डॉ दिलीप अग्निहोत्री
विधानसभा चुनाव परिणाम को लेकर दिलचस्प तथ्य उभर रहे है। खासतौर पर नोटा के प्रयोग ने भारत के चुनावी इतिहास में नया अध्याय बनाया है। मध्यप्रदेश में नोटा ने सत्ता का समीकरण बदल दिया। राजस्थान में भी इसने असर दिखाया। नोटा प्रयोग करने वालों में अपवाद छोड़ दें तो ये सभी भाजपा के ही समर्थक थे। भाजपा के अलावा किसी अन्य को वोट देने के विषय में ये सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन एससीएसटी एक्ट के चलते नोटा को हवा दी गई। ऐसे में नोटा का प्रयोग करने वालों ने कांग्रेस की संजीवनी प्रदान कर दी। वस्तुतः भाजपा और कांग्रेस दोनों को इस चुनाव से सबक लेना चाहिए। एससीएसटी एक्ट में संशोधन पर अधिक गहराई से विचार विमर्श की आवश्यकत थी। दलितों पर अत्याचार अमानवीय कृत्य है। इसके दोषियों को कठोर सजा मिलनी चाहिए। लेकिन एक्ट के दुरुपयोग के भी उदाहरण मिलते है। यह भी न्याय के मूलभूत सिद्धांत के विरुद्ध है। इस तथ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता है।भ्र्ष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस का अनुभव आमजन को होना चाहिए। सरकारी कार्यालयों में कार्य के लिए जाने वालों के लिए क्या बदला ,यह देखना चाहिए। अनेक मंत्रियों की छवि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़ में खराब थी। इन्हें बनाये रखने से पार्टी की छवि धूमिल हुई। बाहरी लोगों पर मेरबानी की एक सीमा होनी चाहिए। भाजपा विचार करे कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस छोड़ कर आने वालों को टिकट देने से क्या हासिल हुआ। उत्तर प्रदेश में दूसरी पार्टी छोड़कर आये नेताओं को राज्यसभा, विधान परिषद भेजने से क्या लाभ हुआ, इस पर भी विचार करना चाहिए। भाजपा यदि कमजोर दिखी तो यही लोग सबसे पहले अलग होंगें।

कांग्रेस जीत गई। तीन प्रदेशों में एक साथ सरकार बनाने से उसके पैर जमीन पर नहीं टिक रहे है। राहुल गांधी ने परिणामों के बाद ऐसे प्रेस कांफ्रेंस की थी, जैसे सब उनके करिश्में का परिणाम है। जबकि उनके हिसाब से वोट पड़ते तो भाजपा का जमीन से सफाया हो जाता। वह प्रधानमंत्री को चोर बता रहे थे, क्या इससे कांग्रेस को ईमानदार मान लिया गया। राफेल पर हंगामे के अलावा उनके पास कोई मजबूत तर्क नहीं है। वह तो दस वर्ष में एक विमान नहीं ला सके। नोटबन्दी के बाद उत्तर प्रदेश के चुनाव हुए। आज तक उसे अलापने की कोई आवश्यकता नहीं थी। जीएसटी को कांग्रेस दस वर्ष में लागू नही कर सकी। अब किस मुंह से वादा कर रही है।
नरेंद्र मोदी सरकार ने कमणियों के बकाए का तीन लाख करोड़ रुपया वसूला। साठ वर्ष में करीब इतने ही लाख व्यापारियों का रजिस्ट्रेशन था। दो वर्ष में चालीस लाख बढ़ गए। डायरेक्ट टैक्स में चालीस प्रतिशत वृद्धि हुई। नब्बे हजार करोड़ रुपये जनधन खाते में सीधे भेज कर प्रतिवर्ष बचाये गए। कांग्रेस के समय किसानों की स्थिति आज से बेहतर नहीं थी। कांग्रेस समझ ले कि वह जीती नहीं है, भाजपा हारी है।
किसी पार्टी की सरकार का बन जाना चुनाव की अंतिम परिणति होती है। फिर इस बात का कोई व्यवहारिक मतलब नहीं रहता कि हार जीत का अंतर क्या था। फिर भी भविष्य के आकलन में ऐसे आंकड़े उपयोगी साबित होते है।
मध्यप्रदेश में नोटा कांग्रेस के लिए वरदान साबित हुआ। एससीएसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को निरस्त करने से बड़ी संख्या में लोग नाराज थे। इन्हीं में कुछ लोग नोटा प्रयोग का अभियान चला रहे थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि मध्यप्रदेश में नोटा के कारण कांग्रेस को सत्ता नसीब हुई। यहां मुख्यमंत्री पद के लिए शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता सर्वाधिक थी। कांग्रेस के कमलनाथ और ज्योतारदित्य सिंधिया का स्थान उनके बाद था।
राजस्थान में पच्चीस वर्षो की परंपरा का पालन हुआ। लेकिन भाजपा को जितना कमजोर समझा जा रहा था, उतनी वह नहीं थी। यहां भी नोटा और एससीएसटी एक्ट को लेकर नाराजगी ने असर दिखाया।
छतीसगढ़ सरकार के कई मंत्री आरोप के घेरे में थे। लेकिन यह भी चर्चा है कि नक्सलवादियों के खिलाफ अभियान ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया। जबकि कांग्रेस ने उनके विरुद्ध नरम रुख बनाये रखा। छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक दो प्रतिशत से ज्यादा मतदाताओं ने नोटा का प्रयोग किया। मध्यप्रदेश की चौदह सीटों पर नोटा ने असर दिखाया। कांग्रेस को ग्यारह सीट नोटा के कारण हासिल हुई। भाजपा को भी तीन सीट ऐसी मिली। लेकिन सच्चाई यह है कि इसबार भाजपा के समर्थकों ने ही नोटा का प्रयोग किया। वह अपनी ही पार्टी को सबक सिखाना चाहते थे। नोटा की वजह से ही कांग्रेस को सफलता मिली। ये वही वोट थे जो एससीएसटी एक्ट के विरोध में भाजपा को सबक सिखाने की बात कर रहे थे। चौदह सीटों पर हार का अंतर नोटा में पड़े वोट से कम था। इससे पहले कर्नाटक चुनावों में भी नोटा ने आठ सीटों पर भाजपा की जीत को हार में तब्दील कर दिया था। मध्यप्रदेश चुनावों में डेढ़ प्रतिशत लोगों ने नोटा का प्रयोग किया। यह संख्या साढ़े चार लाख से ज्यादा है।
मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों को इकतालीस प्वाइंट दो प्रतिशत वोट मिले हैं। जोवाट में तो नोटा के तहत पांच हजार से ज्यादा संख्या रही, जबकि जीत का अंतर करीब दो हजार था।
वारासिवनी सीट पर निर्दलीय प्रदीप जायसवाल को पैंतालीस हजार छह सौ बारह वोट मिले, जबकि भाजपा के योगेश निर्मल को चवालीस हजार छह सौ तीरसठ वोट मिले। नोटा में एक हजार पैंतालीस वोट पड़े। टीकमगढ़ में नोटा को नौ सौ छियासी वोट पड़े। सुवासरा विधानसभा में भाजपा को नवासी हजार सैट सौ बारह , कांग्रेस को नवासी हजार तीन सौ चौसठ और नोटा पर अठ्ठाइस सौ चौहत्तर वोट पड़े। गरोथ में नोटा को तेईस सौ इक्यानवे वोट मिले।
राजनगर में भाजपा के उम्मीदवार को चौतीस हजार आठ सौ सात वोट और कांग्रेस के प्रत्याशी को चौतीस हजार एक सौ उनतालीस वोट पड़े, जबकि नोटा के पक्ष में इक्कीस सौ तैतीस वोट पड़े। नेपानगर में कांग्रेस को करीब पच्चासी हजार भाजपा को करीब चौरासी हजार और नोटा को करीब पच्चीस सौ वोट पड़े। मान्धाता में कांग्रेस को करीब इकहत्तर हजार भाजपा को करीब उनहत्तर हजार और नोटा को पन्द्र सौ पचहत्तर वोट पड़े।
कोलारस में भाजपा को इकहत्तर हजार एक सौ तिहत्तर और कांग्रेस को सत्तर हजार जबकि नोटा पर करीब साढ़े छह सौ वोट पड़े। जोबाट सीट पर नोटा में पांच हजार एक सौ उनतालीस वोट पड़े, जबकि दोनों दलों के प्रत्याशियों की जीत का अंतर पच्चीस सौ था। जओरा सीट पर नोटा के पक्ष में पन्द्रह सौ वोट पड़े, कांग्रेस सात सौ वोट से जीत गई। एससीएसटी एक्ट में संशोधन के फौरन बाद राजस्थान में भी नोटा अभियान शुरू हुआ था। सोशल मीडिया में भी इसे खूब चलाया गया। मध्यप्रदेश में चौतीस सीट पर तीन सौ वोट के अंतर, छह सीट दस वोट के अंतर और दो सीट मात्र एक वोट के अंतर से पराजय मिली। राजस्थान में पन्द्रह सीट नोटा से प्रभावित हुई।
छतीसगढ़ में रमण सिंह अपनी लोकप्रियता कायम नहीं रख सके थे। इसके अलावा नोटा और नक्सलियों के कारण भी उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। कांग्रेस ने नक्सलियों के प्रति अपरोक्ष रूप से सहानुभूति दिखाई। खुला समर्थन करना उनके लिए भी मुश्किल था। लेकिन एक स्टार प्रचारक से बयान दिला कर कांग्रेस ने अपनी चाल चल दी थी। जबकि नरेंद्र मोदी सरकार ने नक्सलवाद के साथ किसी प्रकार की नरमी से इनकार कर दिया था। यूपीए के मुकाबले देश में नक्सलवाद में भारी कमी हुई है।
चुनाव से कुछ दिन पहले एक बड़े मीडिया घराने ने खुलासा किया था कि शहरी नक्सलियों के दो बड़े कांग्रेसी नेताओं के साथ सम्बन्ध थे। इन नेताओं के द्वारा शहरी नक्सलियों को फायदा पहुंचाने के लिए कई तरह का प्रयास किया गया था। पिछले दिनों पांच एक्टिविस्ट, कवियों और लेखकों को महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार किया था। इन सभी के नक्सलवादियों के साथ गहरे तालुकात होने के आरोप हैं। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इन को राहत प्रदान करते हुए पुलिस कस्टडी के बजाय इनके घरों में ही नजरबंद कर दिया था।
यह शहरी नक्सलवादी कांग्रेस के नाम का प्रयोग भी कर रहे थे। साथ ही साथ राजनीतिक पहुंच बढ़ाने और अपने संगठनों को मजबूत करने के लिए कई तरह की रियायतें प्राप्त कर रहे थे। यह सिलसिला पिछले लंबे समय से चल रहा था। लगातार आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण इन शहरी नक्सलियों के द्वारा कांग्रेस के नेताओं पर दबाव बनाया जा रहा था, ताकि आर्थिक व राजनीतिक लाभ प्राप्त किया जा सके। महाराष्ट्र पुलिस ने कहा है कि इन शायरी नक्सलियों के साथ इन कांग्रेसी नेताओं की संबंध उजागर हो चुके हैं। इनके द्वारा कई बार मोबाइल फोन पर आपस में बातें की गई है।
यहां तक कि खुद के नंबर के बजाए दूसरे के मोबाइल नंबर से भी बात करने की जानकारी सामने आई है। पिछले दिनों भाजपा ने कहा था कि भीमा कोरेगांव की हिंसा से जुड़े अभियुक्तों और माओवादियों के साथ मिलकर कांग्रेसने भाजपा शासित राज्यों में अस्थिरता पैदा करने की साजिश की थी। इन बातों से कांग्रेस की नक्सल से हमदर्दी उजागर हुई। छतीसगढ़ में उसे इसका लाभ मिला।








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