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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    सांस्कृतिक संमृद्धि का सार्थक साहित्य

    By November 28, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    भारत की सांस्कृतिक विरासत सर्वाधिक प्राचीन और समृद्ध है। यहां के ऋषियों, मनीषियों, विद्वानों ने सतत जिज्ञासा से प्रेरित साहित्य की रचना की। विश्व में जब सभ्यता का प्रादुर्भाव भी नहीं हुआ था, हमारे यहां श्रेष्ठ साहित्य की रचना हो चुकी थी। संस्कृत सवार्धिक वैज्ञानिक भाषा मानी जाती थी। ज्ञान की इस धरोहर ने भारत को विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित किया था। धर्म की अवधारणा यहां की विशिष्टता रही है। इसी लिए हिंदुत्व को जीवन पद्धति माना गया। पंथ या उपासना पद्धति को अलग माना गया।
    भारत के सांस्कृतिक मूल्य मानवता, समरसता और विश्व कल्याण की भावना पर आधारित है। परिवर्तन के नियम को स्वीकार किया गया। समय के साथ अनेक बातों में बदलाव हुआ। संस्कृत, पाली, प्राकृत की जगह अब हिंदी में साहित्य रचना हो रही है। लेकिन कुछ तथ्य शाश्वत होते है। इसी पर सांस्कृतिक स्वरूप आधारित होता है। हमारी संस्कृति भौगोलिक व सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप है। इस को समझने की आवश्यकता है। पाश्चात्य सभ्यता संस्कृति हमारे अनुकूल नहीं है। यह उपभोगवादी है, इसी के आधार पर किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता निर्धारित होती है, हमारे यहां न्यूनतम उपभोग या त्यागपूर्ण उपभोग का सिद्धांत है। केवल इसी आधार पर जीवन शैली, संस्कृति बदल गई, रिश्तों का महत्व बदल गया। लेकिन पश्चिमी सभ्यता हमारे समाज को प्रभावित कर रही है।
    ऐसे में साहित्यकारों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उन्हें भारतीय संस्कृति के अनुरूप साहित्य की रचना करनी चाहिए। इसके प्रति आत्मगौरव का भाव जागृत करना चाहिए। लखनऊ में शब्द रंग साहित्य महोसत्व के समापन पर विद्यर्थियो को यही सन्देश दिया गया। तीन दिवसीय साहित्य समारोह के अंतिम दिन साहित्य आज-कल पर परिचर्चा की गई।  समापन समारोह में उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा ने मुख्य अथिति के रूप में विचार व्यक्त किये।
    साहित्य सतत संभावनाओं की बात करता है। वर्तमान साहित्य में राष्ट्रीयता के चरित्र को गायब कर दिया गया है। भारत व पश्चिम के देशों की मनुष्यता की अवधारणा भिन्न है। पश्चिम देशों में मनुष्य श्रेष्ठ है तो सभी का उपभोग कर सकता है। लेकिन भारत का मनुष्य इसलिए श्रेष्ठतम है कि उसपर सबके संरक्षण का दायित्व है। साहित्य को केवल सामाजिक सरोकार तक सीमित करना उसके वृहत्तर स्वरुप को नष्ट करता है। साहित्य कालजयी तब होगा, जब उसका सरोकार सांस्कृतिक मूल्यों से होगा। दोहरे मापदंड नहीं चल सकते। लेकिन असहिष्णुता पर हंगामा करने वाले साहित्यकार  आपातकाल पर चुप चुप रहते हैं।
      सत्य के साथ रहने वाला ही भयमुक्त होता है।  सेक्युलर शब्द भारतीय  विचारधारा के अनुरूप नहीं है। इसका प्रादुर्भाव लौकिक व पारलौकिक विषयों के चर्च व राजसत्ता के बीच हुए कार्य विभाजन से हुआ था। हमारे यहां धर्म को आचरण में शामिल किया गया। हिदू विस्थापितों के दर्द की चर्चा साम्प्रदायिक हो गई, वर्ग विशेष से जुड़ी समस्या सेक्युलर हो गई। जन और कविता की दूरी जनवाद में कम होनी चाहिए थी, लेकिन  बढ़ गयी है। सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित करने की आवश्यकता है। लेकिन बाजार के हिसाब से भी लिखने वालों की संख्या कम नहीं है। ये भारतीय संस्कृति का माखौल बनाते है। विदेशों में यह विषय आनन्द के माने जाते है। इस प्रकार देश की प्रतिष्ठा के प्रतिकूल लिखकर धन कमाने वाले भी सक्रिय है। ये कश्मीर के अलगाव पर लिखते है। आतंकी व नक्सली हिंसा पर उदारता प्रदर्शित करते है।
    विकास की भी सीमा होनी चाहिए। आपाधापी ऐसी भी नहीं होनी चाहिए जो मानवीय गुणों पर ही कुठाराघात करने लगे।  साहित्य की दुनिया क तीन प्रमुख अंग होते है। ये है लेखक, पाठक और प्रकाशन। समाज के हित में लिखे गए साहित्य को ही उपयोगी मानना चाहिए।
     स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, लिंग विमर्श आदि के नाम पर साहित्य की दुकान चल रही है, लेकिन इससे साहित्य खंडित हो रहा है। गनीमत है कि ऐसे साहित्य का समाज पर व्यापक प्रभाव या लोकप्रियता नहीं है। यह कुछ लोगों तक ही सीमित है। साहित्य सांस्कृतिक कर्म व भविष्य की संभावना है।  साहित्य स्वछंदता नहीं होनी चाहिए। लोक मंगल व सामाजिक समरसता, सकारात्मक बदलाव की भावना से साहित्य की रचना होनी चाहिए। यह सही है कि आज हमारा साहित्य बाजारोन्मुख हो गया है। इसमें प्रकाशक की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।
    जबकि साहित्य सांस्कृतिक  मूल्य है तो वह बाजार में भी जगह बनाएगा।  व्यक्ति को संवेदना से जोड़ने का प्रयास है शब्द रंग साहित्य महोत्सव। इस साहित्य महोत्सव में ‘सिनेमा और समाज’, ‘मीडिया और संस्कृति’, ‘साहित्यकारों की दृष्टि में भविष्य का भारत’, ‘कला साहित्य में भारतीय विचार’ तथा ‘साहित्य आज-कल’ आदि साहित्य विषयक सत्रों का संचालन किया गया। यह सही है कि भूमण्डलीकरण का अत्यधिक लाभ हिन्दी को मिला है। हिन्दी फिल्म जगत ने हिन्दी के अन्तर्राष्ट्रीयकरण में विषेष योगदान किया है।
    वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक परिदृष्य में सफल होने के लिये हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी का ज्ञान भी समय की मांग है।
    विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री श्रीनिवास ने कहा कि संवेदना जागृत करना ही सही मायने में साहित्य सृजन है। अर्थात् संवेदना ही साहित्य है। अपने जीवन के साथ-साथ दूसरों के जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाला ही सफल है।  अनुभव जब अनुभूति में बदलता है तो वह साहित्य बन जाता है। भारत माता के चरणों में बैठकर ही श्रेष्ठ भारत का निर्माण हो सकता है। नए भारत के निर्माण में युवा साहित्यकारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।  बदलते परिवेष में हम आधुनिक बनें किन्तु अपनी सांस्कृतिक विरासत से दूर न हों।
    वर्तमान व्यवसायिक साहित्य के परिप्रेक्ष्य में निबंध लेखन की विधा लगभग समाप्त हो चुकी है।
    साहित्य की साझेदारी केवल अपने वतर्मान से ही नहीं बल्कि अपने अतीत से भी रही है।  भारत अंग्रेजी किताबों का अमेरिका व ब्रिटेन के बाद तीसरा सबसे बड़ा बाजार है।
     पाश्चात्य की नकल पर आधारित साहित्य समाज के हित में नहीं है। साहित्य लगातार, संभावनाओं की बात करना है। वर्तमान साहित्य में राष्ट्रीयता के चरित्र को गायब कर दिया गया है। सांप्रदायिकता व धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द साहित्य की आलोचना पूर्वाग्रह से प्रेरित होते है। इस प्रकार शब्द रंग साहित्य समारोह विद्यर्थियो के लिए उपयोगी साबित हुआ।

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