कृष्ण जन्मआष्ट्मी पर विशेष
आज हम कलयुग में जी रहे हैं युगों को चार भागों में विभक्त किया गया है। यह बात लगभग हम सभी लोगों को पता है, जैसे प्रथम- सत्य युग दूसरा- द्वापर युग तीसरा- त्रेता युग और चौथा – कलि युग।
वेद पुराणों के मातानुसार इन चारों युगों में से सबसे दीर्ध समय वाला कलयुग है, आज हम सभी उसी युग यानिकि कलयुग मे अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। प्रत्येक युग अपनी एक विशेषता और गुण लिये हुये है, युगों के उन्ही विशेषताओं और गुणों से अलग हट कर जब पृथ्वी पर निकृष्ट भाव, आचार विचार, व्यभिचार एवं संसारिक क्रिया कर्मो मे होने वाले विद्रूपता यहां तक कि ऋतुओं में बदलाव होने से प्रभावित प्रकृति में हुये बदलावों के कारण उत्पन्न हुई सामाजिक विकृतियों से जब पृथ्वी के लोग त्राहि- त्राहि कर उठते हैं अर्थात इस धरा की सभी चीजें अपनी गुण-धर्म के विपरीत क्रियाओं का अभिव्यक्ति करने लगते हैं

उस समय पृथ्वी पर एक “सुपर मैन” या आज के बच्चों के “ही मैन” जैसे सर्व गुण संम्पन्न व्यक्तित्व जन्म लेकर पृथ्वी में स्थित सभी प्राणियों से लेकर प्रकृति तक को इस विद्रूप परीस्थितियों से मुक्ति दिलातें है। ठीक ऐसी ही अवस्था द्वापर युग में उत्पन्न होने पर पृथ्वी पर कृष्ण जन्म लेकर अवतरित हुये। जब हम सर्वशक्तिमान ईश्वर स्वरूप अवतरित हुये आराध्य कृष्ण की बात करते हैं, तो कृष्ण अपने बाल्यवस्था काल से यौवन काल और उनके अंतरध्यान होने तक एक के बाद एक अनेको लीलायें कर जनमानस को लुभा कर अपनी ओर आकृष्ट करते रहे।

कृष्ण का जन्म से लेकर उनके दूसरी मां द्वारा किये गये उनके लालन-पालन के दरमियां उनके द्वारा किये गये अलौकिक क्रिया-कलापों से संबंधित अनेको तरह की गाथाएँ कृष्ण पुराण गद्य एवं पद्य के रूप में हमारे समाज मे आज तक विद्यमान हैं और हम आज कलयुग मे भी उनके क्रिया कलापों और लीलाओं को याद कर उनके जन्म दिवस को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मना कर उनके प्रति आभर व्यक्त करने के लिये द्वापर युग से आज तक मानते चले आ रहे हैं।
- प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती







