डॉ दिलीप अग्निहोत्री
उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडल ने इलाहाबाद और फैजाबाद के नाम सुधार प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान की। अब इन्हें क्रमशः प्रयागराज और अयोध्या नाम से जाना जाएगा। यह कार्य जितनीं सहजता से हुआ, उससे सामाजिक सौहार्द की मिसाल कायम हुई है। समाज के सभी वर्गों ने इस बदलाव को स्वीकार किया। कहीं से विरोध के स्वर सुनाई नहीं दिए। ये बात अलग है कि कतिपय प्रगतिशील विद्वानों ने सोशल मीडिया के माध्यम से इसके प्रयास भी किये।उन्होंने इस सुधार को उर्दू नामों का विरोध करार दिया। वह तुलसी साहित्य में उल्लखित उर्दू शब्दों को गिनाने लगे। कुछ लोग फैजाबाद और उमराव जान के प्रति हमदर्दी का प्रदर्शन करने लगे। शायद इनको उम्मीद रही होगी कि वह इसे सरकार विरोधी सेक्युलर मुद्दा बना देंगे। यह भी कल्पना रही होगी कि इस पर भी किसी ऐक्शन कमेटी का गठन हो जाएगा। न्यायपालिका में अपील की गई, वहां इसे खारिज कर दिया गया। यह अच्छा हुआ कि समाज के किसी वर्ग ने इनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। इससे यह प्रमाणित हुआ कि प्रदेश और देश का माहौल बदला है। अयोध्या में प्रस्तावित विहिप की रैली को लेकर भी तनाव की स्थिति नहीं है। जनमानस अब संघर्ष नहीं समस्याओं का सौहार्दपूर्ण समाधान चाहता है।

वैसे नगरों के नामकरण, नाम परिवर्तन और पुनः नाम सुधार के उदाहरणों की कमी नहीं है। भारत में नगरों के नाम परिवर्तन से इतिहास भरा पड़ा है। विदेशी आक्रांताओं के शासन में जम कर यह कार्य हुआ। इस दौरान हजारों वर्षों से प्रचलित नामों को बदला गया। अनेक पौराणिक तीर्थों के निकट पूर्वनियोजित रणनीति के तहत महल और कुछ घरों की बस्ती बनाई गई। शासकों ने अपनी मर्जी से इसका नामकरण किया। इलाहाबाद और फैजाबाद इसी की मिसाल थे। इसमें उचित सुधार किया गया।
इलाहाबाद और फैजाबाद जिले के बाद अब मंडल का नाम भी बदलकर प्रयागराज और अयोध्या कर दिया गया है। लखनऊ में योगी कैबिनेट की मीटिंग में इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी गई है। इसी के साथ फैजाबाद जिले को अयोध्या किए जाने के प्रस्ताव को भी आधिकारिक रूप दे दिया गया है। योगी सरकार ने इलाहाबाद जिले का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया था। इसकी अधिसूचना जारी हो चुकी है। अब मंडल का नाम भी बदलकर प्रयागराज कर दिया गया है। छह नवंबर को छोटी दीपावली पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या करने की घोषणा की थी। इस पर कैबिनेट की आधिकारिक मुहर के बाद इसकी अधिसूचना भी जारी कर गई है। अब केंद्र सरकार को भी इस बदलाव के बारे में आधिकारिक तौर पर सूचित कर दिया गया है।

राज्यपाल राम नाईक के लिए भी यह सुखद अनुभूति का अवसर था। बम्बई का नाम मुम्बई उन्हीं के प्रयासों से संभव हुआ था। तब शायद देश का माहौल ऐसा नहीं था। इसलिए राम नाईक को कई वर्ष तक अभियान चलाना पड़ा था। मुंबई का नामकरण मुंबा देवी के नाम से किया गया था। इन्हीं के नाम से मुंबई गांव बसा था। व्याकरण के अनुसार अनुवाद करते समय नाम विशेष में परिवर्तन नहीं होता। लेकिन मुंबई पर इस नियम का पालन नहीं किया गया। मूल नाम मुंबई था। अंग्रेजों इसे बाॅम्बे कर दिया था। हिन्दी भाषिकों के कारण बम्बई हो गया। जबकि भारत का संविधान के हिन्दी संस्करण की मूल प्रति में बाॅम्बे नहीं मुंबई ही लिखा है। इस भूमिका में उन्होंने यह विषय सर्वप्रथम लोकसभा में दिनांक उनतीस दिसम्बर उन्नीस सौ नवासी को उठाया था।
लोकसभा अध्यक्ष रवि रे ने उनके पक्ष को सही मानते हुए हिन्दी में बम्बई के बदले मुंबई लिखने का निर्देश दिया। अंग्रेजी नाम बदलने के लिए राजस्व संहिता के अनुसार यह अधिकार राज्य सरकार को दिया गया है। उनकी पहल पर राज्य सरकार ने शहर का नाम अंग्रेजी में भी मुंबई करने का निर्णय दिनांक अठ्ठाइस जुलाई उन्नीस सौ चौरानबे को लिया। इसके बाद तत्कालीन केंद्र सरकार को भी नाम परिवर्तन का आग्रह किया। वें स्वयं भी केंद्र सरकार से चर्चा करते रहे। अंततः केंद्र सरकार ने भी दिनांक पन्द्रह दिसम्बर, उन्नीस सौ पंचानबे को बाॅम्बे का नाम अंग्रेजी में मुंबई करने का निर्णय किया। उस समय पर केंद्र में कॉग्रेस की सरकार थी और श्री पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री, और गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण थे।
बाद में अन्य प्रदेशों में भी इसका अनुकरण किया गया। जिसके कारण मद्रास का चेन्नई, कलकत्ता का कोलकाता, बंगलौर का बंगलुरु और त्रिवेंद्रम का थिरुअनंतपुरम नाम परिवर्तन किया गया। आज भी ऐसे अनेक नगर हैं, जिनके पौराणिक नाम दासता के दौर में बदले गए थे। इनके भी नाम में संशोधन की मांग उठती रही है। इनका भी सौहार्दपूर्ण ढंग से समाधान निकालने का प्रयास होना चाहिए।







