बिहार गेम प्लान के हीरो हैं ये छोटे मोदी! 

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 अजय शर्मा 

राजनीति के बहुत से रंग है। एक रंग अभी देश ने बिहार में देखा। एक गठबंधन टूटा और दूसरा बन गया। एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन गलबैयाँ डालकर सत्ता के साथी बन गए। राजद का हाथ झटकने और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने वाले नीतीश कुमार को भाजपा ने थाम लिया। लालू यादव के घनघोर विरोधी सुशील कुमार मोदी को सत्ता में साझेदार बनने का मिल गया। ये वही सुशील कुमार मोदी है जिन्होंने लम्बे अरसे से लालू फैमिली के खिलाफ माहौल बना रखा था।

  इतना बड़ा पॉलिटिकल गेम रचने वाले सुशील कुमार मोदी ही थे। मोदी ही थे, जिन्होंने लालू और तेजस्वी की नाक में दम कर रखा था। आज लालू फैमिली पर जांच, घोटाला, सीबीआई, ईडी सब कुछ हावी है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सुशील मोदी ही थे, जिनके कारण महागठबंधन टूटा। इसका पार्टी ने ईनाम भी दिया और बिहार का उप-मुख्यमंत्री बना दिया। दिलचस्प बात ये है कि नीतीश कुमार और सुशील मोदी पुराने दोस्त हैं। राजनीति के बारे  जाता  यहाँ कोई किसी का दुश्मन नहीं होता! यही कारण है कि अब पुराने दोस्त फिर से एक हो गए। राजनीतिक फायदे के लिए दोनों भले ही कुछ वक़्त के लिए अलग हुए, लेकिन अब फिर साथ हैं। लेकिन, ये दोस्ती कब तक चलती है, इस बात का भी दावा नहीं किया जा सकता। हो सकता है फिर किसी की अंतरात्मा जाग जाए और फिर अलगाव आ जाए।

  दिलचस्प बात ये है कि लालू यादव एक समय सुशील मोदी के बॉस हुआ करते थे। वक्त था सुशील मोदी के छात्र जीवन का। लालू पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष थे और इसी विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे सुशील मोदी 1973 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव में महासचिव पद का चुनाव जीता था। इस एंगल से लालू सुशील मोदी के बॉस हुए ना? सुशील मोदी बिहार छात्र संघर्ष समिति के भी सदस्य बने!  यह वही संगठन है जिसने 1974 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार के प्रसिद्ध छात्र आंदोलन को पूरे देश में फैलाया। 1975 में आपालकाल के दौरान सुशील मोदी मीसा कानून के तहत 5 बार गिरफ्तार किए गए। उन्हें 24 महीने जेल में रहना पड़ा था।

   छात्र जीवन के बाद सुशील का राजनीति और आंदोलन से मोह भंग हो गया था। उन्होंने 1987 में बैंक से 70 हजार रुपए का लोन लिया और एक कम्प्यूटर इंस्टीट्यूट खोला। यही वक्त था, जब सुशील मोदी ने तकनीक और कम्प्यूटर के लिए अपने अंदर छिपी दीवानगी को पहचाना। आंदोलनों और बगावती मिजाज के आदी सुशील मोदी को इंस्टीट्यूट चलाने में मन नहीं लगा। वे फिर से राजनीति में आ गए। कई उतार-चढाव के बाद आज फिर उनकी राजनीति उभार पर है।

अजय शर्मा के ब्लॉग से साभार

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