डॉ दिलीप अग्निहोत्री
राजनीतिक विरोध और चुनावी वादों का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन सुरक्षा व अखंडता जैसे विषयों पर राष्ट्रीय सहमति होनी चाहिए। विश्व के प्रायः अन्य प्रजातांत्रिक देशों में इस मर्यादा का पालन होता है। आतंकी हमले के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि विकसित देशों ने बेहद सख्त सुरक्षा कानून बनाये। लेकिन वहां के परस्पर विरोधी राजनीतिक दल भी इस पर चर्चा नहीं करते। इसे उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय सहमति का विषय माना। चुनाव में किसी प्रमुख विपक्षी दल ने अपने घोषणापत्र में यह वादा नहीं किया कि वह विजयी हुए तो इन सख्त कानूनों को हटा लेंगे। मतलब सरकार के घोर विरोधी दल को भी इस कीमत पर सत्ता की दावेदारी से परहेज था। इसके विपरीत भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी राजनीति होती है। कांग्रेस पार्टी का घोषणापत्र इसकी बानगी है। इसमें बेहिसाब वादे है। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस अपने लंबे शासन में जो नहीं कर सकी, अब उसकी भरपाई करना चाहती है। गौतलब है कि कांग्रेस की अनेक योजनाएं चालीस वर्ष से लंबित थी, इन्हें नरेन्द्र मोदी सरकार ने साकार किया। फिर भी ऐसे वादों की कांग्रेस ने झड़ी लगाई है।यहां तक गनीमत है। सभी पार्टियां चुनाव में अपना पिटारा खोल देती है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा संबन्धी वादे अनुचित और आपत्तिजनक होते है। कांग्रेस को अपने घोषणा पत्र में ऐसे वादों से परहेज करना चाहिए था। यह सन्योग था कि जिस समय नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू कश्मीर के लिए वजीरे आजम या प्रधानमंत्री पद की मांग की , उसी समय कांग्रेस के घोषणा पत्र में उल्लिखित सुरक्षा नियमों संबन्धी वादे चर्चा में आये। दोनों का जम्मू कश्मीर में गठबन्धन भी है। घोषणापत्र में कश्मीर घाटी से सेना और सीएपीएफ की मौजूदगी को कम करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जम्मू-कश्मीर पुलिस को और अधिक जिम्मेदारी सौंपने का वादा किया गया है। कहा गया कि जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र बल को विशेष शक्तियां देने वाले अधिनियम एएफएसपीए और अशांत क्षेत्र अधिनियम की समीक्षा की जायेगी। सुरक्षा की जरूरतों और मानवाधिकारों के संरक्षण में संतुलन के लिये कानूनी प्रावधानों में उपयुक्त बदलाव किये जायेंगे।
देशद्रोह के अपराध को परिभाषित करने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा एक सौ चौबीस ए को समाप्त किया जाएगा। जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को बदलने नहीं दिया जाएगा। सशस्त्र बल अफस्पा अधिनियम, उन्नीस सौ अठावन में से यौन हिंसा, गायब कर देना तथा यातना के मामलों में प्रतिरक्षा जैसे मुद्दों को हटाया जायेगा ताकि सुरक्षा बलों और नागरिकों के बीच संतुलन बना रहे। कोई भी जांच एजेंसी जिसके पास-तलाशी लेने, जब्त करने, संलग्न करने, पूछताछ करने और गिरफ्तार करने की शक्तियां है, वह सभी भारतीय दण्ड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और भारतीय संविधान के अधीन होंगे। इसके लिए कांग्रेस कानूनों में आवश्यक संशोधन करेगी।
कांग्रेस के इन वादों पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तीखा प्रहार किया है। उन्होंने इसे अव्यावहारिक और देश को बांटने वाला बताया है। जेटली के खुला आरोप है कि इसे तैयार करने में शहरी नक्सलियों की मदद ली गई है। इसमें कश्मीरी पंडितों के लिए सहानुभूति के शब्द तक नहीं है।
अलगाववादियों से बातचीत करने, आफस्पा सशस्त्र सेना विशेष सुरक्षा कानून को हटाने, देशद्रोह की धारा को समाप्त करने और सभी अपराधियों को जमानत देना जैसे वादे राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर कर देश को विभाजन की ओर ले जाने वाला है। जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक किसी कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने इसे निरस्त करने का प्रयास नहीं किया। लेकिन पिछले कुछ सालों से शहरी नक्सलियों के टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ दोस्ती दिखाने वाले राहुल गांधी उनके कहने पर इसे निरस्त करने की बात कह रहे हैं। इसी तरह अफस्पा को हटाने की बात कर कश्मीर में तैनात सुरक्षा बलों के जवानों के मनोबल को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।
कांग्रेस ने तीन लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बांटने की घोषणा तो कर दी, लेकिन जब वह सत्ता में होती है तब सौ में से पन्द्रह पैसे ही नीचे पहुंचने पर कुछ नहीं करती। यह कार्य नरेंद मोदी ने किया। मोदी के इन प्रयासों से आठ करोड़ लोग ऐसे निकाले जो फर्जी थे, और आर्थिक लाभ उठा रहे थे। एक करोड़ पन्द्रह लाख करोड़ रकम चोरी होती थी। नरेंद मोदी ने आधार को सही ढंग से लागू करके इसे रोक दिया। नियम डीबीटी कारण एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम बच गई। इस प्रकार नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री के चैकीदार होने से देश को होने वाले लाभ बताए। लाखों करोड़ रुपये की चोरी केवल इस भावना से रुक गई। यूपीए सरकार के अंतिम चरण में उनके वित्त मंत्री ने कहा था कि हमें गर्व है कि हम दुनिया की ग्यारहवीं ग्यारहवीं अर्थव्यवस्था में हैं, जबकि वर्तमान सरकार के पांच वर्ष में भारत विश्व की छठी शीर्ष अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया है। जिसने नौ हजार करोड़ रुपये का घपला किया, उनके चौदह हजार करोड़ जब्त किए। दुनिया के किसी भी कोने में प्रापर्टी होगी, जब्त होकर रहेगी। भारत के कानून की शरण में आना होगा।
कांग्रेस को अपनी न्याय योजना पर बहुत विश्वास है। कांग्रेस बीस करोड़ लोगों को प्रतिवर्ष बहत्तर हजार रुपये देने का वादा कर रही है। अरुण जेटली ने कहा कि न्याय के लिए किसी भी सब्सिडी को गैरजरूरी बताकर खत्म किया जा सकता है।
किसानों की कर्ज माफी, कर्ज रिकवरी को सिविल अपराध बनाना और एक समान जीएसटी को भी जेटली ने नासमझी करार दिया। कुछ राज्यों ने कानून बनाकर अपराध की श्रेणी में रखा है, केंद्र की उसमें कोई भूमिका ही नहीं है। कांग्रेस शासित प्रदेशों में किसानों की कर्ज माफी उचित ढंग से लागू नहीं हो सकी है। जेटली ने कहा कि जीएसटी को पांच और पन्द्रह प्रतिशत के दो स्लैब तक सीमित कर दिया जाएगा, लेकिन भारत जैसे देश में गरीबों और अमीरों के उपयोग की वस्तुओं और सेवाओं पर एक समान टैक्स की बात बेमानी है।
बताया गया कि केंद्र सरकार की यह योजना गरीबों को मिलने वाली मौजूदा सब्सिडी के अलावा होगी। यानी इससे मौजूदा सब्सिडी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। न्याय के लिए किसी भी सब्सिडी को गैरजरूरी बताकर खत्म किया जा सकता है। इसके अलावा आमजन पर कर भी बढ़ाया जाएगा। जाहिर है कि कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जो आर्थिक वादे किए है, उनमें अनेक पेंच है। यूपीए सरकार ने इस मोर्चे पर बेहतर कार्य किये होते ,तो आक इन घोषणाओं पर विश्वास किया जा सकता था। इसी प्रकार कश्मीर घाटी से सेना और उनके अधिकारों में कटौती का वादा राष्ट्रीय सुरक्षा के विरोध में है।
चुनाव आयोग को चाहिए कि घोषणा पत्रों पर भी आचार संहिता लागू करे।







