुम रहने एवं अपने परिवार से अलग-थलग दूर रहते हुए ही पायेंगे। अधिकतर बचपन में यह देखने में आ रहा है कि वह स्कूल जाने से कतराते हैं, स्कूल का इम्तिहान उन्हें और भी ज्यादा भयभीत करता है। जिसके फलस्वरूप, ऐसे बच्चे बात-बात पर चिढ़ते रहते और कभी-कभी तो रोने भी लगते हैं और ऐसी अवस्था में स्कूल और घर दोनों जगह पर बहुत आक्रामक हो जाते हैं ऐसे में वे कई दफे तो अप्रिय घटनाओं तक को अंजाम दे बैठते हैं। अक्सर यह भी सुनने में आता है कि अमुक बच्चे ने तनाव के कारण आत्महत्या कर ली। कभी -कभी तो आईआईटी जैसे संस्थानों तक के छात्र-छात्राओं को भी ऐसा कर गुजरते हुए सुनने में आता ही रहता हैं। यह किसी भी समाज एवं देश के लिए यह बहुत चिंताजनक विषय-स्थिति है।
शायद हम लोगों ने गौर नहीं किया है कि हमारे आपके बच्चों में आज बहुत से बदलाव आ चुका है। आज कल किसी भी बच्चे का सोने, पढ़न, उठने और सोने के वक्त और उसके हाव-भाव से लेकर खानपान सभी में वहुत बड़ा परिवर्तन आ चुके है।
कभी हम और आप अपने बचपन में सुबह-सुबह उठकर पढ़ते थे, आज के समय का बच्चा या तो मोबाइल, टैबलेट पर या देर रात तक जगने के आदी हो चुके हैं। उसे मोमो, बर्गर, मैगी एवं पिज्जा इत्यदि जैसे फाटस्फूड से अधिक लगाव है, जबकि हमारी आपकी खान-पान की आदतें आज समय तक उसी दाल-रोटी पर अटकी हुई है। अब आज के समय की हमारी पीढ़ी एसएमएस और व्हाट्सएप पर जुटी रहती है। आज के लड़के-लड़कियां दिन-रात आपस में चैट किया करते हैं। हम और आप बहुत तरक्की करने के बाद भी आज तक फोन कॉल पर ही अटके पड़े हैं।
अक्सर यह देखने में आता है कि आजकल के अधिकतर माता-पिता नयी परिस्थितियों से अपना तालमेल बैठाने के स्थान पर वही अपनी पुरानी बातों का रोना-धोना दोहराते रहते हैं। समाज में परिवर्तन आना तो प्रकृति के नियमानुसार चलता ही रहेगा बस आपका और हमारा दायित्व इस नए परिवर्तन एवं बदलाव को जल्दी से जल्दी स्वीकार करके नयी परिस्थिति से सामंजस्य बैठने की कोशिश करें।







