राष्ट्रवादी मीडिया का महत्व

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
मीडिया का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक के साथ अब सोशल मीडिया की भी बाढ़ है। लेकिन यह सब तभी तक सार्थक है, जब तक इनके सामाजिक सरोकार भी है। इसके निर्वाह के लिए भारतीय संस्कृति के प्रति आग्रह आवश्यक है।
भारत में देवर्षि नारद ने ही पत्रकारिता का प्रादुर्भाव किया था। उनके चौरासी सूत्र आधुनिक पत्रकारिता के संदर्भ में भी प्रासंगिक है। उनकी सभी बात आज के मीडिया पर न केवल लागू होती है, बल्कि उनपर अमल से मीडिया को आदर्श रूप दिया जा सकता है। लेकिन आधुनिक वामपंथी खेमे पत्रकारों ने भारतीय संस्कृति की घोर अवहेलना की। उदारीकरण और वैश्वीकरण ने नया संकट पैदा किया है। ऐसे में राष्ट्रवादी पत्रकारिता के महत्व को बनाये रखने की चुनौती है। इसमें धीरे धीरे सफलता भी मिल रही है। लखनऊ के साहित्य महोत्सव में वरिष्ठ पत्रकारों ने इसी विषय पर विचार प्रस्तुत किये। उन्होंने पत्रकारिता में रुचि रखने वाले विद्यर्थियो का मार्गदर्शन किया।
भारतीय पत्रकारिता का वामपंथी विचारों ने नुकसान किया है। इसके लिए वामपंथियों ने अपना स्वरूप भी बदला है। कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार समाज की व्याख्या की थी। उसने समाज को दो वर्गों में बांटा था। पहला पूंजीपति और दूसरा सर्वहारा। पूंजीपति सदैव सर्वहारा का शोषण करता है। दोनों में संघर्ष चलता रहता है।
यह वामपंथियों, मार्क्सवादियों, माओवादीदियों, नक्सलियों का मूल चिंतन रहा है। इसमें अनेक बदलाव भी होते रहे। भारत के वामपंथियों ने मीडिया में अपना सांस्कृतिक विचार चलाया है। इसमें मार्क्स का आर्थिक चिंतन बहुत पीछे छूट गया। पूंजीपति और सर्वहारा की बात बन्द हो गई। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों की बात करना शुरू कर दिया। लेकिन वर्ग संघर्ष के चिंतन को बनाये रखा। ये कथित प्रगतिशील पत्रकार हिन्दू और मुसलमानों के संघर्ष की रचना करने लगे। इन्होंने यह मान लिया इनका वर्ग संघर्ष चलता रहेगा। वामपंथी रुझान वाले यहीं तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने सवर्ण और दलित के बीच भी वर्ग को हवा देना शुरू किया।
वामपंथी रूझान की पत्रकारिता ने हिंदुओं के विरोध को अपना पैशन बना लिया। वर्ग संघर्ष के सिद्धांत पर उन्होंने यह विचार फैलाया की हिन्दू शोषक और मुसलमान शोषित है। इसीलिए पश्चिम बंगाल और केरल की राजनीतिक हिंसा उन्हें दिखाई नहीं देती। किंतु कुछ लोग मजहब के आधार पर समाजविरोधी कार्य करें, यह कानून को अपने हाँथ में लेने की कोशिश करें, तो इसे भगवा आतंकवाद के रूप में प्रसारित किया जाता है।
इसी प्रकार सवर्णों को शोषक और दलितों को शोषित कहा गया। प्रत्येक सवर्ण इनकी नजर में अत्याचारी हो गया। मतलब यहाँ भी सामाजिक व सांस्कृतिक वर्ग संघर्ष का प्रचार सुनियोजित ढंग से किया गया। फिल्मों में वर्ग विशेष के लोगों को इबादत करने वाला, सदैव सच बोलने वाला, नेक इंसान बताया जाता है, वही हिंदुओ को विभाजित करके दिखाया जाता है, इसमें ब्राह्मण को हास्यस्पद रूप में, क्षत्रिय को अत्याचारी और वैश्य को व्यापार में गड़बड़ी करने वाला दिखाया जाता है। सत्तर के दशक तक केवल प्रगतिशील लोगों को ही बौद्धिक या श्रेष्ठ पत्रकार माना जाता है। धीरे धीरे इसमें बदलाव आना शुरू हुआ। राष्ट्रवादी पत्रकारों ने भारतीय संस्कृति और मूल्यों को महत्व दिया। उदारीकरण ने भी स्थिति बिगाड़ी है। किस मीडिया संस्थान में विदेश की कितनी पूंजी लगी है, इसे कोई नहीं जानता। यह एक प्रकार का संकट है। इसका असर भी दिखाई दे रहा है। भाषा शैली सभी पर इसका प्रभाव दिखाई दे रहा है।
स्वतंत्रता के बाद ही वामपंथी विचारकों को लेखन के लिए प्रोत्साहित किया गया। उनके द्वारा बनाये गए पाठ्यक्रम को शिक्षा में चलाया गया। इसमें भारत के प्रति हींनभावना का विचार था। प्राचीन भारतीय विरासत को खारिज किया गया। यह पढ़ाया गया कि विदेशी शासन ने भारत को सभ्य बनाया। जबकि वह स्वयं सभ्यताओं के संघर्ष करने वाले लोग थे। भारत तो सबके कल्याण की कामना करने वाला देश रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार राजनाथ सूर्य मानते है कि दिल्ली का प्रदूषण केवल पर्यावरण का ही नहीं सांस्कृतिक भी है। न्यायपालिका भी इससे बची नहीं। चार जजों की पत्रकारिता, एक जज के खिलाफ महाभियोग की धमकी भी सांस्कृतिक पर्यावरण का प्रमाण है। पश्चिमी और पूंजीवादी विचार में एकाधिकारवादी प्रवृत्ति होती है। मीडिया में इनका वर्चस्व हो रहा है। भारतीय संस्कृति उदारता में विश्वास रखती है।  अंग्रेजी का महत्व बढ़ना और हिंदी के महत्व का कम होना चिंता का विषय है। मदर्स,फादर्स के नाम पर एक दिन का आयोजन यूरोप की सोच है। यह भी सांस्कृतिक प्रदूषण है। हमारे यहां प्रतिदिन माता पिता के सम्मान होता है।
साहित्य महोत्सव में विद्यर्थियो कई संख्या अधिक थी। वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष शुक्ला ने उनके सामने बड़े  रोचक ढंग से अपनी बात रखीं। कहा कि  इलेक्ट्रॉनिक चैनल की बहस की जगह हंसने हँसाने वाले सीरियल देखे। बहस देख कर अच्छा पत्रकार नहीं बना जा सकता। फील्ड में मेहनत करने वाले ही वास्तविक पत्रकार है। भ्रमण, जिज्ञासा ,अध्य्यन, से पत्रकारिता प्रभावी होती है। पूर्वाग्रह से कभी सही दिशा नहीं मिलती। जैसे असिष्णुता अभियान चलाने वाले लोग पूर्वाग्रह से पीड़ित थे। ये वही लोग थे जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ थे। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले यही लोग राष्ट्रपति से मिले थे। मोदीं के प्रधानमंत्री बनने का विरोध किया था। यह विचार संविधान और प्रजातंत्र के विरुद्ध था। कल्चर छोटा शब्द है, संस्कृति व्यापक होती है।
पहले आंगन में तुलसी जी का विरवा होता था। पूरा परिवार आंगन के चारो ओर रहता था। कमरे से बाहर आते ही संस्कृति शुरू होती है। जेएनयू हमारे देश में है। वहां एक टीचर विद्यर्थियो को हिन्दू धर्म की निंदा करती है, लेकिन उन्हें रोका नहीं जाता, उनके खिलाफ कानूनी कर्रवाई नहीं कि जाती। यह सहिष्णुता नहीं, दूसरों की भावनाओं पर हमला है। इस प्रकार की सहिष्णुता केवल हिन्दू धर्म के विरुद्ध ही क्यों होती है, इस पर भी विचार होना चाहिए। भारत जैसी सहिष्णुता विश्व में कहीं नहीं है। यह ऐसा अकेला देश है जिसने अपने आक्रान्ताओ से भी घृणा नहीं की। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि नालंदा को जलाने वाले के नाम पर रेलवे स्टेशन का नाम बना रहे। संस्कृति के प्रति आत्मगौरव होना चाहिए। दादी बाबा संस्कृति के संवाहक होते है। लेकिन यह तभी संभव होता है, जब संयुक्त परिवार हों।
वीर सावरकर ने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। वह राष्ट्रवादी थे। अंग्रेजों ने उन्हें बहुत यातना दी। लेकिन भारत के वामपंथी लेखकों, पत्रकारों ने उनकी सदैव निंदा की। यही लोग सोवियत संघ, चीन, क्यूबा आदि कम्युनिस्ट देशों में लाखों लोगों की हत्या की भी कभी आलोचना नहीं करता। ये लोग ईसाई मिशनरी के विरोध में कुछ नहीं बोलते। हिन्दू संघठन सदैव इनके निशाने पर रहते है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के खिलाफ बोलना तो इनके लिए अनिवार्य होता है। लेकिन किसी मजहबी संघठन से इनको शिकायत नहीं होती।
चीन में मीडिया सरकार के नियंत्रण में है। यही लोग सहिष्णुता का दावा करते है। कम्युनिस्ट व्यवस्था में मीडिया की कोई हैसियत नहीं होती। वैश्वीकरण के बाद भारत मे मीडिया के दो रूप उभरे है। एक पश्चिम सभ्यता से प्रभावित मीडिया है। दूसरा राष्ट्रवादी मीडिया है। यह भारतीय संस्कृति के अनुरूप कार्य करता है। पत्रकारिता संस्कृति की संवाहक होती है। ऐसे में इसका भारतीय मूल्यों के अनुरूप अपरिहार्य है। संस्कृति से मनुष्य की मानसिक और सभ्यता से भौतिक क्षेत्र की जानकारी मिलती है। भारत की पत्रकारिता को श्रेष्ठ होना है तो उसे भारतीय मूल्य स्वीकार करना होगा।
भारत मे महिला और मंदिर को बहुत सम्मान दिया गया। जबकि पश्चिमी सभ्यता में नारी को उपभोगवादी मानसिकता से देखा गया। उसी के अनुरूप फिल्मों में नारी को दिखाया जा रहा है। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विज्ञापनों में नारी की छवि मर्यादित नहीं दिखाई जा रही है। इसी प्रकार करीब अस्सी प्रतिशत समाचार नकारात्मक होते है। मात्र बीस प्रतिशत समाचार ही सकारात्मक होते है।
भारत के समाज को असहिष्णु बताने के अभियान को मीडिया ने ही हवा दी थी। जबकि मीडिया को यह बताना चाहिए था कि भारतीय चिंतन में असहिष्णुता संभव ही नहीं है। जिस दिन यह विचार प्रभावी होगा, उसके सकारात्मक प्रभाव दिखाई देने लगेंगे। पत्रकारिता अपनी संस्कृति से अलग होकर कल्याणकारी नहीं हो रही है। यह अच्छा है कि भारतीय पत्रकारिता में राष्ट्रवादी लोगों की संख्या बढ़ रही है।

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