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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    दिग्भ्रमित भटकते दिग्गज

    By October 16, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    भाजपा में कुछ ऐसे भी दिग्गज हैं,जिन्हें औपचारिक रूप से मार्ग दर्शक मंडल में जगह नहीं मिली थी, लेकिन इनकी महत्वाकांक्षा में कोई कमी नहीं थी। इन्हें उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी उन्हें पहले जैसी अहमियत देंगे। लेकिन यह सपना पूरा नहीं हुआ। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद इन उपेक्षित नेताओं ने कुछ समय इंतजार किया। लेकिन धीरे धीरे इनका धैर्य जबाब देने लगा। जब सब तरफ से उम्मीद टूटने लगी तो ये बगावत के रास्ते पर चल पड़े। इन्हें नरेंद्र मोदी सरकार में सब कमियां नजर आने लगी। मोदी और भाजपा के विरोधी इन्हें पसंद आने लगे। फिर तो ऐसा समय आया कि भाजपा के विरोध की जहाँ भी आवाज सुनाई दी, ये नेता उधर ही दौड़ने लगे। इन्हें अपनी उम्र, मान, मर्यादा  और वरिष्ठता का भी ध्यान नहीं रहा।
    इन्हें तेजश्वी यादव, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल की शागिर्दी में भी संकोच नहीं रह। पिछले कुछ दिनों में ये इन युवा नेताओं के साथ मंच साझा कर चुके है। केंद्र सरकार और भाजपा के खिलाफ ये विपक्षी पार्टियों से जुगलबंदी कर रहे हैं।
    जयप्रकश नारायण जयंती पर लखनऊ में समारोह आयोजित किया गया था। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश  इसमें मौजूद थे, लेकिन सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव शामिल नहीं हुए। जयप्रकश के आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी थी। आपातकाल के दौरान वह जेल में बंद रहे। वह शामिल नहीं हो सके, लेकिन यशवंत सिन्हा,और शत्रुघ्न सिन्हा इसमें भागीदारी करने पहुंच गए।
    इन दोनों का उत्तर प्रदेश में कोई महत्व नहीं है, बिहार में सपा का कोई आधार नहीं है। ऐसे में इन दोनों की मौजूदगी का कोई मतलब नहीं था। इतना अवश्य है कि इन्हें अपनी भड़ास निकालने का अवसर मिल गया। सपा द्वारा उपलब्ध कराए गए मंच से इन्होंने भाजपा पर जम कर निशाना लगाया। बागी सिन्हा बंधुओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तानाशाह तक बताया, देश में आपातकाल से बदतर हालात बताए। यशवंत और शत्रुघ्न के लिए यह कहना आसान था।
    क्योंकि इन्होंने आपातकाल की तकलीफ नहीं झेली। मंच पर मुलायम सिंह यादव होते तो असलियत बताते। नरेंद्र मोदी पर तो सर्वाधिक हमले हो रहे हैं, फिर भी देश उन पर आपातकाल जैसी तानाशाही का आरोप लगाया जा रहा है। यह यशवंत और शत्रुघ्न की कुंठा है। यही जगजाहिर हुई है। जो मुद्दे विपक्षी नेता भी छोड़ चुके है, ये अभी भी उनके पीछे पड़े है। नोटबन्दी के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हुए थे। परिणाम सबके सामने आ गए। नोटबन्दी कोई मुद्दा नहीं बना। इनका दूसरा मुद्दा जीएसटी है। इस पर सर्वदलीय सहमति थी। सभी संसोधन जीएसटी काउंसिल कर रही है।
    अबतक के सभी फैसले सर्वसम्मत्ति से हुए हैं। इसमें विपक्षी पार्टियों के मुख्यमंत्री भी शामिल रहते हैं। पिछली सरकारें नोटबन्दी, जीएसटी,वन रैंक वन पेंशन पर निर्णय से बचती रहीं, यह उनकी नाकामी थी। यदि ये कार्य पहले होते तो नरेंद्र मोदी को इस पर निर्णय की जरूरत ही नहीं थी। मोदीं ने निजी लाभ हानि को अलग रखकर देशहित को सर्वोच्च मान कर निर्णय किये। विपक्ष की सरकार अपनी विफलता छिपाने के लिए ये मुद्दे उठा रहा है, यशवंत,शत्रुघ्न,अरुण शौरी को तो वर्तमान सरकार के खिलाफ मुद्दे चाहिए।
     शत्रुघ्न ,यशवंत,शौरी आदि को अपनी रणनीति तय करने का पूरा अधिकार है। लेकिन मर्यादा के प्रतिकूल आचरण से इनकी प्रतिष्ठा नहीं बढ़ेगी। लखनऊ में यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा ने अखिलेश की शान में कसीदे पढ़े। यह शैली इनकी उम्र के अनुरूप नहीं थी। शत्रुघ्न ने तो उन्हें सीतारा घोषित किया। जयप्रकाश ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया था। शत्रुघ्न ने इसी तर्ज पर भाजपा के संपूर्ण सफाए का नारा दिया। शत्रुघ्न को समझना चाहिए कि नारे की तुकबंदी से कोई जयप्रकाश की तरह महान नहीं बन सकता। जेपी पद लिप्सा से बहुत दूर थे।
    जातिवंश की राजनीति से उनका कोई लेना देना नहीं था। उनके नाम पर जातीय सम्मेलन करना, जिस पार्टी के सांसद है, उसी के सफाए की बात करना स्वार्थ की राजनीति है। यदि भाजपा उन्हें नहीं निकाल रही है, तो इन नेताओं को पार्टी छोड़ देनी चाहिए। लेकिन जब नाराजगी पद के लिए होती है,तो सिद्धांत बेमानी हो जाते है। नरेंद्र मोदी ने इन्हें अहमियत दी होती तो ये बगावत के रास्ते पर शायद नहीं जाते।
    यशवंत सिन्हा ने कहा कि जब देश में अंधेरा था, तानाशाही के दिन थे जब जयप्रकाश जी ने दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ी। आज इमर्जेंसी से बदतर हालात हैं। इसकी चुनौती से हम मिलकर निबटेंगे। लोकतांत्रिक संस्थाएं खतरे में है।
    यशवंत की बात पर विश्वास करें तो यह भी मानना होगा कि उनके पुत्र जयंत भी तनाशाही,एमर्जेन्सी और लोकतांत्रिक संस्थाओं को खतरे में डालने वालों की टीम में शामिल है।  यशवंत के पुत्र जयंत केंद्र में मंत्री हैं। वह इन मठाधीशों के बयान की निंदा कर चुके है। वैसे जो यशवंत अपने बेटे को अपनी बात समझाने में विफल है ,उन्हें गलतफहमी है कि लोग उनके आह्वान पर भाजपा का सम्पूर्ण सफाया कर देंगे। शत्रुघ्न पहले नीतीश की तारीफ में कसीदे पढ़ते थे, जब वहां पनाह नहीं मिली, तब तेजश्वी, केजरीवाल,हार्दिक पटेल के विषय में वही बात दोहराई, अब उन्हीं विशेषताओं को अखिलेश पर भी लागू कर दिया।
    जाहिर है ये नेता अपने लिए संभावना तलाश रहे है। इन नेताओं को भाजपा में अपना भविष्य दिखाई नहीं दे रहा है। इनका ऐसा जनाधार भी नहीं कि चुनाव में करिश्मा दिखा सकें। ऐसे में इन्हें अब अपनी सियासी पारी जारी रखने की चिंता सता रही है। यही चिंता उन्हें दिग्भ्रमित किये हुए है। यही कारण है कि इन्हें अपनी से आधी उम्र के नेताओं के कसीदे पढ़ने में भी संकोच नहीं है।

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