कैमरे नहीं कमरे चाहिए बच्चों को

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पंकज चतुर्वेदी

दिल्ली सरकार स्कूल की कक्षाओं में कैेमरे लगवाने और स्कूल में क्या हो रहा है, उसका सीधा प्रसारण घर घर तक करने पर उतारू है। जबकि असल में दिल्ली के स्कूलों में कमरों की कमी है। जान लें चित्रों में जिस तरह के स्मार्ट क्लास रूम दिखाए जा रहे हैं व कुछ ही स्कूलो मे एक पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में है। दिल्ली सरकार के स्कूलो का आंकाड़ा है कि यहां क्लास में गत तीन सालों में चार शिक्षकों की हत्या बच्चों ने कर दी और आधे दर्जन हमलों के भी हैं। कागजों में यहां के स्कूलों मे एक हैप्पीनेस पाठ्यक्रम चलता है जिसे मखौल या मजाक या समय काटने से ज्यादा नहीं माना जाता है। यह भी समझना जरूरी है कि स्कूल में हिंसा, शिक्षक से दुर्व्यवहार आदि गुडगांव, लखनउ और यमुना नगर के ऐसे स्कूलों में भी व्याप्त है जहां कैमरों व अत्याधुनिक विधाओं और सुरक्षा गार्ड से लैस व्यवस्था है।

समझ से परे हैं कि क्या अभी तक सरकारी स्कूलों में पढाई हो नहीं रही थी, या अब समाज में शिक्षक के प्रति अविश्वास का दायरा गहरा हो गया है। समय -समय पर बहुत से अखबार और मीडिया चैनल बाकायदा मुहिम चलाते रहते हैं कि अमुक स्कूल में सुरक्षा के साधन नहीं है, कहीं पर बंदूकधारी गार्ड को दिखा कर सुरक्षा को पुख्ता कहा जा रहा है। स्कूल के चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरा लगाए जाने पर जोर दिया जा रहा है। माता-पिता कैमरे की जद में बच्चों के आने पर एक और काम में व्यस्त हो जाएंगे कि तनिक देखा जाए कि मेरा बच्चा कया कर रहा है या टीचर केसे पढ़ा रहा है।

दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था की त्रासदी यह है कि यहां के विद्यालयों में पढ़ाई में अच्छे व कमजोर बच्चों को अलग-अलग तीन सेक्शन में बांट दिया गया है। बौद्धिक कक्षा में अच्छे बच्चे, निश्ठा में उनसे कम नंबर लाने वाले और न्यू निश्ठा में कमजोर बच्चे। हालांकि भारत में शिक्षा के जितने भी सिद्धरंत हैं उनका तो यही कहना है बच्चे एकसाथ मिल कर सीखते व अपने को सुधारते हैं। दिल्ली सरकार की मौजूदा व्यवस्था से तीसरी कक्षा में रखे गए बच्चों में हीन भावना है। यही नहीं कमजोर बच्चों के पाठ्यक्रम में कटौती कर दी गई है। नियमानुसार उन्हें कक्षा आठ तक पास भी करना है सो इस तरह नौंवी में आए बच्चों का आधारभूत पाठ्यक्रम भी मजबूत नहीं होता क्योंकि वे तो आधा अधूरा पाठ्यक्रम पढ़ कर आए हैं। चूंकि साठ फीसदी से कम परिणाम वाले स्कूलों से जवाब तलब होता है सो शिक्षक भी जबरदस्ती बच्चों को उतीर्ण कर रहे हैं।

दिल्ली के स्कूलों में कमरों की कमी के हालात की बनगी है मदनपुर खादर का स्कूल। यहां बच्चों की संख्या इतनी ज्यादा है कि दो शिफ्ट में स्कूल चलाने के बावजूद बच्चों को एक दिन छोड़ कर बुलाया जाता है। यहां कमरों की कमी है लेकिन कोई ध्यान देने वाला नहीं, लेकिन जनकपुरी पूर्व में इतने कमरे हैं कि वे खाली पड़े रहते हैं। असल में दिल्ली सरकार आंकड़ों में कमरों की संख्या दिखाने के लिए जरूरत वाले स्थानों के बनिस्पत जहां जमीन उपलब्ध है वहां कमरे बनवा रही है। जनकपुरी स्कूल के मैदान में कई खेल टूर्नामेंट होते थे, वैसे भी हीं बच्चों की संख्या कम थी, लेकिन वहां मैदान खत्म कर कमरे बनवा दिए गए। जहां तक कुछ विज्ञापनों में चमकते स्मार्ट क्लास रूम की बात है, यह गिने-चुने स्कूलों में ही है। बिंदापुर जैसे सुदूर विद्यालयों में कमरों में पंखे भी नहीं चलते। दो दशक पहले दिल्ली में नवोदय विद्यालय की तर्ज पर बनाए गए और उस समय ख्याति प्राप्त सर्वोदय विद्यालयों की तो दुर्गति ही हो गई। ऐसे में सरकार कक्षा में कै।मरे लगवाने को अपनी उपलब्धि कैसे कह सकती है?

एक बात जान लें कि कैमरे के सामने कभी भी कोई स्वाभविक नहीं रह पाता, वह सतर्क हो ही जाता है। प्राथमिकता में यह भले ही स्वाभाविक लगे, लेकिन दूरगामी सोच और बाल मनोविज्ञान की दृश्टि से सोचें तो हम बच्चे को बस्ता, होमवर्क, बेहतर परिवहन, परीक्षा में अव्वल आने, खेल के लिए समय ना मिलने, अपने मन का ना कर पाने, दोस्त के साथ वक्त ना बिता देने जैसे अनगिनत दवाबों के बीच एक ऐसा अनजाना भय दे रहे हैं जो षायद उसके साथ ताजिंदगी रहे। यह जान लें कि जो शिक्षा या किताबे या सीख, बच्चों को आने वाली चुनौतियों से जूझने और विशम परिस्थितियों का डट कर मुकाबला करने के लायक नहीं बनाती हैं, वह रद्दी से ज्यादा नहीं हैं।

दुर्भाग्य है कि हमारा पूरा सिस्टम अविश्वास की कमजोर इमारत पर खड़ा है। हर जगह निगरानी है, सवाल हैं। कई राजयों में शिक्षकों को अपने मोबाईल पर हाजिरी देना होता हे। यदि नेटवर्क ना आता हो तो शिक्षक पेड़ पर चढ़कर घंटों अपनी हाजिरी सुनिश्चित करने के लिए अपना समय जाया करता है। कई बार वह चाहता है कि अधिकसमय बच्चों को पढ़ाने में लगाए, लेकिन उसका सुपरवाईजर केवल यह देखना व दर्ज करना चाहता है कि शिक्षक कितने बजे पहुंचा। इसमें कोई शक नहीं कि कोई ीा सेव में सम की पाबंदी और निमितता अनिवाय है, लेकिन जान लें कि जितना बड़ा अविश्वस होगा, उतने ही चोर दरवाजे जुगाउ़बाज लोग तलाश ही लेते हैं। स्कूल एक सहज परिवेश का स्थाना होना चाहिए जहां बच्चे खलें, लड़ें, सवाल करें, बगैर टाईम टेबल के कुछ अचानक करें, लेकिन कैमरों और सुरक्षा के बीच वे भयभीत, बंधे हुए और असहज ही होंगे। देश की राजधानी दिल्ली में अधिकांश सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या की तुलना में कमरे और शिक्षक बेहद कम हैं। नगर निगम द्वारा संचालित स्कूलों के शिक्षकों को नियमित पगार नहीं मिलती। जाहिर है कि सरकार की प्राथमिकता कैमरों से ज्यादा कमरों को सक्षम बनाने की हेाना चाहिए। इससे भी ज्यादा आज जरूरत इस बात की है कि बच्चों को ऐसी तालीम व किताबें मिलें जो उन्हें वक्त आने पर रास्ता भटकने से बचा सकें।

संवेदना, और घटनाओं के प्रति जागरूकता एक बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण के बड़े कदम हैं, उनके पालकों को भी जानना चाहिए कि उनका बच्चा विद्यालय की अवधि में सुरक्षित हाथेां में है। लेकिन इनके माध्यम से उसे भयभीत करना, कमजोर करना और कैमरे जैसे तात्कालिक कदम उठाना एक बेहतर भविश्य का रास्ता तो नहीं हो सकता। यदि वास्तव में हम चाहते हैं कि शिक्षक और बच्चों के बीच विश्वास की डोर मजबूत हो तो हमारी शिक्षा, व्यवस्था, सरकार व समाज को यह आश्वस्त करना होगा कि भविश्य में कोई शिक्षक ना तो अपने कर्तव्य से विमुख होगा और ना ही बच्चा स्कूल से मुंह मोड़ेगा। उसके बचपन में स्कूल, पुस्तकें, ज्ञान, स्नेह, खेल, सकारात्मकता का इतना भंडार होगा कि वह पथभ्रश्ट हो ही नहीं सकता। भय हर समय भागने की ओर प्रशस्त करता है और भगदड़ हर समय असामयिक घटनाओं का कारक होती है। कैमेरे भय के प्रतीक हैं। विशम हालात में एक दूसरे की मदद करना, साथ खड़ा होना, डट कर मुकाबला करना हमारी सीख का हिस्सा होना चाहिए जोकि गैरमशीनी भावना है।

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