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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    आस्था के अनुरूप अभिव्यक्ति 

    By December 13, 2018 Hot issue 2 Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    अयोध्या में प्रभु राम का अवतार हिंदुओं की आस्था मात्र में नहीं बल्कि यह प्रमाणित तथ्य भी है। इस सन्दर्भ में साहित्यिक, पुरातत्व संबन्धी प्रमाणों की कमी नहीं है। इतना ही नहीं सम्पूर्ण राम वन गमन पथ पर उनकी तर्कसंगत अनुभूति की जा सकती है। यदि उदारता से चिंतन किया जाता तो जन्मभूमि पर सहज ही मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सकता था। आज भी हिन्दू समाज सविधान के दायरे में रहकर मंदिर निर्माण की मांग कर रहा है। इसी के अनुरूप विश्व हिंदू परिषद ने जनसभा या रैली नहीं बल्कि धर्मसभा का आयोजन किया। अयोध्या सहित दो सौ से अधिक स्थानों के बाद धर्मसभा का आयोजन नई दिल्ली में हुआ। जिसमें लाखो लोग शामिल हुए।
    धर्मसभा की अध्यक्षता करते हुए आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि राम राष्ट्र चेतना व जीवन का मंत्र हैं। साध्वी ऋतंभरा ने केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि रामलला की बात कहने वाले ठाठ में आ गए, जबकि रामलला टाट में हैं।विहिप के अध्यक्ष विष्णु सदाशिव कोकजे ने कहा कि राम मंदिर चुनाव का नहीं, आत्मसम्मान का मुद्दा है। विहिप बताना चाहती है कि कुछ लोगों के लिए राम मंदिर निर्माण भले ही प्राथमिकता में न हो लेकिन देश की प्राथमिकता है।
    यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट  में है। सुन्नी वक्फ़ के वकील के तौर पर कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि राम जन्मभूमि का मामला मई दो हजार उन्नीस तक टाल दिया दिया जाए, जिससे भाजपा इसका लाभ न उठा सके। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश भय्याजी जोशी ने धर्मसभा की मूल भावना को प्रकट किया। उन्होंने कहा कि सभी लोगों  की भावनाओं को पूज्य संतों ने शब्द रूप दिया है। समय-समय पर राम भक्तों ने अपनी जागृति का परिचय विश्व को दिया है। फिर  पुनर्जागरण का सत्र प्रारम्भ हुआ है। आज की युवा पीढ़ी के अन्तःकरण में इसके प्रति आस्था, पीड़ा और  अपेक्षाएं हैं। धर्मसभा की विशाल संख्या इसका प्रमाण है। यह यात्रा रामजन्म भूमि पर भव्य मंदिर निर्माण तक चलती रहेगी।
    भारतीय संस्कृति सद्भावना और शांति से प्रेरित रही है। हमारा किसी के साथ संघर्ष नहीं है। भारत के शत्रु और विदेश से आये आक्रांताओं की बात अलग है। उनके साथ संघर्ष धर्म की स्थापना के लिए अपरिहार्य था। इस देश में रहने वाले विभिन्न मजहब, पन्थ के साथ भी हमारा कोई संघर्ष नहीं है। इसलिए इस विषय का शांति  और सद्भावना से समाधान चाहते है। सभी सम्बंधित सभी पक्ष  सकारात्मक पहल करें तो उचित परिणाम दिखाई देगा। दो हजार दस में उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने जन्म स्थान को स्वीकार कर लिया, लेकिन निर्णय में कुछ कमी छोड़ दी होगी तो इसलिए  सर्वोच्च न्यायालय में जाना पड़ा।  सर्वोच्च न्यायालय से अपेक्षा करते हैं कि वो छोटी सी कमी को दूर करे। आक्रांताओं की निशानियों को कोई भी स्वाभिमानी समाज स्वीकार नहीं करता है। अनेक महापुरुषों ने रामराज्य का स्वप्न देखा है। राम राज्य में न्याय , सुरक्षा ,शांति   विकास और रामराज्य में आस्थाओं का सम्मान है।
     राम राज्य कोई धर्म राज्य नहीं होता, किसी सम्प्रदाय का राज्य नहीं होता, रामराज्य तो सुखशांति को बहाल करने वाला राज्य होता है।  महात्मा गांधी ने भी इसी रामराज्य की कल्पना की थी। जिस देश में न्याय व्यवस्था और न्याय के प्रति अविश्वास का भाव जगता है उस देश का उत्थान होना असम्भव है।  सत्ता को चाहिए कि  हिन्दू समाज की  भावनाओं का सम्मान करे। इसके लिए अपेक्षित  कदम उठाये। जनभावनाओं का अपमान करते हुए यह देश कभी स्वाभिमान से खड़ा नहीं हो सकता। इस देश की सब प्रकार
    की व्यवस्थाओं को इसके बारे में सोचने की आवश्यकता है।
     लोकतंत्र में सत्ता सर्वोपरि नहीं, परन्तु महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली होती है। सत्ता के केन्द्र में बैठे लोगों को समझने की यह आवश्यकता है। कभी तो लगता है कि उन्होंने भी अपना एक संकल्प घोषित किया है कि अयोध्या में जन्मभूमि पर ही राम मंदिर बनेगा।  यह संकल्प पूर्ति का अवसर अब आ गया है।  बिना किसी किसी संकोच के अपने संकल्प को पूर्ति करने की दिशा में उन्हें बढ़ना चाहिए। संविधान का मार्ग है, और लोकतंत्र में संसद का भी अपना अधिकार है। संसद का दायित्व भी है, इसलिए यहां के पूज्य संतों के द्वारा जो व्यक्त किया गया, करोड़ों राम भक्त जो चाहते हैं तो कानून बनाने की दिशा में वर्तमान सरकार को पहल करनी चाहिए।  इसका कोई अन्य विकल्प अभी ध्यान में नहीं आता है।
    तीन दशक पहले कारसेवकों शक्ति, सामर्थ्य का परिचय दिया था। आक्रांताओं की निशानी को मिटा दिया। लेकिन काम अधूरा हुआ। ढांचा तो ध्वस्त हुआ।  उसकी निशानी कुछ नहीं बची। लेकिन भगवान राम तो वहां पर एक अस्थाई निवास में रह रहे हैं। जब जब कोई भी वहां पर दर्शन करने के लिए जाता है, पीड़ा का अनुभव करता है, एक वेदना का अनुभव करता है कि क्या हमारे आराध्य सालों साल इसी तरह के अस्थाई भवन में रहेंगे। अब निर्माण की प्रक्रिया शुरु होने की आवश्यकता है।  इस मंदिर का निर्माण भविष्य में आने वाले रामराज्य की नींव बनेगा।  विश्व को  मानवता का संदेश मिलेगा। भगवान राम का जीवन  केवल भारत के लिए नहीं,  सारी मानव जाति के लिए एक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।  इसको संकुचित साम्प्रदायिक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए।  यह किसी भी एक स्वाभिमानी देश के सम्मान का प्रतीक है। स्वतंत्र देश को अपने सारे स्वाभिमान स्थापित करने का अधिकार है। और इसलिए उस पुनर्प्रतिष्ठा का यह कार्य प्रारम्भ होने वाला है।
    न्यायालय भी जनभावनाओं को समझकर उचित दिशा में कदम उठाएगा। वह जनभावनाओं का सम्मान करे।  हिन्दू के लिए न्यायोचित अधिकार है, उस अधिकार को सुरक्षित करें।
    स्पष्ट है कि धर्मसभा में हिन्दू आस्थाओं की अभिव्यक्ति हुई। इसमें किसी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष का भाव नहीं था। जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण से भारत में सौहार्द का नया अध्याय प्रारंभ होगा।

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    2 Comments

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