हम सभी की अधिकतर यह शिकायत रहती है कि हम सोचना तो अच्छा चाहते हैं पर पता नहीं बुरे विचार, हीन विचार क्यों आ जाते हैं, ना चाहते हुए भी भीतर क्यों प्रवेश हो जाते हैं? आत्मा मालिक की तीन शक्तियों में से एक शक्ति है मन। अतः इसे मालिक के वश में तो रहना ही चाहिए। जैसे हम अपनी स्थूल इन्द्रियों को वश में कर सकते हैं, आंखों को मर्जी से खोल-बन्द कर सकते हैं, हाथों को स्वेच्छा से स्थिर या कार्य में नियोजित कर सकते हैं, ऐसे ही मन भी आत्मा की एक सूक्ष्म इन्द्रिय है।
इसे भी अपनी जरूरत अनुसार कहीं लगा या हटा सकते हैं। इसके विचारों की दिशा को बदल सकते हैं, गति को धीमा कर सकते हैं। यही जीवन जीने की कला है। यदि यह कला नहीं सीखी तो बाकी का सीखा हुआ सब कुछ मिलकर भी जीवन को आनन्दमय नहीं बना सकेगा। जिस आत्मा का अपना मन कहना न माने, दुनिया में उसका कहना कोई नहीं मानेगा। जिस दिन मन मुठ्ठी में हो जाएगा, दुनिया मुठ्ठी में आ जाएगी।

हमारे विचार के बल से हमारा शरीर चल रहा है। सुबह से शाम तक शरीर के अन्दर भी और शरीर के बाहर भी सैकड़ों क्रियाएं चलती हैं। मन ने विचार दिया, उठो और शरीर ने अनुकरण किया। मन ने विचार दिया, सोओ, शरीर ने उसका भी अनुकरण किया। सारा जीवन ही विचारों से निर्मित है। कइयों को विचार आता है कि अमुक ने मुझे आगे बढ़ने में, जीवन में कुछ कर दिखाने में सहयोग नहीं दिया, परन्तु इस दुनिया में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि जिनको बाहरी जगत में सब कुछ सुलभ था, परन्तु अन्तर्जगत अर्थात मन के विचार कमजोर होने के कारण सुलभ को दुर्लभ बना बैठे।
अतः हमने जीवन में जो पाया, वो सशक्त विचारों के बल से और जो खोया वो अशक्त विचारों के कारण। कोई व्यक्ति हमें न कुछ दे सकता है और न ही हमसे कुछ छीन सकता है। हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं। जब विचार ही हमारे भाग्य निर्माता हैं तो वे कैसे होने चाहिए? यह हमें ही निर्धारित करना है। हम जीवन की बाकी चीजों को आकार देने की बजाए क्यों न सबसे पहले अपने विचारों को आकार दें। इस सूक्ष्म कार्य को सम्पन्न करने वाला विषय है आध्यात्मिक ज्ञान।
मान लीजिए, हमारे घर में साॅप या बिच्छू घुस आए तो क्या हम हाथ पर हाथ रखे बैठे रहेंगे, कदापि नहीं। या तो घर से हम निकलेंगे या उन्हें निकालेंगे, उनके साथ नहीं रहेंगे, परन्तु जो व्यर्थ और विकारी विचार हैं वे तो इनसे भी ज्यादा जहरीले हैं, फिर हम उनके साथ कैसे जी रहे हैं, क्या हम उनसे भयभीत नहीं होते? उन्हें निकालने के लिए इतने तत्पर क्यों नहीं होते? हमारा बहाना होता है कि व्यर्थ, विकारी, पुराने, बासी विचार अपने आप आते हैं, हमारे ना चाहते हुए भी आ जाते हैं।
ये जहरीले प्राणी भी तो बिना बुलाए आए थे, फिर भी पुरूषार्थ कर इन्हें निकाला ना। इसी प्रकार, जहरीले विचारों को भी भगाने का पुरूषार्थ कीजिए। इसके लिए आध्यात्मिक ज्ञान का खजाना अपने अंदर भरिये। जैसे स्वच्छ जल के नल के नीचे रखते ही बाल्टी का पुराना गंदा जल अपने आप निकल जाता है, उसी प्रकार ईश्वरीय ज्ञान धारण करने से व्यर्थ, विकारी विचार स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

ज्ञान-धन के अभाव में ईष्र्या, घृणा, क्रोध, परचिंतन, मोह, लोभ, अहंकार को ही हमने अपना धन-दौलत बना दिया है, जैसे कि छोटा नादान बच्चा पोटली में कंकर-पत्थर इकट्ठे कर लेता है। उसकी माॅ कहती है, बेटा, फैंक दे, तो रोता है। फिर माॅ कहती है, इनके बदले मैं तुझे संुदर खिलौना दूंगी, तो कई बार मान जाता है, कई बार नहीं भी मानता। इसी प्रकार भगवान भी हमें कहते हैं, बेटा, इस ईष्र्या, द्वेष…की पोटली के बदले मैं तुमको सुख की नींद दूंगा, निरोगी काया और लम्बी आयु दूंगा, सुख-समृद्धि से भरपूर कर दूंगा, मानव से देव बना दूंगा, ये मुझे समर्पित कर दे। तो हमें केवल विनिमय (एक्सचेंज) करना है। बुरा देकर अच्छा पाना है।
एक शरीर में अंग तो अनेक होते हैं पर मन तो एक ही है। इन अंगों में से किसी अंग में कभी कोई बीमारी लग जाती होगी, परन्तु मन का रोगी तो आज बच्चा-बच्चा हो गया है। तनाव मन में, अवसाद मन में, चिन्ता मन में, दुःख मन में, कड़वाहट मन में, घृणा, ईष्र्या, क्रोध मन में…इतनी चीजें भरी हैं मन में, तो कण जितना मन, मण जितना होगा कि नहीं? हम शरीर के सभी अंगों को जानते हैं, संवारते हैं, श्रृंगारते हैं, परन्तु दर्द भरे मन की न खबर, न जानकारी। बिना जानकारी वाली चीज (मन) को संवारें कैसे? संभालें कैसे? डाॅक्टर के पास जाते हैं तो वो भी मन के बजाए शरीर की जाॅच करके दिलासा दे देता है कि आप बिल्कुल ठीक हैं, शरीर के सभी अवयव स्वस्थ हैं, उसने भी मन को नहीं मापा। मन को मापने का कोई यंत्र उसके पास है ही नहीं। बीमार साॅफ्टवेयर है और वह परिणाम हार्डवेयर के दिखा रहा है, दर्द से मुक्ति मिले कैसे?
फिर इस दर्द को लेकर मंदिर में जाते हैं और हाथ जोड़कर कहते हैं, भगवान! मन बड़ा अशान्त है, नींद नहीं आती, शान्ति दो। भगवान के सामने हाथ जुड़े हुए हैं, पर दर्द तो मन में है, मन है कहां? उसे भगवान के आगे किया क्या? नहीं। हाथ, शरीर, आंखें सब भगवान के सामने हैं, सिर्फ मन गायब है। भगवान पूछते हैं, दर्द वाली चीज को सामने लाओ, पर वह तो मंदिर में आया ही नहीं।
विचार कीजिए, बिजली कैसे आती है? जब पावर हाउस वाले तार के साथ हम अपने बल्ब का तार जोड़ते हैं तब बिना बोले बिजली आ जाती है। हम तारों को जोड़ें नहीं और हाथों को जोड़कर खड़े रहें कि लाइट हाउस बिजली दो, बिजली दो, आ जाएगी क्या? नहीं ना। नहीं ना। इसी प्रकार हम जीवन भर हाथ जोड़ते रहे, पर मन जोड़ा क्या? भगवान के साथ मन जोड़ा नहीं, शान्ति के सागर से कनेक्शन जुड़ा नहीं, तो शान्ति कैसे मिले? स्थाई शान्ति न घर में मिली, न मंदिर में, न डाॅक्टर के पास, क्योंकि बीज में पानी डाले बिना पत्तों को ही सींचते रहे। बीज है मन, उसे शान्ति से सींचना है, उसे मनमनाभव करना है, यही गीता के भगवान का आदेश है।








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