डा जगदीश गाँधी
माँ की ममता तथा करूणा से भरी बचपन की एक बड़ी ही मार्मिक कहानी मुझे याद आ रही है – सांसारिक स्वार्थ में डूबा एक व्यक्ति अपनी बूढ़ी माँ का दिल निकालने के लिए हाथ में छुरी लेकर गया और माँ को मारकर उसका दिल हाथ में लेकर खुशी-खुशी चला। रास्ते में उसे जोर की ठोकर लगी वह गिर पड़ा। छिटककर हाथ से गिरा माँ का कलेजा बेटे की तकलीफ से तड़प गया। माँ के दिल से आह निकली मेरे प्यारे बेटे चोट तो नहीं आयी। माँ तो सदैव अपने बच्चों पर जीवन की सारी पूँजी लुटाने के लिए लालयित रहती है। मोहम्मद साहब ने कहा था कि अगर धरती पर कहीं जन्नत है तो वह माँ के कदमों में है।
पारिवारिक एकता का ज्ञान देने की जिम्मेदारी परिवार तथा स्कूल निभाये:
समाज में बढ़ रही घोर प्रतिस्पर्धा से नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है। बुजुर्गो पर इसका प्रभाव ज्यादा है। उनकी उपेक्षा में बढ़ोतरी हुई है। जीवन के अंतिम पड़ाव में वह बेटे व परिवार के सुख से वंचित हो रहे हैं। इस पर जल्द नियंत्रण नहीं किया गया तो स्थिति भयावह हो जाएगी। बच्चों में बुजुर्गो के प्रति स्नेह व लगाव पैदा करना बहुत जरूरी है। बच्चों को यह बताया जाए कि बुजुर्गो की सेवा से ही जीवन सफल हो सकता है। समाज तथा विशेषकर स्कूलों के लिए यह एक चुनौती है। इसके लिए मानवीय सूझबूझ से भरी व्यापक योजना बनाने की जरूरत है।
केवल प्रेमपूर्ण हृदय वाला परिवार ही प्रकाशित है:
समाज में बुजुर्गो का परम स्थान है लेकिन तेजी से बदलते समाज में उनका स्थान गिरता जा रहा है। विदेशों में पढ़ाने व अधिक धन कमाने के लिए वहीं नौकरी करने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। आधुनिक सुख-सुविधाओं की चाह में वे स्वयं तो बड़े शहरों में रहना चाहते हैं लेकिन अपने मां-बाप को गांव-कस्बे में रखना चाहते हैं। बेटा जब अपने बूढ़े मां-बाप को अपने से दूर रखेगा तो उनकी सेवा कैसे हो सकती है?
वृद्धजनों को पूरा सम्मान देना :
वर्तमान भौतिक युग में आज सारे विश्व में वृद्धजनों के प्रति घोर उपेक्षा बरती जा रही हैं। विकसित देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए सरकार की ओर से वृद्धजनों के लिए ओल्ड ऐज होम स्थापित किये हैं। जिसमें वृद्धजनों के खाने-पीने, बेहतर आवासीय सुविधायें, आधुनिक चिकित्सा, स्वस्थ मनोरंजन, खेलकूद, ज्ञानवर्धन हेतु लाइब्रेरी आदि-आदि सब कुछ उपलब्ध कराया गया है। साथ ही वृद्धजनों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए अच्छी खासी पेन्शन भी सरकार की ओर से दी जाती है। हमारे देश में वृद्धजनों के लिए ओल्ड ऐज होम की सुविधायें नहीं हैं। सीनियर सिटीजन को दी जाने वाली पेन्शन की राशि भी बहुत कम है। इस दिशा में सरकार तथा कॅारपोरेट जगत को सार्थक कदम उठाकर वृद्धजनों को सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराने के लिए आगे आना चाहिए।
संयुक्त परिवार वसुधैव कुटुम्बकम् की सीख देने की प्राथमिक पाठशाला है:
प्राचीन काल में हमारे देश में संयुक्त परिवारों में वृद्धजनों को पूरा सम्मान, सुरक्षा तथा देखभाल मिलती थी। उद्देश्यहीन शिक्षा तथा भौतिकता की अंधी दौड़ ने हमारे देश में भी संयुक्त परिवारों की श्रेष्ठ परम्परा को बुरी तरह बिखेर दिया है। विशेषकर शहरों में एकल परिवार का रिवाज तेजी से बढ़ रहा है।
धरती में यदि कहीं जन्नत है तो माता-पिता के कदमों में है:
इस धरती पर हमारे भौतिक शरीर के जन्मदाता माता-पिता संसार में सर्वोपरि हैं। हमें उनका सम्मान करना चाहिए। जिन मां-बाप ने अपना सब कुछ लगाकर अपनी संतानों को योग्य बनाया वे संतानें जब बड़े होकर अपने वृद्ध मां-बाप की उपेक्षा करती हैं तो उन पर क्या बीतती है इस पीड़ा की अभिव्यक्ति कोई भुगत-भोगी ही भली प्रकार कर सकता है। वृद्धजनों का मूल्यांकन केवल भौतिक दृष्टि से करना सबसे बड़ी नासमझी है। वृद्धजन अनुभव तथा ज्ञान की पूंजी होते हैं।
बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह का कहना है कि जब हमारे सामने माता-पिता तथा परमात्मा में से किसी एक का चयन करने का प्रश्न आये तो हमें माता-पिता को चुनना चाहिए। माता-पिता की सच्चे हृदय से सेवा करना परमात्मा की नजदीकी प्राप्त करने का सबसे सरल तथा सीधा मार्ग है। साथ ही मानव जीवन के परम लक्ष्य अपनी आत्मा का विकास करने का श्रेष्ठ मार्ग भी है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि जिस घर में माता-पिता का सम्मान होता है उस घर में देवता वास करते हैं। माता-पिता धरती के भगवान है। माता-पिता इस धरती पर परमात्मा की सच्ची पहचान है।
लेखक वरिष्ठ शिक्षाविद एवं सीएमएस स्कूल के संस्थापक हैं








4 Comments
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