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    प्रदूषण का कारण न बनें पर्व?

    By September 3, 2019 Hot issue No Comments6 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    भारत में पर्व केवल सामाजिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति के संरक्षण का संकल्प और कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर भी होते हैं। भारत के सभी त्योहार सूर्य, चंद्रमा, धरती, जल संसाधनों, पशु-पक्षी आदि की आराधना पर केंद्रित हैं। बीते कुछ वर्षो में भारतीय आध्यात्म को बाजारवाद की ऐसी नजर लगी कि अब पर्व पर्यावरण को दूषित करने का माध्यम बनते जा रहे हैं। हर साल सितंबर महीने के साथ ही बारिश के बादल अपने घरों को लौटने को तैयार हो जाते हैं। सुबह सूरज कुछ देर से दिखता है और जल्दी अंधेरा छाने लगता है। मौसम के इस बदलते

    मिजाज के साथ पर्व-त्योहारों का दौर भी शुरू हो जाता है। सनातन मान्यताओं की तरह प्रत्येक शुभ कार्य के पहले गजानन गणपति की आराधना अनिवार्य है और इसीलिए उत्सवों का प्रारंभ गणोश चतुर्थी से ही होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में अगस्त-2016 में अपील कर चुके हैं कि देव प्रतिमाएं प्लास्टर ऑफ पेरिस यानी पीओपी की नहीं बनाएं, मिट्टी की ही बनाएं, लेकिन देश के दूरस्थ अंचलों की छोड़ दें, राजधानी दिल्ली में भी इस पर अमल नहीं दिखता है। गणपति स्थापना तो प्रारंभ होता है, इसके बाद दुर्गा पूजा या नवरात्रि, दीपावली से ले कर होली तक एक के बाद एक आने वाले त्योहार भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतीक हैं। विडंबना है कि जिन त्योहरों के रीति रिवाज, खानपान कभी समाज और प्रकृति के अनुरूप हुआ करते थे, आज पर्व के मायने हैं पर्यावरण, समाज और संस्कृति, सभी का क्षरण।

    गत एक दशक के दौरान विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं, राज्यों के प्रदूषण बोर्ड आदि ने गंगा, यमुना, गोमती, चंबल जैसी नदियों की जल गुणवत्ता का गणपति या देवी प्रतिमा विसर्जन से पूर्व एवं पश्चात अध्ययन किया और पाया कि आस्था का यह ज्वार नदियों के जीवन के लिए खतरा बना हुआ है। ऐसी कई रिपोर्ट लाल बस्तों में बंधी पड़ी हैं और आस्था के मामले में दखल से अपना वोट-बैंक खिसकने के डर से शासन धरती के अस्तित्व को ही खतरे में डाल रहा है। महाराष्ट्र, उससे सटे गोवा, आंध्र प्रदेश, तेलगांना, छत्तीसगढ़, गुजरात, मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल में पारंपरिक रूप से मनाया जाने वाला गणोशोत्सव अब देश में हर गांव-कस्बे तक फैल गया है। दिल्ली में ही हजार से ज्यादा छोटी-बड़ी मूर्तियां स्थापित होती हैं। पारंपरिक तौर पर मूर्ति मिट्टी की बनती थी, जिसे प्राकृतिक रंगों, कपड़ों आदि से सजाया जाता था। आज प्रतिमाएं प्लास्टर ऑफ पेरिस से बन रही हैं, जिन्हें रासायनिक रंगों से पोता जाता है। कुछ राज्य सरकारों ने प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों को जब्त करने की चेतावनी भी दी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और पूरा बाजार रासायनिक रंगों से पुती प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमाओं से पटा हुआ है।

    गणोशोत्सव का समापन होता ही है कि नवरात्रि में दुर्गा पूजा शुरू हो जाती है। यह पर्व भी लगभग पूरे भारत में मनाया जाने लगा है। हर गांव-कस्बे में एक से अधिक स्थानों पर सार्वजनिक पूजा पंडाल बनने लगे हैं। बीच में विश्वकर्मा पूजा भी आ जाती है। एक अनुमान है कि हर साल देश में इन तीन महीनों के दौरान कई लाख प्रतिमाएं बनती हैं और इनमें से 90 फीसद प्लास्टर ऑफ पेरिस की होती हैं। इस तरह देश के ताल-तलैया, नदियों-समुद्र में नब्बे दिनों में कई सौ टन प्लास्टर ऑफ पेरिस, रासायनिक रंग, पूजा सामग्री मिल जाती हैं। पीओपी ऐसा पदार्थ है जो कभी समाप्त नहीं होता है। चूंकि ज्यादातर मूर्तियां पानी में न घुलने वाले प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी होती हैं, जिन्हें विषैले एवं पानी में न घुलने वाले रंगों में रंगा जाता है, इसलिए हर साल इन मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी में ऑक्सीजन की मात्र तेजी से घट जाती है जो जलीय जीवों के लिए जानलेवा साबित होती है। कुछ वर्ष पहले मुंबई से वह विचलित करने वाला समाचार मिला था जब मूर्तियों के धूमधाम से विसर्जन के बाद लाखों की तादाद में जुहू किनारे मरी मछलियां पाई गई थीं।

    पहले शहरों में कुछ ही स्थानों पर सार्वजनिक पंडाल में विशाल प्रतिमाएं रखी जाती थीं, लेकिन अब अंदाजा है कि अकेले मुंबई में कोई डेढ़ लाख गणपति प्रतिमाएं हर साल समुद्र में विसर्जित की जाती हैं। इसी तरह से कोलकाता की हुबली नदी में ही 15000 से अधिक बड़ी दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। अनुमान है कि विसर्जित होने वाली प्रतिमाओं में से अधिकांश 15 से 50 फुट ऊंची होती हैं। बंगाल में तो वसंत पंचमी के अवसर पर सरस्वती पूजा के लिए कोई एक करोड़ प्रतिमाएं स्थापित करने और उनको विसर्जित करने का भी रिवाज है। चूंकि ये पर्व बरसात समाप्त होते ही आ जाते हैं, जुलाई महीने में मछलियों के भी अंडे एवं बच्चों का मौसम होता है। ऐसे में दुर्गा प्रतिमाओं का सिंदूर, सिंथेटिक रंग आदि पानी में घुलकर उसमें निवास करने वाले जलचरों को भी जहरीला करते हैं। बाद में ऐसी ही जहरीली मछलियां खाने पर कई गंभीर रोग इंसान के शरीर में घर कर जाते हैं। इसके साथ ही ये धीरे-धीरे भोजन श्रृंखला का हिस्सा बन अनेक बीमारियों का भी कारण बनते हैं।

    सवाल खड़ा होता है कि तो क्या पर्व-त्योहारों का विस्तार गलत है? इन्हें मनाना बंद कर देना चाहिए? एक तो हमें प्रत्येक त्योहर की मूल आत्मा को समझना होगा, जरूरी तो नहीं कि बड़ी प्रतिमा बनाने से ही भगवान ज्यादा खुश होंगे! क्या छोटी प्रतिमा बनाकर उसका विसर्जन जल-निधियों की जगह अन्य किसी तरीके से करके अपनी आस्था और परंपरा को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता? प्रतिमाओं को बनाने में पर्यावरण मित्र सामग्री का इस्तेमाल करने जैसे प्रयोग तो किए ही जा सकते हैं। पूजा सामग्री में प्लास्टिक का प्रयोग वर्जित करना, फूल-ज्वारे आदि को स्थानीय बगीचे में जमीन में दबाकर उसका खाद बनाना, चढ़ावे के फल, अन्य सामग्री को जरूरतमंदों में बांटना, बिजली की जगह मिट्टी के दीयों का प्रयोग ज्यादा करना, तेज ध्वनि बजाने से बचना जैसे साधारण से प्रयोग हंैं जो पर्वो से उत्पन्न प्रदूषण एवं उससे उपजने वाली बीमारियांे पर काफी हद तक रोक लगा सकते हैं।

    पर्व आपसी सौहार्द बढ़ाने, स्नेह एवं उमंग का संचार करने और बदलते मौसम में स्फूर्ति के संचार के वाहक होते हैं। आज इन्हें अपने मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखने की चुनौती है

    पंकज चतुर्वेदी, पर्यावरण मामलों के जानकार

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