डॉ दिलीप अग्निहोत्री
बहुत दिनों के बाद कांग्रेस के आंगन में चुनावी शहनाई बजी है। विधानसभा चुनाव परिणाम अप्रत्याशित नहीं है। सभी प्रदेशों में मुख्यमंत्रियों की ही प्रतिष्ठा दांव पर थी, ऐसे में इसे सेमीफाइनल नहीं कहा जा सकता। फिर भी ये चुनाव कई सवाल छोड़ गए है। क्या कांग्रेस व अन्य विपक्षी अब ईवीएम पर हमला नहीं करेगा। कहा जा रहा था कि भाजपा के शासन में कृषि, व्यापार सब बर्बाद हो गया, इसके बाद भी उसे बहुत आसान जीत नहीं मिली। भाजपा का ग्राफ आरोपों केउ अनुरूप नहीं गिरा। मतलब कहीं से ऐसा नही लगा कि नोटबन्दी, जीएसटी ने सब चौपट कर दिया है।मध्यप्रदेश, राजस्थान में केवल बदलाव की चाहत थी, सरकार से कोई खास नाराजगी नहीं थी।
राजस्थान में वसुंधरा राजे के प्रति नाराजगी थी, यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति लोगों की शिकायत नहीं थी। इसकी अभिव्यक्ति भी सुनाई दे रही थी।
यदि भारतीय जनता पार्टी मुख्यमंत्री पद में बदलाव कर देती तो कांग्रेस के लिए रास्ता इतना आसान नहीं होता। भाजपा के सामने राज्यवर्धन सिंह राठौर बेहतर विकल्प हो सकते थे। कांग्रेस के सचिन पायलट के मुकाबले में उनका नाम लिया भी जा रहा था। लेकिन वसुंधरा की जिद के चलते परिवर्तन नहीं हो सका। फिर भी भाजपा मजबूत विपक्ष की भूमिका में रहेगी। वसुंधरा पर खास तबके से घिरे होने का आरोप था। नौकरशाहों को बचाने के लिए उन्होंने जो नियम बनाया था, उसे लेकर भी बहुत नाराजगी थी।
बताया जाता है कि मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के प्रति ज्यादा नाराजगी नहीं थी। व्यापम और पारिवारिक आरोपों के बाद भी शिवराज की विश्वसनियता पर ज्यादा असर नहीं पड़ा था। फिर भी पन्द्रह वर्ष के शासन के बाद लोग परिवर्तन चाहते थे। इसकी कोई खास वजह नहीं थी। उनके शासन में मध्यप्रदेश बीमारू छवि से बाहर निकला था। कृषि में भी सुधार हुआ था। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड हिस्से में भी शिवराज ने प्रभावी कदम उठाए थे। उन्होंने वर्षाजल की बर्बादी रोकने की व्यवस्था की, कम पानी की फसलों को प्रोत्साहन दिया। यूपीए सरकार में शिवराज चौहान की सरकार को निवेश और कृषि के विषय पर अवार्ड मिले थे।
छतीसगढ़ में रमनसिंह को लेकर अवश्य नाराजगी थी। शायद भाजपा इसका अनुमान नहीं लगा सकी।
मेघालय, तेलंगाना में कांग्रेस को निराश होना पड़ा। उसने यहाँ तेलगु देशम से समझौता किया था। अब चंद्रशेखर राव के राजग में आने की संभावना बढ़ी है। आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ेगा।
कांग्रेस को कई वर्षों बाद खुशी नसीब हुई। लेकिन भाजपा पर जिस तरह के आरोप लगाए जा रहे थे, वह सच्चाई के अनुरूप नहीं थे। सबसे बड़ा झूठ तो ईवीएम को लेकर चलाया गया था। कांग्रेस अपनी पराजय के लिए ईवीएम को दोषी ठहरा रही थी। आरोपों का यह दौर भी अपने में बेजोड़ और दिलचस्प था। जब भाजपा कहीं जीत हासिल करती तो कहा जाता था कि ईवीएम में गड़बड़ी की गई है। बटन चाहे जो दबाओ कमल पर ही वित्त पड़ता है। यदि कहीं विपक्ष को जीत मिलती तो ये एक दूसरे की पीठ थपथपाते थे। यह भी बता देते थे कि अब भाजपा का ग्राफ गिर रहा है। यह क्रम कई बार चला।

अब जो चुनाव परिणाम आये है, क्या उसके लिए भी ईवीएम को दोषी बताया जाएगा। जाहिर है कि ऐसा नहीं होगा। कर्नाटक में दूसरे नम्बर की पार्टी बनने के बाद भी कांग्रेस खुश थी। क्यों कि उसने सबसे कम सीट हासिल करने वाली पार्टी के नेतृत्व में सरकार बना ली थी।
विपक्षी पार्टियों के सामने दो विकल्प है। पहला यह कि वह इन चुनाव परिणामों को भी ईवीएम की गड़बड़ी घोषित करें, दूसरा यह कि अब तक लगाए जा रहे आरोपों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगे। क्योकि यह आरोप केवल सरकार या भाजपा पर नहीं था। यह सीधे संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग पर आरोप था। चुनाव आयोग ने इन पार्टियों को अपने आरोप साबित करने के लिए बुलाया भी था। लेकिन इनमें चुनाव आयोग की चुनौती स्वीकार करने का साहस ही नहीं था। ये सब भाग खड़े हुए। इसका मतलब है कि इनका मकसद केवल अपनी कमजोरी छुपाना था। इसके लिए इन्हें संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा गिराने में संकोच नहीं था।
इसके अलावा कांग्रेस का प्रचार था कि भाजपा के शासन में कृषि, किसान, व्यापार ,सभी कुछ बर्बाद हो गया। सभी मे बहुत नाराजगी है। लेकिन पांच में सबसे बड़े प्रदेश राजस्थान और मध्यप्रदेश में यह नहीं लगा कि सब क्षेत्र बर्बाद हो गए, भाजपा से बहुत नाराजगी थी, उसके खिलाफ हवा चल रही थी।

कांग्रेस को मामूली बढ़त ही मिली है। निश्चित ही देश में अनेक समस्याएं है। लेकिन ऐसा नहीं कि ये समस्याएं साढ़े चार वर्ष में ही पैदा हुई है। इसके लिए सबसे अधिक समय तक शासन करने वाली कांग्रेस ही सर्वाधिक दोषी है।
पन्द्रह लाख खाता में न मिलने से विपक्षी नेता बेहाल थे। लेकिन कहीं नहीं लगा कि मतदाता इसे अहमियत दे रहे थे। इसका मतलब है कि भारत का आमजन संतोषी है, धन के लिए झूठ फरेब नही करता। अपवाद छोड़ दें तो सभी नेताओं के कुनबे राजशी ठाठ से रहते है। फिर भी वह पन्द्रह लाख के लिए जीभ लपका रहे है। आमजन जनता है कि नरेंद्र मोदी का कथन गलत नहीं था। उनका कहना था कि विदेशों में इतना काला धन जमा है, वह आ जाये तो सबके खाते में पन्द्रह लाख तक जमा हो सकते है। यह धनराशि का अनुमान बताने का तरीका था। जिसे गरीब और मध्यमवर्ग समझ गया, राजशी अंदाज में रहने वाले नेता अनजान बने रहे। कैसी बिडंबना है कि पेरोल पर रिहा राहुल गांधी, लालू यादव , आदि अनेक नेताओं को पन्द्रह लाख रुपयों के लिए जमीन आसमान एक किये हैं।
कांग्रेस का अगला झूठ था कि नोटबन्दी, जीएसटी ने व्यापार चौपट कर दिया। लेकिन चुनाव परिणाम ऐसे किसी बर्बादी की इर इशारा नहीं कर रहे है। भाजपा के समर्थकों में खास कमी नहीं है। मुख्यमंत्रियों से नाराजगी के बाद भी उसने बड़ी संख्या में भाजपा को समर्थन दिया।
यदि अगस्ता वेस्टलैंड के आरोपी क्रिश्चियन मिशेल और विजय माल्या का प्रत्यर्पण चुनाव के पहले हो जाता तो कांग्रेस के हाँथ से बड़ा मुद्दा निकल जाता। अगस्ता वेस्टलैंड में कांग्रेस हाईकमान की भूमिका संदेह के घेरे में है। विजय माल्या और नीराव मोदी को नरेंद्र मोदी ने पैसा देकर विदेश भगा दिया। उन्होंने नोटबन्दी से लोगों का धन जमा कराया, वह धन माल्या, निराव को दे दिया। यह बचकाना और असत्य आरोप था। विजय माल्या के प्रत्यर्पण का लंदन कोर्ट ने आदेश कर दिया। अब निराव मोदी की बारी है। जबकि ये दोनों कांग्रेस के शासन में ही निर्मित हुए थे। अब इन्हीं मुद्दों से कांग्रेस की मुसीबत बढ़ने वाली है।







