बाढ़ से फिर तबाही: लोग घर-बार छोड़ने पर मजबूर

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बाढ़ का प्रकोप जारी है मरने वालों कि संख्या में इजाफा बाढ़ रहा है बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ ने भीषण तबाही मचाई है। इस प्राकृतिक आपदा के चलते करीब 44 लोगों की मौत की खबर है, जबकि 75 लाख से भी ज्यादा लोग बुरी तरह पीड़ित हैं। बिहार और असम में बाढ़ का कहर सबसे ज्यादा है। जहां असम के 33 में से 30 जिलों के करीब 43 लाख लोगों का जनजीवन संकट में है तो वहीं बाढ़ की विभीषिका से हर साल अपना काफी कुछ खोने वाले बिहार की भी हालत दयनीय बनी हुई है। राज्य के 12 जिलों में 22 लाख से ज्यादा लोग घर-बार छोड़कर अन्यत्र जीवन-मरण से जूझ रहे हैं।

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आपदा राहत विभाग ने 24 लोगों के मरने की पुष्टि की है मगर जिस तरह के हालात बिहार में हैं, मरने वालों की तादाद ज्यादा होने की आशंका है। स्वाभाविक तौर पर बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है और इसे रोका नहीं जा सकता, मगर हर बार यह राज्य देश भर में सबसे ज्यादा इसकी मार झेलता है। पिछले बरस भी जब बाढ़ ने भयानक तबाही मचाई थी, तो राज्य के मुखिया ने हरसंभव मदद के साथ अगले साल पहले से जरूरी मदद का आश्वासन भी जनता को दिया था। हालांकि ऐसा होता नहीं है। बिहार के संदर्भ में देखें तो बिल्कुल भी नहीं। अभी भी पिछली आपदा में घर-बार, फसल, मवेशी आदि खो चुके सैकड़ों लोग मुआवजे के इंतजार में हैं।

सरकार भले यह दावा करती रहे कि हमने पीड़ितों के लिए पहले से इंतजाम कर रखे थे और इस तैयारी की वजह से ज्यादा जान-माल का नुकसान नहीं हुआ मगर हकीकत इससे उलट है वरना फुलप्रूफ व्यवस्था में 24 मौतें कैसे हो जातीं? इतनी ज्यादा बर्बादी कैसे होती? खैर, बिहार के संदर्भ में बाढ़ का प्रकोप झेलना यहां के बाशिंदों की नियति बन चुकी है।

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सरकार बस हवाई सव्रेक्षण और हवा-हवाई आश्वासनों के सहारे अपने को जनता का खेवनहार समझने लगती है। वैसे भी सरकार की इस दलील से कौन इत्तेफाक रखेगा कि नेपाल ने सामान्य से आठ गुना पानी छोड़ा; इसी वजह से बिहार में ऐसी त्रासदी हुई।

नेपाल और उत्तर प्रदेश पर पानी छोड़ने का ठीकरा फोड़ने से पहले बिहार सरकार को अपनी तैयारियों को सुदृढ़ करना चाहिए था। ठीक वैसे ही जैसे ओडिशा ने फैनी चक्रवात से पहले किया था। अब भी वक्त है। सबसे पहले सरकार जान-माल के नुकसान का ईमानदारी से आकलन करे और जल्द-से-जल्द पुनर्वास व राहत के उपाय अमल में लाए। 

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