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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    वित्तीय व्यवस्था व बिजनेस रैंकिंग में सुधार

    By November 4, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    भारत ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में एक बार फिर छलांग लगाई है। इसका मतलब है कि भारत के आर्थिक सुधार कारगर हो रहे है। ऐसे में अर्थव्यवस्था से जुड़ी सभी रिजर्व बैंक सहित अन्य संस्थाओं को सुधार कार्यो में साझा प्रयास करने चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि संवैधानिक संस्थाए लोगों के कल्याण के लिए है। रिजर्व बैंक इस अवधारणा से अलग नहीं हो सकता।
    ईज ऑफ डूइंग बिजनस रैकिंग में भारत ने लगातार दूसरे साल लंबी छलांग लगाई है। विश्व बैंक की ओर से जारी सूची में भारत ने तेईस पायदान के सुधार के साथ सतहत्तरवां स्थान हासिल किया है। पिछले दो सालों में भारत की रैकिंग में कुल तीरेपन पायदान का सुधार आया है। इससे भारत को अधिक विदेशी निवेश आकर्षित करने में मदद मिलेगी। पिछली कारोबार सुगमता रैंकिंग में भारत तीस पायदान की छलांग के साथ सौ वें स्थान पर पहुंच गया था। यह एक वर्ष के अंतराल में भारत द्वारा लगाई गई सबसे बड़ी छलांग थी। इसमें एक सौ नब्बे देशों को रैंकिंग दी जाती है। मोदी ने भारत को शीर्ष पचास देशों में शामिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
    विश्व बैंक की रैंकिंग दस मानदंडों पर आधारित है। इसमें कारोबार का प्रारंभ, निर्माण परमिट, बिजली कनेक्शन हासिल करना, कर्ज हासिल करना, टैक्स भुगतान, सीमापार कारोबार, अनुबंध लागू करना और दिवाला मामले का निपटारा शामिल है।
    विश्व बैंक की ताजा वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया कि छह मानकों पर भारत की स्थिति सुधरी है। इन मानदंडों में कारोबार शुरू करना, निर्माण परमिट, बिजली की सुविधा प्राप्त करना, कर्ज प्राप्त करना, करों का भुगतान, सीमापार व्यापार, अनुबंधों को लागू करना और दिवाला प्रक्रिया से निपटारा शामिल है।
    साढ़े चार वर्ष पहले भारत एक सौ बयालीस वें स्थान पर था। नरेंद्र मोदी सरकार के प्रयासों से कारोबार सुगमता रैंकिंग सड़सठ अंक बेहतर हुई। वित्त मंत्री ने कहा कि भ्रष्टाचार और लालफीताशाही को खत्म किया है। विश्व बैंक ने इस मामले में सबसे अधिक सुधार करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में भारत को दसवें स्थान पर रखा है। मोदी सरकार ने नये व्यवसाय की प्रारंभिक प्रक्रिया को आसान बनाया है। बुनियादी ढांचा निर्माण के लिए अनुमति मिलने में आने वाली बाधाओं को दूर किया गया। बिजली की उपलब्धता बढ़ाई गई। बिजली कनेक्शन मिलने में लगने वाला समय और लागत को कम किया गया। इसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था की गई। व्यावसायिक संपत्ति के रजिस्ट्रेशन में लगने वाले समय और खर्च में कमी हुई।
    ऋण लेने में सहूलियत प्रदान की गई। कर्ज प्रक्रिया में आने वाली जटिलताओं को दूर किया गया। अब तो एक घण्टे में एक करोड़ रुपये कर्ज मिलने की सुविधा प्रदान की गई है। मुद्रा बैंक योजना लागू की गई। जिससे छोटे व्यवसायियों को असुविधा न हो। सरकार चाहती है कि छोटे व्यापारियों को सुगमता से पर्याप्त कर्ज मील सके। इसके अनुसार व्यवस्था करने की आवश्यकता है। बैकों को कुछ छूट देनी होगी। जबकि रिजर्व बैंक ने एनपीए अर्थात फंसे हुए कर्ज के बोझ से दबे बैंकों के कर्ज देने पर रोक लगाई है।
    रिजर्व बैंक और सरकार के बीच टकराव का मामला पेमेंट रेगुलेटर से संबंधित है। सरकार नया रेगुलेटर बनाना चाहती है, जबकि आरबीआई इसके खिलाफ है। उसने पहली बार अपना असंतोष वेबसाइट पर सार्वजनिक किया है। इससे पहले ब्याज दर, एनपीए और आईए एंड एफएस संकट पर भी दोनों के बीच मतभेद सामने आ चुके हैं। केन्द्र सरकार द्वारा आरबीआई एक्ट के सेक्शन सात का इस्तेमाल करने की बात चली थी। इस सेक्शन के तहत केन्द्र सरकार जनहित में अहम मुद्दों पर आरबीआई को सलाह दे सकती है। अभी यह साफ नहीं है कि आरबीआई एक्ट की धारा सात का प्रयोग किया है। इसके तहत वह रिजर्व बैंक को दिशा निर्देश दे सकती है। वैसे इस धारा का प्रयोग रिजर्व बैंक के इतिहास में कभी नहीं किया गया है। इसे स्वायत्तता के प्रतिकूल माना गया।
    लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। एक्ट में धारा सात का प्रावधान कुछ सोच समझ कर ही किया गया होगा। इसका अस्तित्व आज भी कायम है। कतिपय सलाह से स्वायत्तता की समाप्ति नहीं हो जाती।
     केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आरबीआई पर 2008 से 2014 के बीच कर्ज देने वाले बैंकों पर अंकुश लगाने में नाकामी का आरोप लगाया।   इससे बैंकों में फंसे कर्ज एनएपी में भारी बढ़ोतरी हुई। यूपीए अर्थव्यवस्था को कृत्रिम रूप से आगे बढ़ाने के लिए बैंकों को अपना दरवाजा खोलने तथा मनमाने तरीके से कर्ज देने को कहा गया था। उस दौरान अंधाधुंध तरीके से कर्ज दिए गए।
    यही कारण था कि उस दौरान क्रेडिट ग्रोथ एक साल में चौदह प्रतिशत से बढ़कर इकतीस हो गई। अगले वर्ष तक  टैक्सबेस करीब दोगुना हो जाएगा। यह वृद्धि बिना टैक्स दर बढ़ाए हुई। राजस्व में वृद्धि की वजह अर्थव्यवस्था में असंगठित रूप से कार्य कर रही इकाइयों को संगठित क्षेत्र के दायरे में लाना और इसकी वजह नोटबंदी, नई इनडायरेक्ट टैक्स व्यवस्था  डायरेक्ट टैक्स ढांचे में सुधार हुआ है। जेटली के दावा है कि नोटबंदी कठिन कदम था लेकिन इससे हमें यह साफ करने में मदद मिली कि हमारा इरादा अर्थव्यवस्था को संगठित रूप देना था।  जब भाजपा सत्ता में आई तब आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या करीब तीन करोड़ थी। चार साल में यह संख्या बढ़कर छह करोड़ से ज्यादा पर पहुंच गई है। मुझे भरोसा है कि इस साल यह संख्या  सात करोड़ हो जाएगी जो लगभग दोगुना है। जीएसटी के क्रियान्वयन के पहले साल में ही अप्रत्यक्ष करदाताओं की संख्या करीब पचहत्तर प्रतिशत बढ़ी है।
    नरेंद्र मोदी ने  कई नए कदमों की घोषणा की जिसमें इस क्षेत्र की इकाइयों को मात्र उनसठ मिनट में एक करोड़ रुपये तक के ऋण की आनलाइन मंजूरी की सुविधा वाला एक पोर्टल भी है।  वस्तु एवं सेवा कर जीएसटी के तहत पंजीकृत एमएसएमई इकाइयां इससे लाभान्वित होंगी।  इसके अलावा ऋण पर छोटे कारोबारियों को दो प्रतिशत छूट मिलेगी। एमएसएमई सेक्टर को सशक्त बनाने के लिए बारह नीतियों को अंतिम रूप दिया है।  इन नीतियों से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए पूंजी तक पहुंच बढ़ेगी। इन नीतियों से इस सेक्टर को बढ़ावा मिलेगा और नए रोजगार सृजित होंगे।
    जाहिर है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने व्यापारिक सुगमता की दृष्टि से अनेक कारगर कदम उठाए है। इसमें कुछ फैसले तात्कालिक रूप में लोक लुभावन नहीं थे। जबकि इन कदमों को बहुत पहले ही लागू होना चाहिए था। लेकिन पिछली सरकार ने यह साहस नहीं दिखाया। मोदी ने साहस दिखाया। इसके सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगे है। व्यापार सुगमता में भारत की रैंकिंग में जबरदस्त उछाल इसका प्रमाण है। इस ग्राफ में अभी और बढोत्तरी होगी।

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