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    गंगा नदी से गायब होती देसी मछलियां?

    ShagunBy ShagunOctober 16, 2020 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    भारत की सबसे बड़ी नदी और दुनिया की पांचवीं सबसे लंबी नदी गंगा भारत के अस्तित्व, आस्था और जैव विविधता की पहचान है। नदी केवल जल की धारा नहीं होती, उसका अपना तंत्र होता है जिसमें उसके जलचर सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। गंगा-जल की पवित्रता को बरकरार रखने में उसके जल में लाखो साल से पाई जाने वाली मछलियों-कछुओं की अहम भूमिका है। जहां सरकार इसकी जल-धारा को स्वच्छ बनाए रखने के लिए हजारों करोड़ की परियोजना का क्रियान्वयन कर रही है वहीं यह बहुत बड़ी भी चेतावनी है कि गंगा में मछली की विविधता को खतरा पैदा हो रहा है और 29 से अधिक प्रजातियों को खतरे की श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है। जान लें इसमें 143 किस्म की मछलियां पाई जाती हैं।

    हालांकि अप्रैल 2007 से मार्च 2009 तक गंगा नदी में किए गए एक अध्ययन में 10 प्रजाति की विदेशी मछलियां मिली थीं। अंधाधुंध और अवैध मछली पकड़ने, प्रदूषण, जल अमूर्तता, गाद और विदेशी प्रजातियों के चलते मछलियों की पारंपरिक प्रजातियों पर खतरा पैदा हो गया है। पिछले दिनों वाराणसी में रामनगर के रमना से होकर गुजरती गंगा में डाल्फिन के संरक्षण के लिए काम कर रहे समूह को एक ऐसी विचित्र मछली मिली जिसका मूल निवास हजारों किलोमीटर दूर दक्षिणी अमेरिका में बहने वाली अमेजान नदी है। चूंकि गंगा का जल तंत्र किसी भी तरह से अमेजान से संबद्ध है नहीं तो इस सुंदर सी मछली के मिलने पर आश्चर्य से ज्यादा चिंता हुई। हालांकि दो साल पहले भी इसी इलाके में ऐसी ही एक सुनहरी मछली भी मिली थी। सकर माउथ कैटफिश नामक यह मछली पूरी तरह मांसाहारी है और जाहिर है कि यह इस जल-क्षेत्र के नैसर्गिक जल-जंतुओं का भक्षण करती है। इसका स्वाद होता नहीं, अतः ना तो इसे इंसान खाता है और ना ही बड़े जल-जीव, सो इसके तेजी से विस्तार की संभावना होती है। यह नदी के पूरे पर्यावरणीय तंत्र के लिए इस तरह हानिकारक है कि नमामि गंगे परियोजना पर व्यय हजारों करोड़ इसे बेनतीजा हो सकते है।

    हालांकि गंगा नदी पर मछलियों की कई प्रजातियों के गायब होने का खतरा कई साल पुराना है और यह उद्गम स्थल पहाड़ों से ही शुरू हो जाता है। गंगा की अविरल धारा में बाधा बने बांध मछलियों के सबसे बड़े दुश्मन हैं। गंगा नदी से मछलियों की कई प्रजातियां गायब हो रही हैं। पर्वतीय क्षेत्रों से मैदानी इलाकों में पानी के साथ आने वाली मछलियों की कई प्रजातियां ढूंढे नहीं मिल रही। हम सभी जानते हैं कि गंगा को उत्तरांचल में कई जगह बांधा गया है और ये बांध सीमेंट से निर्मित हैं। सीमेंट की दीवारों पर काई जम जाती है। इसके फलस्वरूप मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है जो विभिन्न मछलियों के अस्तित्व को खतरे में डाल रही है। बांधों से नदी का चेहरा बदल जाता है। इनके कारण बहाव अवरूद्ध होता है व पानी ताजा नहीं रहता। साथ ही कीटनाशक नदी के पानी में घुल रहे हैं। इससे रीठा, बागड़, हील समेत छोटी मछलियों की 50 प्रजातियां गायब हो गई हैं। मछलियों की प्रजातियों को बचाने के लिए जरूरी है कि मछलियां सुरक्षित प्रजनन के लिए नैसर्गिक पर्यावास विकसित किए जाएं । जान लें जैव विविधता के इस संकट का कारण हिमालय पर नदियों के बांध तो हैं ही, मैदानी इलाकें में तेजी से घुसपैठ कर रही विदेशी मछलियों की प्रजातियां भी इनकी वृद्धि पर विराम लगा रही हैं।

    गंगा के लिए खतरा बन रही विदेशी मछलियों की आवक का बड़ा जरिया आस्था भी है। विदित हो हरिद्वार में मछलियां नदी में छोड़ने को पुण्य कमाने का जरिया माना जाता है। यहां कई लोग कम दाम व सुंदर दिखने के कारण विदेशी मछलियों को बेचते हैं। इस तरह पुण्य कमाने के लिए नदी में छोड़ी जाने वाली यह मछलियां स्थानीय मछलियों और उसके साथ गंगा के लिए खतरनाक हो जाती हैं। गंगा में देसी मछलियों की संख्या करीब 20 से 25 प्रतिशत तक हो गई है जिसकी वजह ये विदेशी मछलियां हैं। हरिद्वार में यह मछलियां सस्ते दाम पर मिल जाती हैं, इसलिए लोग विदेशी प्रजाति की मछलियां खरीदकर गंगा नदी में छोड़ देते हैं ,लेकिन पुण्य कमाने के लिए नदी में छोड़ी जाने वाली यह मछलियां स्थानीय मछलियों के अस्तित्व के लिए खतरा बन चुकी हैं।

    विदेशी प्रजाति की मछलियों की तादाद तेजी से बढ़ती है। आकार में भी स्थानीय मछलियों के मुकाबले विदेशी मछलियां कहीं बड़ी होती हैं। मत्स्य पालन के लिए यह उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन नदी में चले आने से इनके और भी कई नुकसान होते हैं। ये मछलियां कारखानों से नदी में आने वाले विषैले पदार्थों को भी खा जाती हैं जिससे इन मछलियों को आहार के तौर पर खाना स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है।

    गंगा और इसकी सहायक नदियों में पिछले कई वर्षों के दौरान थाईलैंड, चीन व म्यांमार से लाए बीजों से मछली की पैदावार बढ़ाई जा रही है। ये मछलियां कम समय में बड़े आकार में आ जाती हैं और मछली-पालक अधिक मुनाफे के फेर में इन्हें पालता है। हकीकत में ये मछलियां स्थानीय मछलियों का चारा हड़प करने के साथ ही छोटी मछलियों को भी अपना शिकार बना लेती हैं। इससे कतला, रोहू और नैन जैसी देसी प्रजाति की मछलियों के अस्तित्व के लिए खतरा खड़ा हो गया है। किसी भी नदी से उसकी मूल निवासी जलचरों के समाप्त होने का असर उसके समूचे पारिस्थितिकी तंत्र पर इतना भयानक होता है कि जल की गुणवत्ता, प्रवाह आदि नष्ट हो सकते हैं। मछली की विदेशी प्रजाति खासकर तिलैपिया और थाई मांगुर ने गंगा नदी में पाई जाने वाली प्रमुख देशी मछलियों की प्रजातियों कतला, रोहू और नैन के साथ ही पड़लिन, टेंगरा, सिंघी और मांगुर आदि का अस्तित्व खतरे में डाल दिया है।

    जानकारी के अभाव में गरीब लोग थाई मांगुर और तिलैपिया मछली का भोजन करते हैं क्योंकि बहुतायत में पैदा होने के चलते इन मछलियों का बाजार भाव कम है। वहीं दूसरी ओर, देसी मछलियों की तादाद कम होने से इनके भाव ऊंचे हैं जिससे ये सभ्रांत परिवारों की थाली की शोभा बढ़ा रही हैं। थाई मांगुर और तिलैपिया प्रजाति की मछलियां साल में कई बार प्रजनन करती हैं इसलिए इन मछलियों पर नियंत्रण पाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई है। वहीं फरक्का बैराज के निर्माण के बाद से हिलसा मछली एक बड़ी आबादी की पहुंच से बाहर हो गई है क्योंकि यह मछली उत्तर भारत में नहीं आ पाती और हुबली नदी तक ही सीमित होकर रह गई है।

    विदेशी आक्रान्ता मछलियों में चायनीज कार्प की कुछ प्रजातियाँ प्रमुखतः कामन कार्प और शार्प टूथ अफ्रीकन कैट फिश यानि विदेशी मांगुर और अब नए रंगरूट के रूप में अफ्रीका मूल की टिलैपिया है जो वंश विस्तार के मामले में सबसे खतरनाक है .आज स्थति यह है कि आप कोई भी छोटा जाल गंगा में डाले तो किसी टिलैपिया के आने की संभावना नब्बे प्रतिशत है और किसी भी देशी मछली की महज दस या उससे भी कम! जाहिर है देशज मत्स्य संपदा एक घोर संकट की ओर बढ रही है -यह किसी राष्ट्रीय संकट से कम नहीं है -गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा भी जो दिया जा चुका है!

    वैसे गंगा में सकर माउथ कैट फिष जैसी मछलियां मिलने का मूल कारण घरों में सजावट के लिए पाली गई मछलियां हैं। चूंकि ये मछलियां दिखने में ंसुदर होती हैं साम सजावटी मछली के व्यापारी इन्हें अवैध रूप से पालते हैं। कई तालाब, खुली छोड दी गई खदानों व जोहड़ों में ऐसे मछलियों के दाने विकसित किए जाते हैं और फिर घरेलू एक्वैरियम टैंक तक आते हैं। बाढ़, तेज बरसात की दशा में ये मछलियां अपने दायरों से कूद कर नदी-जल धारा में मिल जाती हैं वहीं घरों में ये तेजी से बढ़ती हैं व कुछ ही दिनों में घरेलू एक्वैरियम टैंक इन्हें छोटा पड़ने लगता हैं। ऐसे में इन्हें नदी-तालाब में छोड़ दिया जाता हैं। थोड़ी दिनों में वे धीरे-धीरे पारिस्थितिक तंत्र घुसपैठ कर स्थानीय जैव विविधता और अर्थव्यवस्था को खत्म करना शुरू कर देती हैं। चिंता की बात यह है कि अभी तक किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में ऐसी आक्रामक सजावटी और व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछली प्रजातियों के अवैध पालन, प्रजनन और व्यापार पर कोई मजबूत नीति या कानून नहीं है।

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